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तिब्बत की अस्मिता एवं संघर्ष का प्रतीक और निर्वासित जीवन जीते हुए भी धैर्य, शांति एवं अहिंसा का परिचय देने वाले दलाई लामा का 6 जुलाई को 84वा जन्मदिन था। उस निमित्त उनके कार्य और तिब्बती आध्यात्मिक स्वतंत्रता संग्राम की वर्तमान परिस्थिति की समीक्षा आवश्यक है।

चीन ने 7 अक्टूबर 1949 को स्वतंत्र तिब्बत पर आक्रमण किया। 17 मार्च 1959 को दलाई लामा ने ल्हासा से पलायन किया एवं अपने 60 हजार तिब्बती शरणार्थीयों के साथ भारत में राजनीतिक शरण ली।

दलाई लामा ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपनी सरकार की स्थापना की। परंतु विश्व के किसी भी देश ने उसे मान्यता नही दी। 2013 में दलाई लामा को लगा कि लोकतंत्रीय पद्धति से निर्मित सरकार तिब्बती जनता हेतु होना चाहिये। इसके लिये चुनाव करा कर नई सरकार का निर्माण किया गया जिसका मुख्यालय धर्मशाला में है।

  • तिब्बत पर चीन के विविध आक्रमण

आज तिब्बत पर चीन विविध प्रकार से आक्रमण करता है। एक याने सांस्कृतिक आक्रमण, मूल तिब्बती संस्कृति को बरबाद कर चीनी संस्कृति को स्थापित करना। दूसरे याने आर्थिक आक्रमण। तिब्बत मे बड़े पैमाने पर खनिज का दोहन हो रहा है। तिब्बत की अर्थव्यवस्था खेती, भेड़ पालन, एवं पर्यटन पर निर्भर है। खनन के कारण यहां के पर्यावरण को खतरा निर्माण हो गया है। तिसरा याने तिब्बत एवं अन्य देशों के पानी को रोकने का षड्यंत्र। तिब्बत का पानी चीन अपने अकालग्रस्त भाग की ओर मोड़ने का प्रयत्न कर रहा है।

तिब्बत का चीनीकरण करने का प्रयत्न हो रहा है। चीनी नागरिक तिब्बत में रहने जा रहे हैं। तिब्बत की राजधानी ल्हासा में चीनी नागरिक 2 लाख तो मूल तिब्बती केवल एक लाख है।

चीन द्वारा तिब्बत पर किये गये हमले में 10 लाख से अधिक तिब्बती नागरिक मारे गये। 1980,1990 और 2008 में भी चीन के विरूद्ध विद्रोह हुआ था परंतु उसे कुचल दिया गया। वैश्विक स्तर पर इस घटना का कोई संज्ञान भी नही लिया गया।

  • तिब्बत पर कब्जा क्यों ?

चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया है इसके अनेक कारण हैं। तिब्बत में पीने का मीठा पानी होने के कारण चीन के अकालग्रस्त भाग की पानी की कमी दूर करने की क्षमता तिब्बत के पास है। इसके लिये ब्रम्हपुत्र नदी का प्रवाह चीन की ओर मोड़ना पड़ेगा। वैसे ही पवन उर्जा भी विश्व में सबसे अधिक तिब्बत में पैदा की जा सकती है। सौर उर्जा की निर्मिति हेतु भी तिब्बत उपयुक्त है। विश्व में जितनी सौर उर्जा निर्मिति की क्षमता अकेले तिब्बती पठार पर है। जिओ थर्मल अर्थात जमीन के अंदर के गरम पानी से झरनों की मदत से उर्जा निर्मित करने की क्षमता भी तिब्बत में है। तिब्बत में विविध प्रकार की खनिज संपदा है। चीन ने इसके लिये अनेक जगहों पर खदान खोदने का काम प्रारंभ किया है। ब्रोमाईड एवं अन्य खनिजों से चीन को तिब्बत से बड़े पैमाने पर आमदनी होती है।

  • मीठे पानी का सबसे बडा स्त्रोत याने तिब्बत

तिब्बत के पठार पर बहुत ज्यादा मात्रा में बर्फबारी होती है। इसलिये इसे थर्ड पोल भी माना जाता है। उत्तर एवं दक्षिण ये दो ध्रुव हैं। परंतु मीठे पानी का सबसे बड़ा स्त्रोत याने तिब्बत। विश्व का 22% मीठा पानी तिब्बत में है। एशिया उपमहाद्वीप के करीब 3 अरब लोग इस पानी पर निर्भर हैं। तिब्बत के पठार से अनेक नदियों का उद्गम होता है जैसे ब्रम्हपुत्र, गंगा एवं भारत में बहने वाली अनेक नदियां। इसके अलावा इरावती एवं अन्य नदीयां तिब्बत के पठार से निकलकर साउथ ईस्ट एशिया में प्रवेश करती हैं। तिब्बत के पठार पर सर्वाधिक प्रमाण में ग्रास लेंड है।

