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मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की अनुमति का आदेश देने की मांग एक याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में की गई थी। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर उक्त मांग खारिज कर दी कि किसी मुस्लिम महिला को इसे चुनौती देने दें। कोर्ट ने कहा कि याचिका में ऐसी कोई बात नहीं है जो यह बताती हो कि यह एक स्थापित प्रथा है, जो मुस्लिम महिलाओं को अनुच्छेद 25 के अंतर्गत मिले धार्मिक अधिकार से वंचित करती हो। इसके पूर्व केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता एक ऐसा व्यक्ति है जिसे इस्लाम के अनुष्ठान व प्रथाओं से सामान्य रूप से कोई सम्बन्ध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का यह तर्क कितना जायज है ? सर्वविदित है कि मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश और नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती। जिससे उनके धार्मिक और समानता के अधिकार का हनन होता है। यह एक स्थापित प्रथा नहीं तो क्या है ? क्या सुप्रीम कोर्ट को यह बात नहीं पता है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अहम भूमिका निभाई थी लेकिन मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका बदल जाती है। सुप्रीम कोर्ट का यह पक्षपाती और भेदभावपूर्ण रवैया नही तो और क्या है ? सबरीमाला मामलें में भी तो गैरहिंदुओं ने याचिका दायर की थी तब तो कोर्ट को कोई आपत्ति नही थी। उनकी सुनवाई की गई किंतु इस मामलें की सुनवाई से इनकार करना सुप्रीम कोर्ट की न्यायप्रणाली पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहा है ? बता दें कि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश और नमाज पढ़ने की अनुमति की मांग को लेकर पुणे के एक मुस्लिम दम्पति ने भी याचिका दायर की है।लेकिन उस पर भी न्यायालय का कोई निर्णय नहीं आया है। क्या सबरीमाला की तर्ज पर मुस्लिम महिलाओं को भी मस्जिदों में प्रवेश और नमाज पढ़ने का धार्मिक अधिकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिलेगा ? अपनी बेबाक राय दें

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