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अगर आप अपने बच्चों के प्रत्येक व्यवहार का बारीकी से विश्लेषण करते हैं, तो आपको कई सारे ऐसे पहलू मिल सकते हैं जिनसे उनके व्यवहार को एक सकारात्मक दिशा दी जा सकती है.

हर अभिभावक यही चाहते है कि उनके बच्चे एक निश्चित तरीके से बात-व्यवहार करें. वे स्मार्ट, फनलविंग, विनम्र, केयरिंग और चंचल हों. कई बच्चे ऐसे ही होते भी हैं, जबकि कई इससे विपरीत स्वभाव के होते हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि उस बच्चे के विकास में या फिर उसकी परवरिश में कोई कमी रह गयी है. ऐसी स्थिति में आपको सबसे पहले तो  बच्चे के उस व्यवहार को समझने की जरूरत है, जिसमें आप अनुकूल वांछित परिवर्तन चाहते हैं, ताकि आप उसके अनुरूप उसे सही मार्गदर्शन दे सकें. दरअसल बच्चों का व्यवहार ही उनके संचार का सबसे सशक्त माध्यम होता है. वे अक्सर ‘मुझे यह चाहिए’, ‘मुझे वह पसंद नहीं’, ‘यह मेरा है’… जैसे वाक्यों का उपयोग करते हैं. इसके आधार पर ही काफी हद तक उनके व्यवहार को समझा जा सकता है.

इसे ही मनोविज्ञान में व्यवहार पैटर्न का ‘एबीसी फॉर्मूला’ कहते हैं. इसके तहत चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक, बच्चों के प्रत्येक व्यवहार में तीन चीजें शामिल होती हैं : पूर्ववर्ती कारक, मुख्य व्यवहार तथा उसका अनुमानित परिणाम. आपको बस उन पर अपनी पैनी नजर रखनी है.

पूर्ववर्ती कारक :

किसी घटना या व्यवहार की उत्पत्ति हेतु उत्तरदायी कारक और कई बार तो वैसी आकस्मिक घटनाएं बच्चे को कोई विशेष व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती हैं. 

व्यवहार :

पूर्ववर्ती कारक के प्रभाव स्वरूप बच्चे द्वारा व्यक्त की गयी प्रतिक्रिया 

परिणाम :

बच्चे का वर्तमान व्यवहार क्या है या होगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि उससे मिलते-जुलते उसके किसी पूर्व व्यवहार का परिणाम क्या था. 

बच्चों के व्यवहारगत समस्याओं से निपटने के लिए अभिभावकों को चाहिए कि वे सबसे पहले शांतचित होकर अपने बच्चे के इन व्यवहार पैटर्नों को गहरायी से समझने का प्रयास करें. फिर उसके अनुकूलन हेतु उपयुक्त कदम उठाएं. साथ ही, इस दिशा में एक बात का विशेष तौर से ख्याल रखें कि बच्चों को किसी भी व्यवहार पैटर्न को बदलने या अपनाने के लिए जबरन बाध्य न करें. इससे उनमें कई अन्य तरह की व्यवहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं. बेहतर होगा आप पहले खुद उसका उदाहरण पेश करें, फिर बच्चे को भी उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करें.

 

 

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