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हमारे आसपास ज्यादातर लोग किसी खूबसूरत कलाकारी या कलात्मक चीजों को देखना पसंद करते हैं. वहीं कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके लिए कला प्रंशसा करने की चीज नहीं, डरने की वजह होती है. जान कर चौंक गये न ? लेकिन यह सच है.
जो लोग स्टेनडल सिंड्रोम (Stendhal syndrome) या हाइपरकल्चरेमिया (Hyperculturemia) से पीड़ित होते हैं, उनके लिए कला दिल को सूकून देने की नहीं, बल्कि डरने की चीज होती है. यह एक प्रकार की मनोदैहिक या मनोशारीरिक (psychosomatic) व्याधि है. इससे पीड़ित लेाग जब किसी खूबसूरत कलाकृति से रूबरू होते हैं, कहीं ऐसी जगह घूमने जाते हैं, जहां कि एक ही स्थान पर उनका सामना कई तरह की कलात्मक चीजों से होता है (जैसे कि आर्ट गैलरी, म्यूजियम, एक्जीबिशन आदि), तो वहां मौजूद खूबसूरत एवं कलात्मक चीजों को देखते ही वे शारीरिक और मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं. उनके हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं और उन्हें चक्कर आने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप वे पैनिक अटैक्स का शिकार हो जाते हैं. उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रह पाता. वे स्वयं को बेहद भ्रमित और विचलित महसूस करते हैं. कई बार कुछ लोग खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों, जैसे कि- सूर्योदय, सूर्यास्त, बारिश या बर्फबारी को देख कर भी ऐसी प्रतिक्रिया दर्शाते हैं. अगर समय रहते इन लक्षणों या उपचार की ओर विशेष ध्यान न दिया जाये, तो रोग मतिभ्रम (hallucination) या पागलपन (madness) का शिकार भी हो सकते हैं.
इस सिंड्रोम का नाम 19वीं सदी के एक मशहूर फ्रेंच लेखक हेनरी-मेरी बेयले, जो कि अपने पेननेम ‘स्टेनडल’ के नाम से मशहूर थे, उन्हीं के नाम पर रखा गया है. उन्हें पहली बार 34 साल की उम्र में वर्ष 1817 में फ्लारेंस जाने के दौरान ऐसा ‘आर्ट अटैक’ आया था. इसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक ‘नेपल्स एंड फ्लोरेंस : अ जर्नी फ्रॉम मिलान टू रेजियो’ में किया है. इसी वजह इस सिंड्रोम को फ्लोरेंस सिंड्रोम (Florence Syndrome) के नाम से भी जाना जाता है. हैं.
स्टेनडल द्वारा अपनी किताब में इस व्याधि का जिक्र किये जाने के बाद सैकड़ों लोगों ने अपने साथ के ऐसे मिलते-जुलते अनुभवों को शेयर किया. उनमें से अधिकांश अनुभवों में एक दिलचस्प बात यह थी कि ज्यादातर लोगों को इस तरह के अनुभव इटली के फ्लोरेंस शहर में स्थित उफ्फिजी आर्ट गैलरी (Uffizi Art Gallery) में हुए. इसी कारण इस व्याधि को ‘टूरिस्ट डिजीज‘ या फिर आर्ट डिजीज‘ के नाम से भी जाना जाने लगा.
वर्ष 2010 में ब्रिटिश जर्नल ऑफ जेनरल प्रैक्टिस के अंक में, डॉ इयान बामफोर्थ ने यह दावा किया कि महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रॉयड, (जिन्हें ‘आधुनिक मनोविज्ञान का जनक’ कहा जाता है) और कार्ल यु्ंग ने भी स्टेनडल सिंड्रोम के बारे में अपने अनुभवों का उल्लेख किया है. हालांकि इस तरह के सैकड़ों मामलों के प्रकाश में आने और इस संबंध में लोगों द्वारा अपने अनुभवों को शेयर किये जाने के बावजूद अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोशियेसन ने अपने DSM मैन्युअल में अब तक इसे शामिल नहीं किया है. डेली टेलीग्राफ में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इटली के मनोवैज्ञानिकों की एक टीम इस दिशा में पर्यटकों की प्रतिक्रियाओं (हृदय की धड़कन, रक्तचाप, श्वसन दर आदि) पर अध्ययन कर रही है.

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