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चंद्रमा

इंट्रो : जीवन के हर पहलू का भरोसेमंद उत्तर भारतीय ज्योतिष में मिलता है. सभ्यता की शुरुआत से ही यहां के ऋषियों ने ब्रह्माण्ड के तमाम ग्रहों के हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का सार्थक अध्ययन किया है. वर्षों की गवेषणा के बाद यह निर्णय निकला कि पृथ्वी पर रहने वाले मानवों के जीवन पर नौ ग्रहों तथा उनकी गति का प्रभाव पड़ता है. ये ग्रह हैं – सूर्य, चंद्र, गुरु, बुध, शुक्र, मंगल, शनि, राहु और केतु. अगले कुछ हफ़्तों तक हम “ज्योतिषाचार्य और काशीविश्वनाथ मंदिर के न्यासी” पंडित प्रसाद दीक्षित द्वारा मनाव जीवन पर सभी ग्रहों के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की सार्थक विवेचना पढ़ेंगे,

इसी क्रम में आज हम चंचल और शीतल ग्रह “चंद्रन ” के प्रभावों का वाचन करेंगे .

चंद्रमा पृथ्वी से अधिक निकटवर्ती शोभायमान आकाशीय पिंड है l यह संतापहारिणी अमृत रश्मियों का विकिरण किया करता है l इस की षोडश कलाएं अमृता, मानदा, पूर्णा, तुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्रिया, प्रीति, अंगदा, पूर्णा एवं पूर्णमृता नाम से प्रतिष्ठित हैं l यह पृथ्वी से 23 90 00 मील दूर है l चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है l यह शीत पिंड है l यहां मध्य रात्रि में इतनी भीषण सर्दी पड़ती है कि कोई भी पदार्थ तरल या गैस जमने से नहीं बच सकता l चंद्रमा के आकर्षण के कारण पृथ्वी के समुद्रों में ज्वार – भाटा आते रहते हैं l जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा पर होते हैं तब यह आकर्षण सबसे प्रचंड हो जाता है l यह पूर्णिमा का दिन होता है l इस दिन सबसे भीषण ज्वार आता है और प्रायः लोग पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा के प्रभाव से आत्महत्या भी करते हैं l चंद्रमा एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक 29 दिन 12 घंटा 44 मिनट एवं 5 सेकंड में पृथ्वी के चारों ओर अपनी एक परिक्रमा पूर्ण करता है l चंद्रमा पश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी गौरवर्ण लिए हुए रणदिवे संकोची प्रतिकार प्रकृति का स्त्री प्रधान सुंदर नेत्रों वाला काल्पनिक शक्ति का धनी अत्यंत भावुक आकर्षक व्यक्तित्व का धनी एवं सौम्य ग्रह है l चंद्रमा प्रथम भाव एवं सातवें भाव का प्रमुख कारक ग्रह है l चंद्रमा की अपनी उच्च राशि वृष एवं नीच राशि वृश्चिक है l चंद्र कर्क राशि का स्वामी होता है l

: जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा का अपना विशिष्ट स्थान होता है l चंद्र जिस राशि पर होता है वही जातक की जन्म राशि कहलाती है जन्म राशि से ही मनुष्य के मन का स्वभाव और वृत्तियों का पता चलता है l चंद्रमा जीव का मन होता है l जीव और जीवन में मन की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है l नेत्र, नासिका, कर्ण, जिह्वा एवं त्वचा आदि ज्ञानेंद्रिय वाणी आदि काम – इंद्रियों मन के योग से ही सार्थक कार्य कर पाती हैं l आंखें रूप को देखती हैं मनसे ना कि स्वयं से l यदि मन उदासीन हो, विरक्त हो अथवा अन्य दिशा में हो तो इंद्रियों का कार्य करना नहीं के बराबर होता है l इसलिए मन, बुद्धि, वासना, प्राण और ज्ञान के साथ जिस सीमा तक सहयोग अथवा असहयोग करेगा, उसी सीमा तक जीव का मंगल अथवा अमंगल होगा l चंद्रमा मस्तिष्क में निरंतर उत्पन्न होने वाले भाव का प्रतिनिधित्व करता है l मन अपनी उचित दिशा में अंग प्रत्यंग की चेतना को मोड़ देता है l यही कार्य चंद्रमा करता है l इसलिए जीव की सुदूर जीवनका और साथ ही साथ प्रतिदिन का भविष्य चंद्रमा की स्थिति और उसके अनुकूल एवं प्रतिकूल योगों पर बहुत कुछ आश्रित है l चंद्र का अधिकार सीने पर रहता है l पुरुषार्थ, मानव प्रकृति आदि का अध्ययन भी इसी ग्रह से किया जाता है l यह एक राशि पर लगभग सवा 2 दिन तक रहता है l चंद्र का अपना नक्षत्र रोहिणी, हस्त और श्रवण हैं l चंद्र की मित्र राशियां मिथुन, सिंह एवं कन्या हैं l गुरु के साथ चंद्र का योग ” गजकेसरी योग ” कहलाता है l चंद्र अपने से सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है l जन्मकुंडली में चंद्र की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह अतिशीघ्र अपनी गति बदलता है और जातक को तुरंत लाभ अथवा हानि पहुंचाने की क्षमता रखता है l यह मन और ततसंबंधित कार्य, सुगंधित द्रव्य, पानी, माता, आदर – सम्मान, श्री संपन्न, एकांतप्रिय, सर्दी – जुकाम, चर्म रोग और हृदय रोग का प्रमुख कारक ग्रह होता है l पेट, पाचनशक्ति, स्तन, गर्भाशय, योनि और स्त्री के सभी गुप्तांगों पर चंद्रमा का विशेष प्रभाव पड़ता है l

