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” बुध ”

इंट्रो : जीवन के हर पहलू का भरोसेमंद उत्तर भारतीय ज्योतिष में मिलता है. सभ्यता की शुरुआत से ही यहां के ऋषियों ने ब्रह्माण्ड के तमाम ग्रहों के हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का सार्थक अध्ययन किया है. वर्षों की गवेषणा के बाद यह निर्णय निकला कि पृथ्वी पर रहने वाले मानवों के जीवन पर नौ ग्रहों तथा उनकी गति का प्रभाव पड़ता है. ये ग्रह हैं – सूर्य, चंद्र, गुरु, बुध, शुक्र, मंगल, शनि, राहु और केतु. अगले कुछ हफ़्तों तक हम “ज्योतिषाचार्य और काशीविश्वनाथ मंदिर के न्यासी” पंडित प्रसाद दीक्षित द्वारा मनाव जीवन पर सभी ग्रहों के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की सार्थक विवेचना पढ़ेंगे,

इसी क्रम में
आज हम
चन्द्रपुत्र ” बुध ” के प्रभावों का
वाचन करेंगे .

सर्वप्रथम जब भारतीय महर्षियों की दृष्टि आकाश मंडल पर पड़ी और उन्होंने सूर्य – चंद्र – मंगल इत्यादि ग्रहों को सूक्ष्मता से परखना प्रारंभ किया तो भयभीत होकर उन्होंने इनको देवत्व का रूप दे दिया l वेदों में कई स्थानों पर ग्रहों को सूर्य – चंद्र इत्यादि को देवता का रुप दिया गया है तथा उसी प्रकार से इनकी स्तुति भी की गई है l परंतु महर्षियों की दृष्टि स्पष्ट होती गई उन्हें लगा कि इनका भली – भांति अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि इनके अध्ययन से ही मानव एवं सृष्टि के मूल रहस्य को समझा जा सकेगा l धीरे – धीरे उन्होंने अनुभव किया कि ग्रहों एवं नक्षत्रों का सीधा प्रभाव मानव पर पड़ता है तथा इनके प्रभाव के अनुकूल ही मानव जीवन संचालित होता है l मानव के सुख – दुख, हानि – लाभ, उन्नति – अवनति पर ग्रहों का निश्चित प्रभाव पड़ता है l इसी प्रकार भूकंप, ज्वालामुखी, महामारी आदि के कारण भी यह ग्रह नक्षत्र ही हैं l जिनके परस्पर संबंधों से इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं होती रहती हैं l इस प्रकार से इन ग्रहों के अध्ययन को गणित पक्ष एवं इनके फलस्वरूप होने वाले प्रभाव को फलित पक्ष की संज्ञा दी गई है l प्राचीन काल में ही महर्षियों ने ज्योतिष की उपादेयता सिद्ध कर दिए कि मानव जीवन की छोटे से छोटे और बड़े से बड़े कार्य के पीछे ग्रह – नक्षत्रों का पूरा प्रभाव है l

पृथ्वी से 13, 30,00,000 मील दूर 100 मील ब्यास वाला बुध ग्रह हमारी पृथ्वी और सूर्य के बीच में स्थित है l 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा पूरा करता है l आकाश मंडल में संध्या के समय अथवा प्रातः काल यह दिखाएं देता है l अधिक रात हो जाने पर यह दिखाई नहीं देता, क्योंकि उस समय यह सूर्य के साथ क्षितिज के नीचे चला जाता है l यह सूर्य के कक्षा ग्रह से 60 अंश के अंतर्गत ही रहता है l बुद्ध का रंग हरा है l उत्तर दिशा का स्वामी है l यह वात, कफ प्रधान एवं श्यामवर्ण का है l व्यापार, लेन – देन, खरीदारी, कंजूसी ऐश्वर्या, वायुयान, भाषण, लेखा – जोखा, गणित, ज्योतिष, खोज, चिकित्सा, शिल्प, कानून, जासूसी इत्यादि का प्रमुख कारक ग्रह होता है l बुद्ध ग्रह का विशेषाधिकार कंधे – ग्रीवा पर होता है l बुध की अपनी राशि मिथुन एवं कन्या होती है, किंतु मिथुन पर विशेष बल होता है l इसका अपना नक्षत्र अश्लेषा, जेष्ठा एवं रेवती है l इसमें नपुंसक और स्त्री दोनों तत्व मौजूद है l शास्त्रों में बुद्ध को चंद्रमा का पुत्र बतलाया गया है l बुध कन्या राशि का उच्च एवं मीन राशि का नीच का होता है l कन्या राशि की 15 अंश पर बुद्ध का प्रमुख स्थान है एवं मीन राशि की 15 अंश पर परम नीच स्थान है l बुध के मित्र ग्रह सूर्य एवं शुक्र है l बुद्ध के शनि, गुरु एवं मंगल सम ग्रह है l इसलिए शनि की राशि मकर एवं कुंभ, बृहस्पति की राशि धनु एवं मीन तथा मंगल की राशि मेष एवं वृश्चिक बुध की सम राशियां होती हैं l शुक्र के साथ राजेश एवं चंद्र के साथ यह शत्रु जैसा व्यवहार करता है l यह अपने से सातवें भाव अर्थात स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है l इसकी दैनिक गति 245 कला 32 विकला है l इसे राशि चक्र के पूर्ण भ्रमण में 316 दिन 15 घटी 31 पल एवं 30 विफल लगते हैं l बुद्ध की महादशा 17 वर्ष का होता है l बुद्ध एकादश भाव का प्रमुख कारक ग्रह होता है l

