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चुनाव २०१९ में नब्बे  करोड़ मतदाताओं में से साठ करोड़ मतदाताओं का मतदान मोदी द्वारा प्राप्त करने के बाद, ख़याल आया कि – वामपंथ ने कैसे कैसे वैश्विक भ्रमजालों का निर्माण किया है. लियो टालस्टाय का एक उपन्यास हुआ है “वार एंड पीस” फ्रांसीसी विचार लेखक रोमां रोलां ने इस पुस्तक को “19वीं शताब्दी का भव्य स्मारक, उसका मुकुट” बताया था. इस पुस्तक में महाशय लियो टालस्टाय ने कहा था कि “सत्ता की हुकूमत जनता के अज्ञान में निहित होती है”. जनता के अज्ञान में सत्ता के सूत्र खोजने वाले चिंतन के ठीक विपरीत भारत में जनता के ज्ञान वैभव से सत्ता की उत्पत्ति मानी गई है. जनता की इसी अंतर्दृष्टि, विवेक व विवेचना से प्राप्त १३० करोड़ जनता का विश्वास प्राप्त कर नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र व विश्व के दुसरे सबसे बड़े जनसमूह के नेता बनकर अब समूचे विश्व की आशा की किरण बनने की और बढ़ चले हैं. अब यह कहा जा सकता है कि भारतीय जनता लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रणाली के मूल मंत्र “सशक्त सरकार” शब्द के अर्थ व मर्म को समझ चुकी है.

२३ मई, २०१९ को भारत की जनता से अद्वितीय जनादेश प्राप्त करने के तुरंत बाद मोदी ने जो कहा वह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा शुभंकर बनकर उभरने वाली बात है, उन्होंने कहा – “चुनाव के दौरान मुझे जो भी कहा गया, वह सब मैं भूल गया”. क्या भूलना और क्या याद रखना, कब विस्मृत करना और कब स्मरण कर लेना यह विवेक ही किसी शासक को सामान्य से असामान्य बनाता है. हवा में विचरण कर रहे, घोर जनाधार हीन नेताओं के मूंह से विश्व में सबसे अधिक गालियां और सबसे गंदी गालियां सुनने वाले नेता बनने के बाद मोदी का यह कहना कि मैं सारी गालियों को भूल गया अपने आप में एक संत कर्म है जो मोदी जैसे सन्यासी राजनीतिज्ञ से अपेक्षित हो सकता है. केवल और केवल अपनी व्यक्तिगत छवि के आधार पर समूचे चुनाव को “संसदीय निर्वाचन प्रणाली” को “राष्ट्रपति निर्वाचन प्रणाली” की और मोड़ देनें वाला यह व्यक्ति सचमुच भारतीय राजनीति की एक अनन्यतम, अनूठी व अलभ्य पूँजी है जो भारतीय राजनीति के दशकों से हानि में चल रहे खाते को लाभ के खाते में परिवर्तित कर समृद्ध कर रही है. संसद को देवालय मानकर माथा टेकने के बाद और संविधान को शीश नवाने के बाद इस तरह की उदार शब्दावली से नरेंद्र मोदी ने अपने दुसरे कार्यकाल के बड़े विस्तृत संदेश प्रवाहित कर दिए हैं. मोदी ने अपने नेता सत्ता पक्ष चुने जाने के बाद जो कहा वो सब उनका केवल कहा या उच्चारित किया हुआ शब्द समूह मात्र नहीं है, वह सब तो उनका १२ वर्षों के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और पांच वर्षों के प्रधानमंत्री के रूप में क्रियान्वित किया जा चुका “सबका साथ – सबका विकास” का अद्वितीय सिद्धांत है. दुखद है कि कुछ राजनीतिज्ञों, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा देश में एक छदम वातावरण रच दिया गया था कि “देश में एक समूह विशेष में भय का वातावरण व्याप्त है”. नरेंद्र मोदी नामक इस जननेता के पिछले बारह और पांच, सत्रह वर्षों के कार्यकाल को देखें तो लगता है कि यह व्यक्ति इस समाज विशेष को सुरक्षा देनें, सरंक्षण करने व समृद्ध करने की कई बातों को कार्यरूप में परिवर्तित कर चुका है. मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक व हलाला से मुक्ति के प्रयास समूचे मुस्लिम समाज को एक नई जागृति व ऊर्जा से भरने वाला प्रयास सिद्ध होने वाला है. निस्संदेह इस जनादेश के बाद मोदी की जवाबदेही अब बहुत अधिक बढ़ गई है. इसी उत्तरदायित्व को निभाने उन्होंने अपनी पुरानी प्रवृत्ति को अब प्रण में परिवर्तित करते हुए कहा है कि – “मेरे समय का क्षण-क्षण तथा शरीर का कण-कण देश को समर्पित होगा, मैं अपने लिए कुछ नहीं करुंगा. मेरे से गलती हो सकती है लेकिन बदइरादे और बदनियति से कोई काम नहीं करुंगा”. एक बात और बड़ी विशिष्ट कही मोदी जी ने कि – “लोकसभा चुनाव के दौरान उनके द्वारा चलाया गया देशव्यापी अभियान और देश के चप्पे चप्पे की यात्रा का आनंद वे इस यात्रा को तीर्थयात्रा मानकर ले रहे थे”. तीर्थयात्रा के समापन में संसद की देहरी पर माथा टेकना व भारतीय संविधान को शीश नवाना भारतीय लोकतंत्र में एक पवित्र भाव को प्रवाहित कर रहा है. वस्तुतः इस प्रकार के प्रतीक शब्दों का उपयोग करना व प्ररेणा दायी दृष्टान्तों को गढ़ते रहने की “मोदी प्रवृत्ति” ही उन्हें समान्य राजनेताओं से अलग-विलग एक उत्तानपाद स्थान प्रदान करती है. भारतीय जाति व्यवस्था को दो जातियों में बांट देनें का उनका प्रकल्प भी बड़ा अनूठा लगा – “अब भारत में दो जातियां रहेंगीं एक जाति होगी गरीबी से बाहर निकलने को प्रयासरत जाति और दूसरी जाति होगी गरीबों को गरीबी से बाहर निकलने में सहयोग करने वाली जाति”. ऐसा कहकर मोदी जी ने भारतीय जाति व्यवस्था में भारतीय धर्म ग्रंथों के बसे हुए प्राणों को जागृत कर दिया है. भारतीय ऋषि परम्परा ने यहां की जाति व्यवस्था में समय समय पर बड़े ही सुंदर प्रयोग किये हैं, नरेंद्र मोदी की यह बात भी इन शास्त्रोक्त परिवर्तनों की श्रंखला में एक नया परिवर्तन है. मोदी जी के ऐसा कहने के बाद निश्चित ही हमें भारत का एक नया सामाजिक स्वरूप देखने को मिलेगा. निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आगामी दशकों की भारतीय राजनीति में मोदी प्रभावी रहेंगे तो आगामी सदी की भारतीय राजनीति में मोदी के जीवन को एक संदर्भ ग्रन्थ के रूप में पढ़ा जाता रहेगा. २०१९ के

