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मखमली आवाज के धनी और बॉलीवुड के सदबहार गायकों की तिकड़ी के सबसे सुरीले गायक मुकेश ने लगभग तीन दशकों के कैरियर में २०० से अधिक फिल्मों में गीत गाए थे . अमेरिका में हार्ट अटैक से मौत हो जाने के बावजूद उनकी आवाज का जादू आज भी बरकरार है . इस लेख में सुधीर दुबे उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को लेकर आये हैं …..

कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिनके कानों पर पड़ते ही जज़्बातों के कई रंग ज़िन्दगी में बिखरने लगते हैं। प्रेम, मौसम, खुश्बू, लम्हात, दर्द और ऐसे ही तमाम शब्द एक धुन में पिरोए मोतियों की तरह ख़ुबसूरत आवाज़ में ढलकर सुनने वाले को एक अनूठे सफर पर ले जाते हैं। यह आवाज़ भुलाये नहीं भूली जाती। ऐसी ही एक आवाज़ के मालिक गायक मुकेश और उनकी मखमली आवाज़ को संगीत प्रेमी कभी नहीं भूल पाये।

 

इस आवाज़ की जादूगरी ने उस वक्त कितनों को अपना दीवाना बनाया होगा, कितनों ही ने ग़म में इस आवाज़ का सहारा लिया होगा, न जाने कितनों ने अपनी खुशियों में उन नग़मों को सुनकर इज़ाफा किया होगा, यह सिर्फ महसूस भर किया जा सकता है। मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था, उनका पूरा नाम मुकेशचन्द माथुर था। उनके पिता ज़ोरावरचन्द्र माथुर इंजीनियर थे, मुकेश उनके 10 बच्चों में छठें नम्बर पर थे। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा ग्रहण की थी। कहते हैं अपनी बहन की शादी में रिश्तेदार मोतीलाल ने मुकेश को गाते सुना था। इस आवाज़ ने उन्हें खासा प्रभावित किया और उन्हें अपने साथ बम्बई ले आए। यहां वह मोतीलाल के साथ ही रहने लगे और रियाज़ शुरू कर दी। संघर्श शुरू हो चुका था। सबसे पहले हिन्दी फिल्म निर्दोष (1941) में उन्हें एक्टर – सिंगर का काम मिला। पार्श्व गायक के रूप में फिल्म ‘ पहली नज़र’ (1945) में उन्होंने पहला गाना ‘ दिल जलता है तो जलने दे ’ गाया था। मोतीलाल ने इसमें अदाकारी की थी। के . एल . सहगल उन्हें सुनकर काफी प्रभावित हुए थे। 1959 में आयी फिल्म अनाड़ी में राज कपूर पर फिल्माया गया गीत ‘ सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी ’ के लिये मुकेश को बेस्ट प्ले बैक सिंगर का फिल्म फेयर अवार्ड मिला था। राष्ट्रीय पुरस्कार भी उन्होंने अपने नाम किया, फिल्म थी 1974 में आयी रजनी गंधा और गीत था ‘ कई बार यूं भी देखा है। नौशाद के साथ मुकेश की जुगलबंदी ने कई सुपरहिट गीत दिए। परदे पर दिलीप कुमार और मुकेश की आवाज़ ने कई दफा जादू बिखेरा। 50 के दशक में मुकेश को एक नई पहचान मिली, उन्हें राज कपूर की आवाज़ कहा जाने लगा था। यहूदी, मधुमती, अनाड़ी जैसी फिल्मों ने उन्हें एक नई पहचान दी। 60 के दशक में उन्होंने कल्याणजी आनंदजी, नौशाद और एस . डी . बर्मन के साथ बेहतरीन गीत दिए। शंकर जयकिशन के साथ भी मुकेश ने गीतों को खुबसूरत बनाया। 70 के दशक तक मुकेश हर बड़े सितारे की आवाज़ बन चुके थे। मुकेश ने 40 साल के लम्बे करियर में 200 से ज्यादा हिन्दी फिल्मों में गीत गाये।

 

मखमली आवाज़ से सजे कई नग़मे

मुकेश की मखमली आवाज़ से हिन्दी फिल्मों के कई नग़मे सजे। इनमें ‘दोस्त दोस्त न रहा ’, ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई ’, ‘कहता है जोकर ’, ‘आवारा हूं ’, ‘मेरा जूता है जापानी ’, ‘कई बार यूं भी देखा है ’, ‘एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल ’, ‘कभी -कभी ’ सहित कई बेहतरीन नग़मे शामिल हैं। मुकेश ने अपने करियर का अंतिम गीत अपने दोस्त राजकपूर की फिल्म के लिए ही गाया था लेकिन 1978 में इस फिल्म के रिलीज़ होने से दो साल पहले ही मुकेश का 27 अगस्त 1976 को अमेरिका के डेट्रॉयट में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनके पुत्र नितीन मुकेश ने भी बतौर गायक कई हिट गीत दिए हैं, पोते नील नितीन मुकेश फिल्मों में अभिनय में सक्रिय हैं।

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