चंद्रमा के दुष्प्रभाव से अनेक रोग की उत्पत्ति होती है l यदि चंद्र लग्नाधिपति होकर अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में शत्रु राशि में राहु और शुक्र – शनि अपनी नीच राशि का होकर क्रूर ग्रहों से ग्रसित हो तो जातक को हार्निया, शुगर एवं पेट की बीमारी होती है l कर्क लग्न के जातक को ऐसी ही बीमारी होती है l यदि मेष लग्न हो और मृत्यु स्थान में अपनी नीच राशि का चंद्रमा के साथ शनि हो तो व्यक्ति को जलोदर की बीमारी होती है, उसकी पाचन शक्ति खराब रहती है तथा लीवर खराब हो जाता है l यदि अष्टम भाव में चंद्रमा अकेला अथवा अशुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति शराबी, व्यर्थ भ्रमण करने वाला होता है l ऐसे जातक को हार्निया, गैस एवं वायु विकार संबंधित परेशानी बनी रहेगी l यदि मृत्यु स्थान I अर्थात अष्टम भाव में लग्नाधिपति चंद्र मंगल एवं शुक्र एक साथ हो तो जातक को सेक्स संबंधित गुप्त रोग का होना सुनिश्चित है l यदि चंद्र नीच राशि का हो, शुक्र मेष अथवा वृश्चिक राशि का हो एवं उस पर शनि की दृष्टि तथा मृत्यु स्थान में केतु, बुध एवं सूर्य की युति एक साथ हो तो जातक को पथरी बवासीर एवं पैर में बड़ी बीमारी हो जाती है, पैर का कई बार ऑपरेशन भी होता है l इसके साथ ही यदि शनि अपनी नीच राशि मेष का होकर मंगल से प्रभावित हो तो पैर भी काटना पड़ता है l लग्न में चंद्र हो एवं लग्न के दोनों तरफ शनि एवं मंगल हो, लग्न अथवा लग्नेश पर सूर्य की दृष्टि हो तो कुष्ठ रोग की प्रबल संभावना रहती है l कुष्ठरोग होने का मुख्य कारण है चंद्र एवम् बुद्ध पर क्रूर ग्रहों के प्रभाव का होना होता है l लग्न से सप्तम भाव लग्न से षष्ट भाव अर्थात रोग स्थान में चंद्र एवं राहु की युक्ति हो या एकादश भाव में राहु एवं चंद्र की युक्ति हो और किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि इन पर ना हो तो मिर्गी रोग उत्पन्न होता है l यदि तृतीय भाव, तृतीयेश बुध एवं चंद्र पर क्रूर ग्रहों का कुप्रभाव हो तो व्यक्ति को सांस की नली में कष्ट होता है l उसे सदैव जुकाम रहता है, गला खराब रहता है एवं कालांतर में गले का ऑपरेशन भी कराना पड़ता है l दूषित चंद्र लग्न में स्थित हो और आठवें भाव में क्रूर ग्रह हो तो बालक जल्दी मर जाता है l यदि चंद्र कमजोर होकर पाप ग्रहों के मध्य हो अथवा पाप ग्रहों से युक्त हो तो भी बालक की मृत्यु जल्दी हो जाती है l यदि चंद्र एवं बुध कमजोर होकर क्रूर ग्रहों के प्रभाव में हो तो बालक की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो जाती है l चंद्रमा बारहवें भाव में हो, लग्न एवं आठवें भाव अर्थात मृत्यु स्थान में पाप ग्रहों तथा लग्नाधिपति कमजोर हो तो मरे हुए बच्चे का जन्म होना सुनिश्चित है l चंद्र, सूर्य, शनि एक साथ हो या सूर्य एवं मंगल षष्ट भाव रोग स्थान में अर्थात अष्टम भाव मृत्यु स्थान में हो एवं यह ग्रह शनि से दृष्ट हो तथा चंद्रमा भी क्षीण हो तो जातक की मृत्यु शीघ्र हो जाती है l यदि चंद्र पाप राशि से युक्त हो और चतुर्थेश पाप ग्रहों से युक्त हो तो माता का सुख नहीं मिलता है l कमजोर चंद्र सप्तम भाव में हो और उसके साथ पाप ग्रह हो तो भी माता का सुख नहीं रहता है l चंद्र से चौथे भाव में क्रूर ग्रहों तथा चतुर्थेश भी पापाक्रांत हो तो माता का सुख नहीं मिलता l यदि मेष लग्न हो एवं लग्न में चंद्र, सप्तम भाव में सूर्य एवं बुध एक साथ हो रोग स्थान में शनि, पंचम भाव में मंगल – केतु हो तो जातक को मूत्र रोग होता है l पांव अर्थात पैर कटने की प्रबल संभावना बनी रहती है l अपनी नीच राशि वृश्चिक के चंद्रमा के साथ सप्तम भाव अर्थात पत्नी स्थान में लग्नाधिपति शुक्र, द्वितीया बुध के साथ बैठा हो और अष्टम भाव में सूर्य तथा पंचम भाव में शनि मंगल की युक्ति हो तो जातक अपनी प्रेमिका के कारण पागल हो जाता है l चंद्र अपने मित्र ग्रहों के साथ बैठकर बली होता है एवं पाप ग्रहों के साथ पाप ग्रहों के साथ बैठकर निर्बल हो जाता है l

