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क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ लोग जब कभी खाली बैठे होते हैं, तो वे अपने आस-पास मौजूद चीजों या फिर अपने पालतू जानवरों से एकतरफा संवाद किया करते हैं ? जैसे- अपने पालतू जानवरों, टेडी बियर, कंप्यूटर, कार या इस तरह ही अन्य चीजें. इस तरह की मानवीय प्रवृति को ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ कहा जाता है. इस प्रक्रिया में व्यक्ति किसी गैर मानवीय तत्व में मानवीय विशेषताओं जैसे कि- भावनां, आसक्ति, निष्ठा आदि को गुणारोपित करने का प्रयास करता है.
वास्तव में ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक वैश्विक मानसिक प्रक्रिया है, जो करीब-करीब हर इंसान में देखने को मिलती है, लेकिन विभिन्न शोध परिणाम यह दर्शाते हैं कोई व्यक्ति जिस हद तक एंथ्रोपोमॉर्फिक होता है, उसके जीवन पर उसी हद तक उसका प्रभाव देखने को मिलता है. ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ का संबंध प्रकृति अर्थात मानवीय स्वभाव से है, इसीलिए यह व्यक्ति को अपने पर्यावरण के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करने में मदद करता है. उसमें जिम्मेदारी और सहानुभूति का एहसास जगाता है.

वैज्ञानिकों का दावा है कि ऐंथ्रोपोमॉर्फिज्म व्यक्ति को इस ग्रह का बेहद स्मार्ट जीव बनाता है. वर्ष 2011 में हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक अध्ययन परिणाम में पाया गया कि जो लोग अपने पालतू जानवरों या अपने पसंदीदा चीजों जैसे कि- टेडी बियर, डॉल आदि के साथ समय बिताना और उनसे बातें करना पसंद करते हैं, वे दूसरों की अपेक्षा ज्यादा भावनात्मक रूप से अधिक स्थिर और बुद्धिमान होते हैं. अध्ययनों में यह भी पता चला है कि यदि आप अपने पालतू जानवर से अपनी बातें शेयर करते हैं, तो इससे वे भी स्मार्ट बनते हैं. आपकी भावनाओं को आसानी और बेहतर तरीके से समझ पाते हैं. जर्नल ऑफ साइंटिफिक स्टेट्स में प्रकाशित एक अध्ययन में तो यह भी दावा किया गया है कि अपने पेट्स के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने और उनसे अपने बातें शेयर करने पर वे भी वैसा ही फील करने लगते हैं, जैसा कि आप. जब उनके ओनर खुश होते हैं, तो वे भी खुश होते हैं, तो वे भी खुश होते हैं और जब वे दुखी या खिन्न होते हैं, तो पेट्स भी वैसा ही महसूस करने लगते हैं. हालांकि निर्जीव वस्तुओं की स्थिति में यह बात साबित नहीं होती.

दूसरी ओर, कुछ लोगों का यह भी दावा है कि ’एंथ्रोपोमॉर्फिक लोगों में कई बार व्यवहारगत अतिवादिता भी देखने को मिलती है, जिसकी परिणती गंभीर मनोवैज्ञानिक व सामाजिक समस्या के रूप में हो सकती है. जैसे- गैर-मानवीय तत्वों के साथ संबद्धता महसूस करने की वजह से अक्सर व्यक्ति में इन चीजों को जमा करने की प्रवृति उत्पन्न हो जाती है. जो लोग अपने पालतू जानवरों से लगाव रखते हैं, वे कई बार अपना दिल बहलाने के लिए उन्हें अप्राकृतिक तरीके से व्यवहार करने हेतु बाध्य करने लगते हैं मानो वे कोई रोबोट हों.

– ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ बनाम ’पर्सनोफिकेशन’

कई लोग ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ और ’पर्सनोफिकेशन’ को लेकर कंफ्यूज होते हैं. कारण कि इन दोनों की शब्दों का अर्थ लगभग समान है. इनमें बड़ा ही बारीक अंतर है. हालांकि गहरायी से हम अगर इन शब्दों का विश्लेषण करें, तो जान पायेंगे कि ’एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ का तात्पर्य किसी गैर-मानवीय तत्व के साथ मानवीय व्यवहार करना है, जैसे कि- अपने टेडी बियर या पालतू जानवर को इंसान समझ कर उससे बातें करना या उसके साथ अपनी फिलिंग्स शेयर करना.

दूसरी ओर, ’पर्सनोफिकेशन’ का अर्थ किसी वस्तु को मानवीय गुणों के आधार पर परिभाषित करना है, जैसे कि- अगर किसी व्यक्ति को कंप्यूटर चलाना नहीं आता, तो वह कहे कि ”कंप्यूटर को जाने मुझसे क्या दुश्मनी है कि वह मेरे दिमाग में घुसता ही नहीं.” या फिर लंबे समय से नौकरी की तलाश में भटक रहे किसी व्यक्ति को अचानक घर बैठे कोई बढ़िया ऑफर मिल जाये और वह कहे कि ”किस्मत ने खुद मुझ पर मेहरबान होकर मेरे घर का दरवाजा खटखटाया है.”

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