बुद्ध अनिष्टकारक हो या और ग्रहों के प्रभाव में हो तो अनेक रोगों की उत्पत्ति करता है l लग्नेश बुध, सूर्य एवं मंगल के साथ हो और चंद्रमा मेष राशि का अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में हो तो व्यक्ति की पाचन शक्ति खराब होती है तथा उसकी ब्लड प्रेशर से मृत्यु तक हो जाती है l यदि लग्नाधिपति या सप्तम पति बुद्ध शनि के प्रभाव में हो तथा शुक्र नीच का हो एवं चंद्र निर्मल हो तो व्यक्ति नपुंसक अथवा हीन भावना का शिकार होता है l यदि कन्या लग्न हो सप्तम भाव में शनि हो बुध मंगल की राशि में हो तो भी व्यक्ति नपुंसक होता है l लग्नाधिपति बुध – शुक्र – सूर्य एवं शनि से प्रभावित हो तो भी व्यक्ति को संतान होने में संदेह रहता है l यदि लग्नाधिपति शुक्र – बुद्ध – राहु और मंगल एक साथ हो तथा उस पर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो भी व्यक्ति को संतान नहीं होती l शुक्र यदि बुध की राशि में हो तो भी वीर्य दोष होता है l बुध एवं शुक्र एक साथ हो तथा सप्तमेश गुरु ग्रहों के प्रभाव में हो तो व्यक्ति को यौन रोग होता है l यदि तृतीय भाव तृतीयेश बुद्ध एवं चंद्र पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति को सदैव जुकाम रहता है l यदि बुध नीच राशि का हो और यह भाव शनि एवं राहु से ग्रसित हो तो व्यक्ति को दमा हो जाता है l यदि बुध की दोनों राशियां पाप ग्रहों से ग्रसित हो एवं लग्न पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति को सांस फूलने की बीमारी रखी होती है l लग्न में शत्रु ग्रह बैठा हो अथवा मकर लग्न में सूर्य – बुध हो एवं मंगल वृश्चिक राशि का हो तो जातक को चेचक होती है l यदि मिथुन लग्न हो चौथे भाव में सूर्य एवं मंगल हो षष्ट भाव में चंद्रमा, पंचम भाव अर्थात संतान भाव में बुध एवं इस पर शनि की दृष्टि हो तो निसंतान योग बनता है l यदि षष्ट भाव में बुध निर्बल हो इस पर शनि आदि सभी पापग्रहों की दृष्टि हो तो मुकबधीर योग होता है l यदि लग्न में बुध के साथ शनि शत्रु राशि में हो तो व्यक्ति दुबला – पतला एवं छोटे कद का होता है अर्थात उसके शरीर का विकास नहीं हो पाता l मेष लग्न में राहु और षष्ट भाव में बुध – सूर्य – मंगल हो, सातवें भाव में केतु एवं अष्टम भाव में शनि हो तो व्यक्ति को शुगर – चेचक होता है और उसकी हार्ट अटैक से मृत्यु होती है l बुद्ध अथवा बुद्ध की दोनों राशियां क्रूर ग्रहों से ग्रसित हो तो बालक की कुमारावस्था में ही मृत्यु हो जाती है l यदि छठा भाव कन्या राशि एवं बुध सभी पर राहु और शनि का प्रभाव हो तो गुर्दे की बीमारी होती है या किडनी का ऑपरेशन हो सकता है l जन्म कुंडली के द्वादश भाव में बुध का शुभ अथवा अशुभ फल इस प्रकार होता है –

