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भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की मांग समय-समय पर उठती रहीं है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषय पर चर्चा के लिए 19 जून को राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों की बैठक बुलाई है।बता दें कि लगभग एक या दो वर्षों के अंतराल में भारत के अनेक राज्यों में चुनाव होते है।जिसमें हजारों करोड़ो रुपयों का खर्च आता है और समय का नुकसान होता है।आचार संहिता के कारण 40 से 50 दिनों तक फैसले लंबित रहते है और इसका दैनिक जरूरी कार्यो पर विपरीत परिणाम होता है।गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय खजाने से 3426 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।वहीं राजनीतिक दलों द्वारा लगभग 26000 करोड़ रुपये खर्च किये गए थे।चुनाव आयोग के अनुसार विधानसभाओं के चुनावों में लगभग 4500 करोड़ रुपये का खर्च बैठता है।यदि एक साथ चुनाव कराए जाएं तो इस खर्च को काफी हद तक कम किया जा सकता है।इसके अलावा चुनाव के दौरान सुरक्षा में तैनात सुरक्षा कर्मियों के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा बना रहता है।राष्ट्रहित,राष्ट्रीय सुरक्षा,भारतीय अर्थव्यवस्था और समय बचाने के लिए सभी राजनीतिक दलों को “एक राष्ट्र,एक चुनाव” का समर्थन करना चाहिए।यहीं देश की प्रबलतम मांग है।क्या राष्ट्रहित में “एक देश, एक चुनाव” सिद्धांत के अनुरूप चुनाव होना चाहिए ? अपनी बेबाक राय दें

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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