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इंट्रो :, आईएनएक्स मीडिया में जब पूंजी निवेश हो रहा था तब इसके मालिक पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी थे। ये वही दंपत्ति हैं, जिन्होंने अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या करवाई थी। दोनों इस मामले अभियुक्त होने के साथ मुंबई की जेल में हैं।

 
एअरसेल-मैक्सिस विलय और आईएनएक्स मीडिया प्रकरण में पूर्व वित्तमंत्री पी . चिंदबरम के उद्योगपति पुत्र कार्ति चिदंबरम की सीबीआई द्वारा गिरतारी ने एक बार फिर इस आशंका को पुष्ट किया है कि राजनेता मंत्री बनने के बाद पद का दुरूप्योग करने से हिचकिचाते नहीं है। कार्ति पर आरोप है कि वर्ष 2007 में पी चिंदबरम के केंद्र सरकार में वित्त मंत्री रहने के दौरान आइएनएक्स मीडिया को अतिरिक्त निवेश की सुविधा दी गई। नतीजतन इस मीडिया कंपनी में 305 करोड़ रुपए का विदेशी पूंजी निवेश हुआ। जबकि विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआइपीबी) ने केवल 4.62 करोड़ रुपए के निवेश की इजाजत दी थी। जांच एजेंसी सीबीआई का तो यहां तक दावा है कि कार्ति को इस मामले में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के लिए बतौर रिश्वत 10 लाख रुपए भी दिए गए थे। संसद में इस मामले को लेकर कांग्रेस यह कह सकती है कि यह सब राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से किया गया है, जिससे कांग्रेस पीएनबी घोटाले और उसके प्रमुख आरोपी नीरव मोदी व मेहुल चौकसी के परिप्रेक्ष्य में रक्षात्मक हो जाए। लेकिन यहां गैरतलब है कि सीबीआई वर्ष 2006 से ही इस मामले में एअरसेल-मैक्सिस सौदे में हुए गलत तरीके से निवेश को लेकर एफआईपीबी की भूमिका और कथित अनियमितता की पड़ताल कर रही है। चुनांचे 2013 तक यूपीए की सरकार थी और पी . चिंदबरम उसमें वित्त मंत्री थे, इसीलिए जांच टलती रही। अब शायद कार्यवाही अंजाम तक पहुंच रही है।

इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शुरूआती जांच में हेराफेरी के सबूत मिलने के बाद सीबीआई ने 15 मई 2017 को पहली प्रथमिकी दर्ज की थी। कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए ईडी और सीबीआई ने कई मर्तबा कार्ति को समन जारी किए। लेकिन वे इन संस्थानों में हाजिर होने की बजाय अदालतों से स्थगन लेने की कवायद में लगे रहे। आखिर में उन्हें ब्रिटेन से लौटते वक्त चेन्नई हवाई अड्डे से पुलिस ने हिरासत में लिया। दरअसल मनमोहन सिंह सरकार के 10 वर्षीय कार्यकाल के दौरान भारत में मारीशस और मलेशिया के रास्तों से आवारा पूंजी का बड़ी मात्रा में निवेश हुआ था। इसी क्रम में आईएनएक्स मीडिया को विदेशों से करीब 305 करोड़ रुपए की आवारा पूंजी मिली। पिछली सदी का आखिरी दशक और इस सदी का पहला दशक अवारा पूंजी निवेश का ऐसा स्वर्ण युग था कि तब मारीशस और मलेशिया के मार्ग से आने वाला निवेश दोहरे कराधान से मुक्त था। हालांकि अनियमित तरीके से निवेश की इजाजत तब भी नहीं थी। बावजूद मनमोहन सरकार कथित रूप से जीडीपी को बढ़ाए रखने की फीलगुड में इन निवेशों पर रोक से इसलिए बचती रही, जिससे कथित निवेश घटने और उदारीकरण के मंद पड़ने के खतरे का सामना देश को न करना पड़े। नरेंद्र मोदी सरकार आवारा पूंजी बनाम कालाधन को प्रतिबंधित करने के पक्ष में रही है, इसलिए वह गलत तरीके से निवेश से जुड़े मामलों को एक -एक कर उखाड़ रही है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे कड़े फैसले भी इसी द़ृष्टि से लिए गए हैं।