जिस जातक के लग्न में बुद्ध होता है वह अपने पूरे जीवन को व्यवस्थित करते हुए उन्नति की ओर अग्रसर होता है, उसकी बुद्धि श्रेष्ठ होती है और धार्मिक कार्यों में उसकी रुचि होती है l उसका आभा कांति वाला एवं वह प्रसन्नचित रहता है l ऐसा जातक दीर्घायु, विनोदी, गणितज्ञ, उदार एवं मृदुभाषी होता है l जिस जातक की कुंडली में द्वितीय भाव में बुध होता है, वह जातक बुद्धिमान एवं परिश्रमी होता है l वह भाषण देकर जनता को मंत्रमुग्ध कर सकता है l ऐसा जातक दलाल, वकील, नेता, मितव्यई, संग्रह करने वाला एवं साहसी होता है l जातक की कुंडली में तीसरे स्थान में यदि बुध हो तो जातक दूसरों के लिए हितकारी, पढ़ने लिखने का शौकीन, साहसी, व्यापारियों से मित्रता करने वाला एवं नम्र स्वभाव तथा उदार, लेखक, संपादन, कवि, यात्रा श्री सद्गुरु एवं अल्प परिवार वाला होता है l ऐसे जातक की मेधा शक्ति विलक्षण होती है तथा विपरीत परिस्थितियों को भांपने की उसमें अपनी विशेष क्षमता होती है l पढ़ने लिखने में ज्ञान वृद्धि के लिए वह सदैव उत्सुक रहता है l ऐसे जातक का पारिवारिक जीवन सुखमय होता है l जातक के चतुर्थ भाव में बुध हो तो जातक कूटनीतिज्ञ, उत्तम शिक्षा प्राप्त करने वाला, विरोधी दल का नेता, अपने भाषणों एवं लेखों से राजनीतिक क्षेत्र में हलचल उत्पन्न कर देता होता है l पंचम भाव में बुध जातक को सौभाग्यशाली, हंसमुख, श्रद्धालु एवं अधिक संतान वाला बनाता है l शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता की विशेषता होती है l ऐसा जातक विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाने की सामर्थ्य रखता है l षष्ट भाव में बुध हो तो जातक दूसरों का विरोधी, आलसी, कलाप्रेमी, अभिमानी एवं वादी बनाता है l सप्तम भाव में बुध हो तो जातक का भाग्य पत्नी के भाग्य से होना, धार्मिक अल्प वीर्यवान एवं उदार होता है l अष्टम भाव में बुद्ध जातक को दीर्घायु, कृषि कार्य में निपुण, वक्ता एवं धर्मात्मा बनाता है l नवम भाव में बुद्ध जातक को लेखक, ज्योतिषी, धर्मगुरु एवं भाग्यवान बनाता है l दशम भाव में बुध हो तो जातक को पिता द्वारा अर्जित किया हुआ धन प्राप्त होता है l ऐसा जातक अल्पभाषी, लोकमान्य, व्यवहार कुशल, पितृ भक्त एवं जमींदार तुल्य होता है l एकादश भाव में बुद्ध होने पर जातक धनवान, सदाचारी, कुल को बढ़ाने वाला होता है l द्वादश भाव में बुध जातक को कष्ट से युक्त रखता है l उसका बचपन असंतुष्ट रहता है तथा साझेदारी में धोखा खाने वाला, बाहरी स्थानों से विशेष संपर्क रखने वाला होता है l यदि बुध उत्तम हो तो जातक को चाहिए कि वह उत्तम जीवन – सुख – समृद्धि और शांति के लिए 5.30 रत्ती तक पन्ना दाहिने हाथ की कनिष्ठा उंगली में चांदी या स्वर्ण में धारण करें l यदि बुध अरिष्ट का सूचक हो तो जातक को चाहिए कि बुद्ध की शांति कराकर बुध यंत्र सदैव गले में धारण करें l

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