जन्मांग कुंडली के बारहवें भाव में चंद्रमा का शुभ अथवा अशुभ फल इस प्रकार होता है — प्रथम भाव अथवा लग्न में चंद्रमा हो तो लग्न मेष, वृष, कर्क हो तो वह मनुष्य धनवान, कांतिवान तथा आनंद का भागी होता है, अन्यथा लग्न मिथुन, सिंह, कन्या धनु, मकर, कुंभ एवं मीन हो तो वह जातक धनहीन, दुर्बल दरिद्र एवं मूर्ख होता है l ऐसा जातक स्थूल शरीर एवं दान विद्या का प्रेमी होता है l यदि चंद्र दूसरे भाव में हो तो जातक को धन का विशेष लाभ होता है l शरीर से सुखी एवं स्त्रियों से विलास करने में निपुण होता है l अपने कुटुंबियों पर प्रेम रखता है l ऐसा जातक सुंदर, भोगी परदेशी, सहनशील एवं भाग्यवान होता है l कुंडली के तीसरे भाव में चंद्र हो तो पराक्रम से धन अर्जित करने वाला, अनेक स्त्रियों में रहते हुए भी समाज में स्वच्छ माना जाता है l ऐसा जातक धार्मिक, आस्तिक धार्मिक यशस्वी एवं मृदुभाषी होता है l उसे सुख मिलता है l चौथे भाव में चंद्र हो तो जातक उच्च पद का अभिलाषी, पुत्रों एवं स्त्रियों से पूर्ण सुख प्राप्त करने वाला, उदार रोग रहित एवं विवाह के पश्चात भाग्य का उदय होना का होना सुनिश्चित है l पंचम भाव में चंद्रमा हो तो उत्तम संतान की प्राप्ति का होना, रत्न धारण करने का शौकीन, सदाचारी एवं क्षमाशील होता है l छठे भाव में यदि चंद्रमा स्थित हो तो जातक खर्चा करने वाला होता है l सप्तम भाव में चंद्र हो तो स्त्री से पूर्ण सुख मिलता है l कृष्ण पक्ष में उसकी स्त्रियों पर आसक्ति बढ़ जाती है l ऐसा जातक सभ्य, नेता, जल यात्रा करने वाला, व्यापारी, वकील एवं स्फूर्तिवान होता है l अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में चंद्र हो तो जातक रोगी, भयंकर व्याधियां एवं शारीरिक कष्ट से युक्त, प्रमेय एवं कफ प्रधान प्रकृति से युक्त, स्वाभिमानी होता है l ऐसा जातक मिथ्यावादी एवं परस्त्रीगामी हो सकता है l नवम भाव में स्थित चंद्र समाज में आदरणीय, सुशील, रूपवान, कीर्तिमान, दानी, लोकप्रिय एवं प्राकृतिक सौंदर्य का प्रेमी बनाता है l दशम भाव में चंद्र हो तो जातक को धार्मिक, विलास करने वाला, प्रथम पुत्र से दुखी एवं महत्वाकांक्षी बनाता है l एकादश भाव में चंद्र हो तो जातक स्त्रियों पर शीघ्र प्रभुत्व जमाने वाला, धन प्राप्त करने वाला एवं उदार होता है l द्वादश भाव में चंद्र हो तो जातक भय से युक्त, असंतुलित जीवन व्यतीत करने वाला, अधिक व्यय करने वाला, नेत्र रोग से युक्त, मिथ्यावादी, प्रवासी, भ्रमणशील एवं माता पिता को कष्ट देने वाला होता है l उक्त विवेचन से समझ ले कि चंद्रमा आपकी कुंडली में किस स्थान में बैठा है l चंद्र आपके लिए शुभ है अथवा अशुभ l यदि चंद्र अशुभ हो तो मोती कदापि धारण न करें अन्यथा परेशानी बढ़ेगी l मोती धारण करने से नुकसान ही होगा l ऐसी स्थिति में चंद्र का वैदिक ढंग से शांति कराकर चंद्र यंत्र धारण करना चाहिए l यदि चंद्र शुभ हो और शत्रु ग्रहों से युक्त हो तब आप मोती धारण कर सकते हैं l इससे लाभ अवश्य प्राप्त होगा l मोती छह रत्ती तक चांदी में दाहिने हाथ की कनिष्ठा अंगुली में सोमवार को धारण करना चाहिए, इससे सर्वोत्तम लाभ प्राप्त होता है l

•• पंडित प्रसाद दीक्षित, ज्योतिषाचार्य, कर्मकांडी एवं न्यासी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी l उत्तर प्रदेश l

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