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इंट्रो : शहनाई का पर्याय बन चुके उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब यदि हमारे बीच सशरीर होते तो आज १०२ साल के हो चुके होते. उनकी सादगी के तमाम किस्से मशहूर हैं. पेश है उन्हीं अनगिनत घटनाओं में से एक, उनके भारतरत्न पा जाने के बाद की …………

संभवतः २००५ की बात है . बनारस के चौक थाने के नए – नए एसओ ने जन्माष्टमी के मौके पर अपने एक सिपाही को आदेश दिया कि, दालमंडी से कोई अच्छा सा शहनाई बजाने वाला पकड़ लाओ ताकि रात को भगवान् के जन्म के समय बजवाया जा सके . सिपाही को लगा कि पूरे दालमंडी में खां से बड़ा फेमस शहनाई बजाने वाला और कोई तो दीखता नहीं . फटाफट ” खां साहब ” के घर पर पहुंचा और सरकारी हुकुम सुना दिया . साथ ही उनके सेक्रेटरी को ताकीद कर दिया कि सही समय पर नहीं पहुंचे तो पिछवाड़ा गरम होने की सम्भावना प्रबल होगी . सेक्रेटरी ने चौक थाने से आदेश आने की बात की तो वे अपनी शहनाई साफ़ करने लगे . सेक्रेटरी ने कहा, अब आप मामूली से पोलिस स्टेशन में शहनाई बजाने जायेंगे, तो उनका जवाब था कि, क्या हुआ ! मै बहुत पहले एक बार वहां बजा चुका हूं और भगवान् के जन्म के समय बजाने की बात है . ऐसे में जगह मायने नहीं रखती . थक – हारकर सेक्रेटरी ने कांग्रेसी नेता और बीएचयू के पूर्व उपाध्यक्ष कमलाकर त्रिपाठीजी को के सामने फ़ोन पर बात रखी . त्रिपाठीजी ने आनन् – फानन में जिले के कप्तान को फ़ोन लगाया और व्यंग्य कसा कि, आप लोग बड़े शौक़ीन हो गए हैं . खां साहब को बुलाकर शहनाई सुन रहे हैं . कप्तान अचकचाए, कौन खां साहब ? जवाब आया, भई, पूरे हिन्दुस्तान में और ख़ास कर बनारस में एक ही तो खां साहब हैं . कप्तान साहब तुरंत विनयवत मुद्रा में बोले, क्या मजाक कर रहे हैं त्रिपाठीजी . हमारा कहां ऐसा सौभाग्य कि खां साहब को सुनने का मौका मिले . उनके किसी कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी भी मिल जाये तो सौभाग्य की बात होगी . छूटते ही त्रिपाठीजी से आग्नेयास्त्र छोड़ा, कोई बात नहीं . आज रात यह सौभाग्य आपको प्राप्त हो जायेगा . जन्माष्टमी के मौके पर चौक थाने में बेगार के तौर पर उनकी शहनाई बजने वाली है . जाहिर सी बात है, सिपाही पर अनुशासनात्मक कार्यवाई की गयी और एसओ को दोषी नहीं बनाया गया ताकि मामला ज्यादा तूल न पकडे .
ऐसे थे हमारे खां साहब जो पैदा तो डुमरांव, बक्सर बिहार में हुए थे पर नाज हम बनारसियों के हिस्से में दे गए . अमेरिका सिर्फ इसलिए नहीं बसे क्योंकि वहां गंगा घाट न था . वे बनारस के उस सुनहरे दौर के नायाब हीरा थे जिसके विषय में कहा जाता था कि –
आप भोर में चौकाघाट से अपनी यात्रा शुरू कीजिये . संजयनगर कालोनी में गिरिजा देवी का अलाप सुनते हुए कबीरचौरा पहुंचिए तो आपको एक हाथ से हैंडपंप चलाते हुए दूसरे हाथ से पानी पीते किशन महाराज के दर्शन हो जायेंगे . अभी आप उनसे उबरे ही न होंगे कि दालमंडी में हवा में फैले तबले और शहनाई के सुमधुर माहौल के बीच लकड़ी से बकरी का चारा चलाते अद्धी बंडी में बिस्मिल्ला खां साहब के दर्शन कर दशाश्वमेध चैराहे पर डेंड़सी पूल की और लपकते नामवर सिंह के दर्शन हो सकते हैं . चलते – चलते अस्सी चौराहे पर पहुंचते ही पप्पू की चाय की दूकान के चंद्रशेकर मिश्र के लिए एक साथ कई कवियों और लेखकों के ” पालागी गुरूऊऊऊ ….” पर मुक्त हस्त आशीष का लाभ ले दस कदम आगे बढ़ते ही अस्सी घाट से अपने रविन्द्रपुरी स्थित आवास की तरफ लपकते हजारीप्रसाद द्विवेदी के दरसन का पुण्य लाभ ले लंका चौराहे से १०० मीटर पहले ही किसी लस्सी के अड़ी पर सुकदेव सिंह के कबीर चिंतन पर बहस करते हुए विद्या के महासागर बीएचयू के लंका गेट पर वर्तमान काशी नरेश के गार्डियन का रूतबा रखने वाले गार्जियन जी की चाय की दूकान पर देश भर के बड़े नेताओं पर बनारसी अंदाज में कैंची चला सकते हैं .

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