आईएनएक्स मीडिया में जब पूंजी निवेश हो रहा था, तब इसके मालिक पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी थे। ये वही दंपत्ति हैं, जिन्होंने अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या करवाई थी। दोनों इस मामले अभियुक्त होने के साथ मुंबई की जेल में हैं। ईडी को जब आईएनएक्स मीडिया में जब पूंजी निवेश के निर्धारित मापदंडों के अनुरूप खरा उतरता नहीं दिखा तो उसने 2006 में ही इस मामले को धनशोधन अधिनियम के तहत जांच के दायरे में ले लिया था। इस जांच के दौरान ही ईडी को कुछ दस्तावेज ऐसे मिले जिनमें एडवांटेज स्ट्रेटजिक सलाहकार कंपनी को 10 लाख रुपए का भुगतान एफआईपीबी की मंजूरी के लिए बतौर सलाह शुल्क के रूप में दिए गए। यह शुल्क कार्ति चिंदरबम को मिला। वही इस कंपनी के मालिक हैं। इस शुल्क को ईडी और सीबीआई ने सुविधा शुल्क अर्थात रिश्वत माना है। इसी शुल्क को रिश्वत का आधार मानने के बाद पहले तो सीबीआई ने कार्ति के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की और फिर एक साथ कार्ति, पीटर व इंद्राणी मुखर्जी के ठिकानों पर छापेमारी की। अब तो कार्ति की रितारी भी हो गई है।

आईएनएक्स मीडिया से कार्ति द्धारा गलत तरीके से धन लेने के मामले को 2015 में तूल तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी भी दे चुके हैं। उनका खुला आरोप था कि वित्त मंत्री रहते हुए पी . चिंदबरम ने बेटे कार्ति को एयरसेल मैक्सिस विलय से लाभ उठाने में मदद की। उन्होंने दस्तावेजों को जानबूझकर रोका और अधिग्रहण प्रक्रिया को नियंत्रित किया। ताकि उनके पुत्र को अपनी कंपनियों के शेयर की कीमत बढ़ाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाए। अब एक तरफ तो पी . चिंदबरम खुद को परेशान करने का आरोप केंद्र सरकार पर लगा रहे हैं, दूसरे कार्ति की गिरतारी होते ही कांग्रेस आगे आकर कहने लगी है कि यह सब राजनीतिक बदले की दुर्भावना से किया जा रहा है। ईडी और सीबीआई को केंद्र सरकार द्वारा कथित रूप से इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यह कमोबेश उसी तरह का राग है, जैसा चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को सजा होने और उनके पुत्र, पुत्रियों व दामाद पर बेनामी संपत्ति के सिलसिले में सीबीआई द्वारा शिकंजा कसने पर अलापा गया था।

हमारे देश में जब भी रसूख वाले राजनेताओं पर कानूनी श्किंजा कसता है तो अकसर विपक्षी दल सत्ताधारी दल पर बदले की भावना और सीबीआई के इस्तेमाल के आरोप लगाते हैं। टू जी और कोयला खदानों के आबंटन में भी इसी तरह के आरोप -प्रत्यारोप लगे। सर्वोच्च न्यायालय ने तो इन्हीं मामलों से जुड़ी जांच के संदर्भ में सीबीआई को पिंजरे का तोता तक कहा था। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब भी राजनेता या किसी आला -आधिकारी के खिलाफ अर्थिक हेराफेरी की जांच होती है तो ईडी हो या सीबीआई व्यक्ति के रसूख का आकलन कर जांच -प्रक्रिया आगे बढ़ाते हैं। राजनीतिक दबाव में आकर ये एजेंसियां मूल दस्तावेजों में कूटरचना करने की हिम्मत तक जुटा लेती हैं। कुछ इसी तरह के आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिंह पर एफआईआर भी दर्ज की गई थी। इसी तरह की लापरवाहियों या उद्दण्डताओं के चलते टू जी घोटाले के आरोपी बरी हो गए थे। बहरहाल इस मामले में पुत्र की मदद को लेकर पी . चिंदबरम की जो पक्षपाती भूमिका सामने आ रही है, उसकी प्रतिच्छाया में पी.चिंदबरम का भी जांच के दायरे में आना तय है। तब हो सकता है, कांग्रेस अपना आपा खो दे और संसद में आक्रामक दिखाई दे। जब भी किसी दल का नेता आर्थिक अपराध के श्किंजे में आता है तो अकसर नेता आक्रामक होकर ही अपना बचाव करते हैं।

प्रमोद भार्गव

लेखक /पत्रकार

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लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार है।

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