के चुनावों के बाद अंतराष्ट्रीय मीडिया ने जो मोदी के संदर्भ में जो कहा है वह भीपिछले दो तीन दशकों की चुनावी प्रतिक्रिया से सर्वथा भिन्न अध्याय प्रस्तुतकरता है. इस प्रसंग में सर्वाधिक अनुकूल चर्चा होगी अमेरिका की अंतराष्ट्रीयपत्रिका “टाइम” के टाइमिंग की. टाइम द्वारा अचानक और ऐन चुनावीअभियान के शीर्ष समय में मोदी को “डिवाईडर इन चीफ” बतान को यदिधूर्तता और पैकेज जनित दुष्प्रयास माना जाएगा तो चुनाव परिणाम के मोदी केपक्ष में आने के बाद मोदी को “भारत को एकता के सूत्र में पिरोने वाला” बतानेको भारतीय बाजार की चिंता और भारतीय जनमानस को अपनी पत्रिका मेंव्यवसायगत मजबूरियों के कारण स्थान देनें की मजबूरी ही माना जाएगा.खैर, मज़बूरी में ही सही, भारतीय राजनैतिक नेतृत्व की यह सच्ची प्रसंशा अंतराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त होते भारत का परिचायक है. भारत की एकता,अखंडता व सार्वभौमिकता के विरोधी पश्चिमी विदेश मीडिया ने एक मजबूत वसशक्त भारत के उदय को रोकने के लिए हरसंभव प्रयास किये; धन, संचारमाध्यम, अफवाहें, हथियार, षड्यंत्र, समाज विभाजन आदि सभी हथियारों काउपयोग किया उसने किंतु जब उसके बाद भी विदेशी मीडिया की नहीं गली तोउसने अंत में उसने चुनावी परिणामों के बाद भारतीय बाजारों की व उसकी क्रयक्षमता का लाभ उठाने के लिए मोदी को अपना चेहरा बनाकर सच्चाई हीलिखना प्रारम्भ कर दिया. अंतराष्ट्रीय मीडिया ने संघर्षरत मोदी की कभी चर्चा नहीं की किंतु सफल और विजयी मोदी को ऐसा अपना कन्धों पर उठाया व ऐसा मायावी शब्दजाल फैलाया जो पूर्व में कम ही देखने में आया था. इस संदर्भ में पाकिस्तानी समाचार पत्र द डॉन ने पाकिस्तानी जनता को डराते हुए लिखा – “मोदी की यह जीत पाक विरोधी नीति पर मुहर है”. जबकि सत्य यह है की मोदी की यह विजय सम्पूर्ण विश्व में आतंकवाद के विरुद्ध अभियान का अगला महत्वपूर्ण चरण मात्र है.

मोदी की यह विजय आंकड़ों की दृष्टि से अत्यंत प्रभावी है. देश भर में २०० से अधिक चुनाव क्षेत्रों में भाजपा को ५०% से अधिक मत मिलना भाजपा व मोदी को एक पुरस्कार की तरह से माना जा रहा है जो जनता ने प्रत्यक्ष सामने आकर दिया है.

 

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