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कहते हैं जोड़ियां आसमान में बनती हैं। उस जोड़ी का नसीब भी ऊपर वाला लिख चुका था ; बस उन्हें मिलना शेष था। यह मुलाकात रोचक होने वाली थी और इसके बाद का सफर और भी रोचक और सफलता से भरपूर। दो अलग – अलग दिशा से आए सामान्य से चेहरे मोहरे वाले यह शख्स जब मिले तो शायद संगीत के होठों पर भी मुस्कान बिखर गई होगी। भारतीय फिल्म संगीत का एक नया अध्याय शुरू हो चुका था।

संगीतकार शंकर जयकिशन की जोड़ी किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है, लेकिन इनका मिलना और फिर संगीत के सफर में इतिहास गढ़ते जाना इन दोनों महान संगीतकारों की याद बरबस ही दिला देता है। इस जोड़ी के जयकिशन दयाभाई पांचाल का जन्म 4 नवम्बर 1929 को गुजरात में हुआ था। यूं तो हारमोनियम बजाने में माहिर जयकिशन ने संगीत विशारद वाडीलाल, विनायक तांबे और प्रेमशंकर नायक जैसे संगीत के ज्ञाताओं से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी, लेकिन सपना उनकी आंखों में अभिनेता बनने का पल रहा था। यह ख्वाब लिए किशोरावस्था में जयकिशन बंबई आ पहुंचे और यहां एक फैक्ट्री में नौकरी कर नी शुरू कर दी। शंकर का पूरा नाम शंकरसिंह रघुवंशी था। उनका जन्म 15 अक्टूबर 1922 को अविभाजित पंजाब में हुआ था। बचपन से ही शंकर संगीतकार बनना चाहते थे और उनकी रूचि तबला बजाने में थी। सांताक्रूज में एक निर्माता के दफ्तर में जयकिशन की मुलाकात मध्यप्रदेश में जन्मे और हैदराबाद से आए शंकर से हुई। शंकर उस वक्त पृथ्वी थियेटर में तबला वादक थे। पहली मुलाकात में ही दोनों को एक – दूसरे का साथ भाने लगा। शंकर ने जयकिशन को भी पृथ्वी थियेटर में काम करने का सुझाव दिया और वहां उन्हें हारमोनियम वादक की नौकरी दिला दी। 1948 में राज कपूर की पहली फिल्म आग के निर्माण में दोनों संगीतकार राम गांगुली के सहायक के तौर पर काम करने लगे। इस दौरान राज कपूर की नजर इन दोनों पर पड़ी और उन्होंने शायद इनमें संगीत का एक नया भविष्य देख लिया था। अपनी अगली फिल्म बरसात के लिए संगीतकार के तौर पर शंकर – जयकिशन को चुना।

 
यहां से दोनों की नई पारी का आग़ाज़ हुआ। फिल्म बरसात सुपरहिट रही और यह जोड़ी चल निकली। अगले दो दशक तक इस जोड़ी ने दर्शकों और श्रोताओं के दिल पर राज किया। एक से बढ़कर एक फिल्में इनके खाते में जुड़ती गई और बेहतरीन संगीत का लुत्फ संगीत प्रेमी उठाते गए।

170 फिल्मों में दिया संगीत

शंकर – जयकिशन की जोड़ी ने करीब 170 फिल्मों में संगीत दिया। आवारा, आह, श्री 420, अनाड़ी, चोरी – चोरी, बूट पॉलिश, संगम, बादल, दिल अपना और प्रीत पराई, जिस देश में गंगा बहती है, जंगली, जब प्यार किसी से होता है, ससुराल, हमराही, कन्यादान, मेरा नाम जोकर, अंदाज, ब्रह्मचारी सहित कई फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया। उन्हें 9 बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया। इस जोड़ी ने पुरस्कार की हैट्रिक भी लगाई। उस दौर में इन्होंने कई बेहतरीन गायक – गायिकाओं के साथ काम किया। इस जोड़ी ने 1949 से 1969 तक भारतीय फिल्म संगीत को अपने शीर्ष स्तर पर पहुंचाया।

जयकिशन ने तोड़ दिया था करार

संघर्ष के बाद सफलता मिलती गई लेकिन किस्मत को कुछ और भी रंग दिखाने थे। जयकिशन को अपने दोस्त शंकर की जुदाई का बोझ उठाना पड़ा। दोनों के बीच करार हुआ था कि वे धुन को लेकर कभी यह बात सार्वजनिक नहीं करेंगे कि धुन किसकी बनाई हुई है। लेकिन जयकिशन ने फिल्म फेयर के एक हस्ताक्षरित लेख में यह बता दिया कि फिल्म संगम का गीत यह मेरा प्रेम पत्र पढ़कर की धुन उन्होंने बनाई थी। यहां से दोनों के बीच दूरियां बढ़ना शुरू हो गई। समझौते के प्रयास भी हुए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 12 सितंबर 1971 को जयकिशन का निधन हो गया। 26 अप्रैल 1987 को शंकर भी इस दुनिया से अलविदा कह गए।

कई बेहतरीन गीत दिए

 

शंकर – जयकिशन की जोड़ी ने फिल्मों में कई बेहतरीन गीत दिए। इनमें ‘ मेरी आंखों में बस गया कोई ’, ‘ जिया बेकरार है छाई बहार है ’, ‘ मुझे किसी से प्यार हो गया ’, ‘ हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा ’, ‘ अब मेरा कौन सहारा ’, ‘ बरसात में हमसे मिले तुम सजन ’, ‘ आवारा हूं ’ आदि शामिल हैं।

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