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इंट्रो : सौर मंडल के सबसे बड़े ग्रह और देवताओं के गुरु कहे जाने वाले वृहस्पति का मानव जीवन पर काफी व्यापक प्रभाव पड़ता है . शुभ लक्षणों से युक्त होने पर जहां यह मनुष्य को उच्च पद पर आसीन करता हैं वहीं नीच स्थान पर होने पर दुष्प्रभाव भी देता है . नौ ग्रहों की इस श्रृंखला में आज पंडित प्रसाद दीक्षित जी ने वृहस्पति के फलाफल योग का सूक्ष्मता से वर्णन किया है …….

बृहस्पति कठिन परिस्थितियों में भी विचलित ना होने वाला, लोगों के विचारों को अपने अनुकूल बनाने वाला, धार्मिक विचारों और भावनाओं में आस्था, वाचन और भाषण का पंडित है l इसके कथन प्रामाणिक और कसौटी पर खरे उतरने वाले अर्थ की अपेक्षा सम्मान को अधिक महत्व देने वाला, मधुर, कोमल हृदय स्त्रियों के प्रति सहज सम्मान होना, सुंदर, सुशील और सलीकेदार स्त्रिया पसंद करने वाला, धर्म संगत व्यापार का स्थान, समान कानून, पूजा पाठ, मंत्र, विद्यालय, धारा सभा, दान – दक्षिणा, सहानुभूति प्रतिनिधित्व करता है l बृहस्पति का प्रभाव मूत्राशय पर रहता है l इसके अपने नक्षत्र पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद है l यह पुल्लिंगी और राजस स्वभाव वाला ग्रह है l इसका उच्च स्थान कर्क एवं नीच स्थान मकर है l बृहस्पति की मित्र राशियां मेष, सिंह, कन्या और वृश्चिक है तथा शत्रु राशियां वृष, मिथुन एवं तुला है l

बृहस्पति का सूर्य के साथ सात्विक चंद्र के साथ राजस तथा मंगल के साथ तामस व्यवहार होता है l बुद्ध तथा शुक्र के साथ इसके संबंध शत्रुतापूर्ण होता है l यह अपने स्थान से पंचम, सप्तम और नवम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है l इसकी विंशोत्तरी महादशा काल 16 वर्ष की होती है l कुंडली में विभिन्न स्थितियों के अनुसार गुरु से संतान सुख एवं विद्या का अध्ययन किया जाता है l इसके अतिरिक्त केंद्रीय गृह राज्य सम्मान, लाभ, कीर्ति और पवित्र व्यवहार का बोध इसी ग्रह के द्वारा किया जाता है l मेष, कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न में बृहस्पति योगकारक है l कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में यह शुभ फल प्रदान करता है तथा इसके विपरीत यह स्वाति, शतभिषा आदि नक्षत्रों पर रह कर जातक को हानि पहुंचा देता है k विवाह के समय कन्या के लिए इस ग्रह का विशेष रुप से अध्ययन करना चाहिए l कन्या की राशि में चतुर्थ, अष्टम और द्वादश गुरु बृहस्पति विवाह के लिए अमंगलकारी है l अन्य ग्रहों के विपरीत बृहस्पति स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उत्तम फल प्रदान करता है l बृहस्पति पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी, पुरुष जाति ग्रह है l लग्न में बृहस्पति चंद्र के साथ यदि हो तो गजकेसरी योग बनता है जो अत्यंत शुभ फल देने वाला होता है l यदि बृहस्पति अरिष्ट हो चर्बी कफ पर प्रभाव डालता है l

कुंडली में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि का हो तो पुखराज धारण ना करें करें यदि व्यक्ति बृहस्पति शुभ हो या शत्रु ग्रहों से युक्त होकर शुभ फल प्रदान ना कर पा रहा हो तो पुखराज या टोपाज सोना / पीतल अथवा ब्रास में दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली में बृहस्पतिवार को पूर्व दिशा की ओर मुंह करके धारण करना श्रेष्ठ एवं सुखद रहेगा l खड़ी हल्दी की गांठ गले में धारण करना श्रेष्ठ रहेगा l

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