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इंट्रो : आज के भागदौड़ वाले दौर में आम आदमी को तमाम शारीरिक और मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं . इन बीमारियों के लगातार दिखने वाले लक्षणों को लेकर लापरवाह होने से गंभीर नुकसान की संभावना प्रबल हो जाती है . इन्हीं तथ्यों को रेखांकित करता है ये लेख .

मनोविज्ञान को ” मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान ” कहा जाता है . कहावत है कि ” मन चंगा, तो कठौती में गंगा, ” लेकिन अगर मन चंगा न हो, मन में किसी तरह की परेशानी या उलझन हो, तो इसका असर हमारे मन के साथ – साथ तन पर भी दिखने लगता है .

मनोविज्ञान के शुरुआती अध्ययनकर्ता इसके ” मन तथा मस्तिष्क का विज्ञान ” वाली अवधारणा के आधार पर इस बात पर बल देते थे कि इसके तहत केवल व्यक्ति के मन या मस्तिष्क संबंधी परेशानियों या व्याधियों का अध्ययन किया जाना चाहिए, लेकिन जैसे – जैसे मन की परतें खुलती गयीं, यह बात सामने आती गयी कि मनोवैज्ञानिक समस्याओं का संबंध केवल मन या मस्तिष्क की समस्याओं से ही नहीं है, बल्कि हमारी शारीरिक समस्याओं से भी है .

आज के समय में जीवन की बढ़ती जटिलताएं, रोजाना की भागदौड़, प्रदूषण, आर्थिक – सामाजिक परिवेश आदि सब नित नयी मनो – शारीरिक समस्याओं को जन्म दे रहे हैं . आमतौर से लोग डिप्रेशन, मेमोरी लॉस, अल्जाइमर, फोबिया, डिस्लेक्सिया आदि को ही मनोवैज्ञानिक समस्याएं मानते हैं . वे शायद यह सोच भी नहीं सकते कि ब्लडप्रेशर, हार्ट अटैक, अल्सर, ब्रेन ट्यूमर, कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लेकर जोड़ों में दर्द, साइनस, मेमोरी लॉस जैसी समस्याओं के पीछे भी मनोवैज्ञानिक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं .

दरअसल हर व्यक्ति में जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने की भिन्न क्षमता होती है . कुछ लोग सुख हो या दुख – हर परिस्थिति में खुद को नॉर्मल रखने में सक्षम होते हैं, जबकि कुछ लोग छोटी – छोटी परेशानियों में भी घबरा जाते हैं . हाइ मेंटल प्रेशर झेल नहीं पाते . इस मेंटल प्रेशर का प्रभाव उनकी पाचन क्रिया, श्वास क्रिया, रक्त प्रवाह तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं पर पड़ने लगता है . जैसे – गुस्से में इंसान का चेहरा लाल हो जाता है, गला सूखने लगता है, सांस और की गति तेज हो जाती है .

वैसे तेा सामान्य व्यक्ति भी इन संवेगों का अनुभव करते हैं, लेकिन संवेग क्षणिक या टेम्पोररी होते हैं . वे आसानी से उन पर काबू पा लेते हैं, लेकिन जब यही संवेग बार – बार व्यक्ति को परेशान करने लगते हैं, तो वह उन पर काबू पाने में खुद को असमर्थ महसूस करता है . फलत : उनका यह मानसिक द्वंद शारीरिक समस्याओं के रूप में उभरने लगता है .

APA (American Psychological Association) के अनुसार – “” मनोशारीरिक विकारों से ऐसी प्रतिक्रियाओं का पता चलता है, जिनकी अभिव्यक्ति अंतस्रावी प्रभावों में ही देखी जा सकती है तथा जिसके कारण उनका स्वरूप अधिकांश या चेतर स्तर पर व्यक्त नहीं हो पाता .””

विडंबना यह है कि मानसिक बीमारियों को लेकर हमारे समाज में काफी सारी भ्रांतियां व्याप्त हैं . सरकार भी इस मुद्दे पर कुछ खास संजीदा नजर नहीं आती, जबकि जरूरत है हमें इनके बारे में जानने, इनके सही कारणों को समझने और इनका समुचित निदान करने की, ताकि हर व्यक्ति स्वस्थ चित और स्वस्थ तन के साथ अपनी जिंदगी व्यतीत कर सके .

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