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इंट्रो : स्त्रियोचित भाव वाले तथा दैत्य गुरु माने जाने वाले शुक्र गृह का मानव स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है . ख़ासकर मानव के प्रेम संबंधों, सन्तानोत्पादकता आदि विषयों के लिए काफी हद तक शुक्र उत्तरदायी होता है पर विभिन्न उपायों द्वारा उनका निराकरण भी किया जा सकता है . वृष और तुला राशि के स्वामी शुक्र के स्वभाव व भावों का विवेचन करता पंडित प्रसाद दीक्षित का आलेख ………

आप अपने इर्द – गिर्द नजर डालें, आकाश मंडल पर दृष्टि डालें तो आपको विचित्रताओं का खजाना प्राप्त होगा l एक सहज स्वाभाविक उत्कंठा, उत्सुकता उत्पन्न होगी l मस्तिष्क हलचल करने लगेगा l आखिर सूर्य, चंद्र, तारे, उल्काएं, पुच्छल तारे, आकाशगंगा, इंद्रधनुष आदि क्या हैं ? आंधी तूफान एवं उल्कापात कैसे होते हैं ? ऋतु कैसे बदलती है ? सूर्य पूर्व दिशा में ही उदय होता है ? वर्षा कैसे होती है ? जो घर त्याग चुके हैं, राग – द्वेष, काम – क्रोध परे वीतरागी हैं, साधु, संयासी, महात्मा भी भविष्य के लिए जिज्ञासु रहते हैं l आवश्यकता आविष्कार की जननी है l गुप्त को प्रकट करना, उसका स्वभाव, रहस्य से पर्दा हटाना उसकी आदत है l क्यों, कैसे, कहां का उत्तर ढूंढने का सतत प्रयास वह करता है, एवं इसी कारण मानव पाषाण युग से स्पुतनिक युग तक पहुंच गया है l आगे भी भविष्य जानने के लिए लालायित रहेगा, यह कटु सत्य है l मानव सहज स्वभाव है तथा जब अनजान से विज्ञ हो जाता है तो आनंद की अनुभूति होती है l वह हर्षित होता है एवं तृप्ति होती है l वह अप्राप्य को प्राप्त कर धन्य हो जाता है l अपनी जिज्ञासा की शांति के लिए मनुष्य ने आदि अनादि काल से अनेक उपाय किए हैं l कुछ उपाय को खोजे हैं एवं कुछ खोज रहे हैं l आकाश मंडल के अवलोकन से हमें असंख्य नक्षत्र, विभिन्न राशियां, सूर्य, चंद्र एवं ग्रह दृष्टिगोचर होते हैं l यह सभी परस्पर आकर्षण से बने एक निश्चित समाज में निश्चित परिक्रमा करते रहते हैं और समस्त ग्रह नक्षत्र एवं तारों का प्रभाव मानव जीवन पर न्यूनाधिक रूप से पड़ता है, जिसका समर्थन भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने किया है l भविष्य जानने के लिए आर्य ऋषियों में कई सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं l

