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माउंट एवरेस्ट में लगे ट्रैफिक जाम ने अब तक ग्यारह लोगों की जान ले ली है। इसमें तीन भारतीय भी शामिल हैं। घंटों जाम में फंसे रहने के बाद आखिर शरीर भी अपनी आखिरी कोशिशों में हार गया। कुछ लोग जिनकी जान किसी तरह से बच गई, वे इस यातायात जाम के भयावह अनुभव बयान कर रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ। क्या कभी सोचा जा सकता था कि माउंट एवरेस्ट पर भी जाम लगा करेगा। इसके परिणाम क्या होंगे।

माउंट एवरेस्ट दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ है। इतना ऊंचा कि इस पर चढ़ना तमाम पर्वतारोहियों के लिए एक सपने जैसा होता है। आधुनिक सुविधाओं ने अब ऐसा संभव कर दिखाया है। अगर जेब में पैसा हो तो माउंट एवरेस्ट फतह किया जा सकता है। अब यह सिर्फ एडवेंचर नहीं बल्कि करोड़ों-अरबों का कारोबार है। 

लेकिन, सवाल यह है कि पैसा किस सीमा तक इसे संभव कर सकता है। माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर यानी 29 हजार 29 फिट है। यह समुद्र तल से लगभग नौ किलोमीटर ऊंचा है। इस ऊंचाई पर ली जाने वाली हर सांस में समुद्र तल पर ली जाने वाली सांस की तुलना में आक्सीजन की मात्रा केवल एक तिहाई ही रह जाती है। यहां पर आदमी का शरीर तेजी से क्षरित होने लगता है। बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के यहां जीवित रहना संभव नहीं है। यही कारण है कि ज्यादातर पर्वतारोही एवरेस्ट के शिखर पर बस कुछ मिनट ही गुजार पाते हैं। ज्यादातर लोग वहां पर सिर्फ सेल्फी खिंचाने भर तक के वक्त के लिए टिक पाते हैं। कैमरे से तस्वीरें उतारी और नीचे उतरना शुरू। 

पर्वतारोहण के लिए बेस कैंप से मौसम अच्छा होने का भी इंतजार किया जाता है। कई दिनों के बाद 22 मई को मौसम जब अच्छा हुआ तो बड़ी संख्या में पर्वतारोही ऊपर चढ़ने लगे। माना जाता है कि उसी दिन लगभग 200 पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट पर चढ़ गए। माउंट एवरेस्ट के अंतिम हिस्से में बर्फ से ढंकी एक पतली सी रिज पर चलके चढ़ना-उतरना होता है। इसे डेथ जोन कहते हैं। ऐसे में आगे वाले के बढ़ने पर ही पीछे वाला बढ़ सकता है। इसी जाम के चलते भारतीय पर्वतारोही अंजली कुलकर्णी (55) और अमेरिकी पर्वतारोही डोनाल्ड लिन कैश (55) की मौत हो गई। 

माउंट एवरेस्ट पर लगे जाम से अब तक सात लोगों की मौत की सूचना है। गुरुवार के दिन भारतीय पर्वतारोही कल्पना दास (52) और निहाल भगवान (27) और एक ऑस्ट्रियन पर्वतारोही मौत हो गई। भगवान के टूर गाइड का कहना है कि यातायात जाम में 12 घंटे से ज्यादा तक फंसे रहने के बाद उसके शरीर ने हिम्मत छोड़ दी। 

माना जाता है कि वर्ष 1992 के बाद से अब तक माउंट एवरेस्ट पर 200 के लगभग पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है। इनके शव वहीं बर्फ के नीचे दबे हुए पड़े हैं। ज्यादातर मौतों के लिए हाई एट्टीट्यूड सिकनेस को जिम्मेदार माना जाता है। 

नीचे जो फोटो आप देख रहे हैं वह संभवतया वही फोटो है जो पर्वतारोही निर्मल पूजा ने 22 मई को रिलीज की थी। उन्होंने लिखा था कि एवरेस्ट के डेथ जोन में लगभग 320 लोग लाइन में लगे एवरेस्ट पर चढ़ने-उतरने का इंतजार कर रहे हैं।  माउंट एवरेस्ट पर आठ हजार मीटर से ज्यादा की ऊंचाई को डेथ जोन माना जाता है।

सोचिए, हम आखिर कर क्या रहे हैं। यहां भी अंधी दौड़। ये दौड़ हमें ले कहां जाएगी। 

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