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आज के भागदौड़ वाले जेट-युग में स्वयं को समय देना बड़ा कठिन होता जा रहा है, और स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए फास्ट फूड का सेवन, तनाव के दौरान वैज्ञानिक चेतावनी के बावजूद भी धूम्रपान और मद्यपान तो है ही। समय-समय पर शरीर के द्वारा की जाने वाली शिकायतों को सुनने के लिए फुरसत किसके पास है?

मा नव जीवन और उसका मूल्यांकन वर्तमान युग का संवेदनशील विषय है। उसका परिमापन कठिन है। व्यक्ति का सामाजिक मूल्य, ऐश्वर्य, कीर्ति जीवन के मूल्यांकन के सूत्र अवश्य हैं; परंतु इन सब से अधिक मूल्यवान है व्यक्ति का सुदृढ़ स्वास्थ्य। मेरा मानना है कि एक स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ और सम्पन्न राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। असंख्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति अपने गुणों का सौ प्रतिशत उपयोग कभी भी नहीं कर सकता। इसलिए सुदृढ़ स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहने वाले व्यक्ति जीवन जीने की कला सीखते हैं और सुदृढ़ राष्ट्र का अंग बनते हैं। निरोगी शरीर, निश्चल मन और आध्यात्मिक विचार ही संतुलित जीवन के मूल्यांकन का मंत्र है।

आज के भागदौड़ वाले जेट-युग में स्वयं को समय देना बड़ा कठिन होता जा रहा है, और स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए फास्ट फूड का सेवन, तनाव के दौरान वैज्ञानिक चेतावनी के बावजूद भी धूम्रपान और मद्यपान तो है ही। समय-समय पर शरीर के द्वारा की जाने वाली शिकायतों को सुनने के लिए फुरसत किसके पास है? हां! आदत से मजबूर इन्सान जरूरत पड़ने पर रंगबिरंगी औषधीय गोलियां खाने के लिए तत्परता से तैयार रहता है; क्योंकि उसे अल्प समय में केवल गोली मुंह में डालनी है, पानी का घूंट पीना है और अपनी रोजमर्रा की व्यस्तता में वापस जुड़ जाना है।

लेकिन, एक बार जब यही शरीर रोगमय होकर अपने हाथों से छूटने लगता है तो उसका स्वागत करने के लिए तत्पर रहता है अस्पताल का आईसीयू। वहां तो मरीज बने उस व्यक्ति के पास वक्त ही वक्त होता है। वाह! क्या नजारा होता है…. यह ‘अति व्यस्त’ व्यक्ति अस्पताल के बिस्तर पर लेटा हुआ है… नाक में लगी हैं कुछ नलियां आक्सीजन सिलेंडर से संलग्न… हाथों पर हैं दूसरी नलियां ग्लुकोज और इंजेक्शन से जुड़ी हुईं…. बगल में मॉनिटर पर खेल रहे हैं आंकड़े और रेखाएं, और उन्हें 24 घंटे कागज पर लिखने वाली परिचारिकाएं एवं डॉक्टर।

कक्ष के बाहर उस व्यक्ति का परिवार इस इंतजार में प्रार्थना करता रहता है कि कब उनका प्रिय व्यक्ति स्वस्थ हो जाए। कक्ष से बाहर आने की संभावनाएं सीमित होती हैं और माहौल होता है सिर्फ चिंता एवं भय का।

हम, हमारा परिवार और हमारे सपनों की डोर बंधी होती है स्वस्थ और सुदृढ़ शरीर के साथ। स्वस्थ और सुदृढ़ शरीर के लिए जरूरी है हमारी सही आदतें और आत्म अनुशासन। चौबीस घंटों को सही रूप से विभाजित करके हम निश्चित रूप से आनंदमय जीवन जी सकते हैं। इससे हम स्वयं, परिवार व राष्ट्र लाभान्वित होता है।

हम चाहें तो स्वास्थ्य की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। बस हमें यह सोचना है कि जीवन जीने का कुछ उद्देश्य होना चाहिए। हां, महज उद्देश्य होना ही काफी नहीं है, अपितु उस रास्ते पर हमें निग्रही मन एवं दृढ़ भावनाओं के साथ चलना भी चाहिए। मंजिल बुलंद हो। कृति और प्रकृति को समझ कर नियमित रूप से रोज स्वयं के लिए केवल 30 मिनट का योगाभ्यास, स्वनियंत्रित संतुलित आहार, 15 मिनट का ध्यान और सप्ताह में एक दिन उपवास करना आवश्यक है। यह कठिन कार्य नहीं है। इसीके साथ अपनी रुचि के अनुसार संगीत सुनना, वाचन करना, पैदल घूमना, प्रकृति के निकट रहना है। इसके जैसा आनंद और कोई नहीं। सीमेंट-कंक्रीट के जंगल से बाहर जाकर नदियों, झरनों, पहाड़ों के साथ रहते हुए शुद्ध हवा और प्रकृति के प्रेम को स्वीकार करें। आज जटिल और गंभीर बीमारियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा जैसी आश्चर्यकारक एवं प्रभावी चिकित्सा पद्धति अपनाई जा रही है। हजारों साल पूर्व की यह चिकित्सा पद्धति है, जो बीमारी की जड़ तक पहुंच कर उसे समूल नष्ट कर देती है।

मनुष्य के विचारों का उसके स्वास्थ्य और रुझान पर सीधा असर पड़ता है। एक जगह ध्वंस, हत्याएं, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार व असुरक्षित जीवन है तो दूसरी जगह जीवन का मूल्यांकन सकारात्मक विचारों के जरिए करने का व्यापक दृष्टिकोण मौजूद है!

योग भारत की अति प्राचीन संस्कृति की विरासत है। योग केवल शारीरिक आसन तक सीमित नहीं है। वह प्राणायाम, ध्यान और शुद्धि की प्रक्रिया के माध्यम से विचारों को सुसंस्कृत बनाता है। निरोगी जीवन के लिए मन में लगन होनी चाहिए; क्योंकि जीने का दूसरा नाम ही जीवन है। हमारी आदतें हमारे जीवन की सहेलियां हैं।

हमारे देश को विश्व के नक्शे पर गौरवपूर्ण व समृद्ध देखने के लिए हर देशवासी अपने लिए और अपने भारत देश के लिए एक प्रतिज्ञा लें कि हम शरीर को खोखला करने वाली बुरी आदतों को त्यागेंगे और परिवाररूपी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए स्वस्थ शरीर व मन के साथ योगदान देंगे।

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