शुक्र ग्रह आकार में पृथ्वी के समान ही है l यह भी सूर्य की परिक्रमा किया करता है और एक परिक्रमा 225 दिनों में पूरी करता है l यह सदा बादलों से ढका रहता है किंतु वे बादल काले की अपेक्षा सफेद ही होते हैं l सौर परिवार में चंद्रमा के पश्चात इससे चमकदार अन्य कोई ग्रह नहीं है l अपनी इस चमक के कारण ही यह प्रायः दिन में भी आकाश मंडल में चमकता दिखाई पड़ता है l यह सूर्य तथा पृथ्वी के मध्य में स्थित है और सूर्य के कक्षा अंश से 60 अंश के भीतर ही रहता है l इसकी दूरी 6,70,00, 000 मील और गति 22 मील प्रति सेकंड है l यह आकाश मंडल में सूर्योदय के लगभग 3 घंटे पूर्व से सूर्योदय होने तक दिखाई पड़ता है, और इसी प्रकार सूर्यास्त से लगभग 3 घंटे बाद तक तक दिखाई पड़ता है l शुक्र वासनात्मक, श्रृंगारिक और व्यवहारिक चेतना और क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करता है l प्रेम, सौंदर्य उपासना, भोग विलास आनंद की ओर इसका विशेष आकर्षण है l यह स्वप्नलोक में विचरण करने वाला नहीं होता बल्कि वास्तविक दुनिया में जागरुक होकर संबंध रखता है, और इसकी व्यवहार कुशलता अन्य सभी ग्रहों के ऊपर होती है l यह बृहस्पति की तरह परमार्थी नहीं होता बल्कि स्वार्थ को प्रथम स्थान देता है l धर्म – अर्थ – काम – मोक्ष सभी की साधना करता हुआ भी काम को अधिक महत्व देता है l सुंदर और भौतिक, आनंददायक पदार्थ, नाच – गाना, वाद्य सिंगार, कलात्मक और भोग उपभोग की सामग्रियों का विशेष सत्कार करता है l सुसंस्कृत होता है, संस्कृत चाहता है l विचार इसके स्वतंत्र एवं स्वार्थपरक होते हैं l आकार, वर्ण, गला एवं लिंग पर इसका विशेष प्रभाव होता है l शुक्र का रंग सफेद है और यह दक्षिण – पूर्व का स्वामी होता है l

दैत्य गुरु शुक्र का अधिकार चेहरे पर विशेष रहता है l यह एक राशि पर डेढ़ माह तक रहता है l अंग्रेजी में इसे ” वीनस ” भी कहते हैं l यह वृष और तुला राशि का स्वामी है, जिसमें यह तुला राशि पर विशेष बली होता है l इसके अपने नक्षत्र भरणी, पूर्वाफाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा है l स्त्रीलिंग तथा राजस्व गुणों वाला है l इसकी अपनी उच्च राशि मीन एवं नीच राशि कन्या होती है l शुक्र की मित्र राशियां धनु, मकर तथा शत्रु राशियां कर्क एवं सिंह है l यह बुध के साथ सात्विक, शनि एवं राहु के साथ तामस तथा चंद्र, सूर्य और मंगल के साथ शत्रुवत व्यवहार करता है l शुक्र की दैनिक गति 76 कला और 7 विकाला होती है l इसकी विंशोत्तरी महादशा काल 20 वर्ष की होती है l यह अपने स्थान से सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है l जन्म कुंडली में विभिन्न स्तरों के अनुसार शुक्र ग्रह से विवाह, सगाई, संबंध विच्छेद, तलाक तथा संबंधित कार्य, प्रेमिका आदि सुख, संगीत, चित्रकला, निपुणता, छलकपट, कोषाध्यक्ष, थाना अध्यक्षता विदेश गमन आदि का अध्ययन किया जाता है l मिथुन, कन्या, मकर और कुंभ लग्न में यह योग कारक होता है l आश्लेषा, रेवती, कृतिका और आर्द्रा नक्षत्र पर रहकर यह शुभ फल देता है तथा भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, चित्र, मृगशिरा, चित्र, धनिष्ठा आदि नक्षत्रों पर अशुभ फल प्रदान करता है l

शुक्र यदि अपनी उत्तम स्थिति में हो तो उत्तम सुख प्रदान करता है किंतु विपरीत हो तो यह नपुंसकता, वीर्य, इंद्रिय संबंधित रोग उत्पन्न करता है l कुछ ग्रहों के योग से युक्त शुक्र अन्य रोगों को को भी उत्पन्न कर देता है, जैसे यदि अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में लग्नाधिपति मंगल, चंद्र, शुक्र हो तो उस व्यक्ति को हार्निया संबंधित बीमारी होती है l यदि अष्टम भाव में शुक्र हो और लग्न में शनि हो एवं शुक्र पर सूर्य का प्रभाव हो तो व्यक्ति को पेशाब में धात आती है l अष्टमेश मंगल के साथ सूर्य की युति हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो वीर्य स्त्राव दोष होता है l

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