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 भाजपा की अब तक 21 राज्यों में सत्ता कायम हो चुकी है। कुछ समय पहले तक बहुत से लोगों समेत सियासी पंडितों ने भी इसकी कल्पना तक नहीं की होगी कि पूर्वोत्तर के राज्यों में अछूत रही भाजपा एक के बाद एक कई राज्यों में अपना परचम फहराती हुई, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की राजनीति में नए आयाम जोड़ती जाएगी। कहना न होगा कि पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों के चुनावी परिणामों से बढ़े राजनीतिक ताप की आंच देश के अन्य राज्यों और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों को भी प्रभावित करेगी।
 राजनीति कभी स्थिर नहीं होती और बदलाव की यह बयार अबकी बार पूर्वोत्तर में बही है। हाल ही में त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनावी परिणामों के बहाने भाजपा को एक बार फिर से जश्न की वजह मिल रही है। इसी के साथ भारतीय जनता पार्टी के सियासी धरातल में विस्तार हो रहा। वर्तमान में मेघालय को फिलहाल छोड़ भी दें, तो भाजपा की अब तक 21 राज्यों में सत्ता कायम हो चुकी है। कुछ समय पहले तक बहुत से लोगों समेत सियासी पंडितों ने भी इसकी कल्पना तक नहीं की होगी कि पूर्वोत्तर के राज्यों में अछूत रही भाजपा एक के बाद एक कई राज्यों में अपना परचम फहराती हुई, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की राजनीति में नए आयाम जोड़ती जाएगी। कहना न होगा कि पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों के चुनावी परिणामों से बढ़े राजनीतिक ताप की आंच देश के अन्य राज्यों और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों को भी प्रभावित करेगी।
इन चुनावी परिणामों का राज्यवार विश्लेषण करें, तीनों राज्यों के परिणाम भाजपा का उत्साह बढ़ाने वाले हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाले परिणाम त्रिपुरा के हैं। यहां भाजपा 25 साल बाद वाम के किले में सेंध लगाने में सफल रही है। राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए की ओर बढ़ रहे वाम दलों के लिए यह एक और बड़ा झटका है। ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा लेफ्ट के दो प्रभावशाली गढ़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो तृणमूल कांग्रेस पहले ही अपने झंडे गाड़ चुकी है और आज के चुनावी परिणामों के साथ त्रिपुरा भी इसके हाथों से फिसल गया है। अब इसके हिस्से सत्ता का सुख केवल केरल में ही रह गया है। ये तमाम हालात वाम कुनबे की चिंता बढ़ाने वाले हैं। त्रिपुरा में जिस अंदाज में भाजपा का उभार हुआ है, वह कई मायनों में हैरान करने वाला है। 2013 के चुनावों में यहां भाजपा को महज 1.5 फीसदी वोट ही मिले थे। इस बार भाजपा गठबंधन ने अपने वोट शेयर में बड़ी बढ़त हासिल की है। भाजपा गठबंधन को 50 फीसदी के करीब वोट मिले हैं। करीब दो फीसदी से कुल वोट शेयर को 50 फीसदी तक ले आना अपने आप में एक ऐतिहासिक आंकड़ा है। अकेली भाजपा को अपने दम पर 42 फीसदी और इसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। नगालैंड में भी भाजपा गठबंधन की लहर दिखाई दी और यहां भी वह सरकार बनाने की स्थिति में आ गया है। मेघालय में मामला फंसता हुआ नजर आ रहा है। अभी तक के रुझानों में गठबंधन सरकार की ही उम्मीद दिख रही है।

भाजपा की इस जीत में मुख्यत : तीन कारकों का योगदान रहा – स्पष्ट रणनीति, कुशल नेतृत्व और संगठन की जबदरदस्त कार्यप्रणाली। अमित शाह की प्रभावी रणनीति के साथ भाजपा के चुनावी प्रबंधन में समय के साथ – साथ लगातार निखार आ रहा है। वहीं पिछले कुछ समय में पूर्वोत्तर के राज्यों में राष्ट्रीय स्व्यंसेवक संघ का जमीनी जुड़ाव बढ़ा है। इसके कारण सांस्कृतिक – सामाजिक गतिविधियों में संघ काफी सक्रिय रहा है। इसके अलावा भाजपा कार्यकर्ताओं ने चुनावों से पहले यहां खूब पसीना बहाया था। इन मिले – जुले प्रयासों के परिणाम आज देश के सामने हैं। त्रिपुरा के चुनाव इसलिए भी उल्लेखनीय हैं कि यहां भाजपा को महज एक चुनावी जीत नहीं मिल रही, बल्कि इससे बढक़र यह एक वैचारिक विजय है। ‘ लेफ्ट ’ और ‘ राइट ’ के बीच कड़ा वैचारिक संघर्ष होता आया है। पिछले कुछ समय में तो विचारों की यह लड़ाई हिंसक रूप धारण कर चुकी थी। भाजपा पिछले दो वर्षों में ही अपने 11 कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्या का आरोप वाम दलों पर लगाती रही है। स्वाभाविक तौर पर इस जीत को भाजपा उन कार्यकर्ताओं के त्याग को श्रद्धांजलि के रूप में भी प्रस्तुत करेगी।

रविंद्र सिंह भड़वाल

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