हम जिसे तिब्बती ऑटोनॉमस रिजन के नाम से पहचानते है, वह मूल तिब्बत नही है। तिब्बत के अन्य भाग चीन ने अपने कुछ प्रांतो में शामिल कर लिये हैं।

500 तिब्बती लोगों पर एक पुलिस कर्मचारी

आज चीन तिब्बत निवासियों को दबाने का प्रयत्न कर रहां है। उन्हे चीन के विरूद्ध आंदोलन करने की अनुमति नही है। जो चीन के विरूद्ध बोलते या लिखते हैं उन्हे गिरफ्तार कर सजा दी जाती है। शालेय शिक्षक, धर्मगुरू या लेखक, आंदोलन या पर्यावरणवादी कार्यकर्ता, तिब्बत का गुणगान करने वाले कवि, गायक इन सब पर निगरानी रखी जा रही है। तिब्बत में चीनी सैनिकों की संख्या भी लक्षणीय है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पांच सौ तिब्बती लोगों पर एक पुलिस का कर्मचारी निगरानी रखता है। फिर भी तिब्बती लोगों का आंदोलन सतत शुरू रहता है। इसके दो प्रकार है। एक सामूहिक आंदोलन, दूसरा याने, कई बार तिब्बत के अलग-अलग भागों में एक अकेला तिब्बती हाथ में तख्ती लेकर आंदोलन करता है। इसमें एक सबसे खराब प्रकार याने आत्मदाह करना। अब तक तिब्बत की स्वतंत्रता हेतु 160 लोग आत्मदाह कर चुके हैं।

तिब्बती संस्कृति पर भी आक्रमण हो रहा है। तिब्बती भाषा की प्रगति न हो इसलिये उस पर पाबंदी लगाई गई है। तिब्बती गाने, कथा, कविता पर ध्यान रखा जा रहा है। धर्मगुरू दलाई लामा का फोटो लगाने पर मनाई है। 6 हजार से अधिक तिब्बती मठ नष्ट कर दिये गये हैं।

  • तिब्बत में आण्विक युद्ध

चीन ने तिब्बत के पठार पर बड़े पैमाने पर क्षेपणास्त्र और आण्विक हथियार तैनात किये हैं। अमेरिका या अन्य किसी महाशक्ति के साथ आण्विक युद्ध होता है तो उसका प्रतिकार तिब्बत में किया जायेगा। इससे नुकसान चीन की मुख्य भूमि का न होकर तिब्बत का होगा। आण्विक परिक्षण जमीन के अंदर एवं आकाश दोनों जगह किये जाते हैं। आज चीन ने तिब्बत में 300 से 400 परमाणु बमों का संग्रह किया है। आण्विक उर्जा रिएक्टर की सहायता से चीन से बिजली का उत्पादन किया जाता है। इसका कचरा भूमि में गाड़ दिया जाता है। यह कचरा इतना शक्तिशाली होता है कि आने वाले 200 से 300 वर्षों तक इसमें से विकिरण निकलता रहेगा।

  • स्वतंत्रता आंदोलन कमजोर हो रहा है?

तिब्बतीयों की संख्या न बढ़े इसलिये तिब्बती लड़कियों की परिवार नियोजन हेतु ऑपरेशन बिना उनकी सहमति से की जा रही है। जो तिब्बती कार्यकर्ता प्रतिरोधक आंदोलनों में भाग लेते हैं उन्हे राजनीतिक कैदी के रूप में गिरफ्तार किया जाता है और उन्होने विकास कार्यों में मजदूर के रूप में या चीनी सेना के लिये काम करने हेतु मजबूर किया जाता है। जिन तिब्बतियों को चीन ने काल कोठरी में रखा है उनकी निश्चित संख्या किसी को भी नही पता।

तिब्बती लोग चीन के विरूद्ध अमेरिका, भारत, यूरोप इन देशों में आवाज उठाते रहते हैं। उसके लिये समाज माध्यमों, यू-ट्यूब इ. का प्रयोग किया जाता है। कई जगह चीन विरोधी घोषणा लिखे हुए शर्ट या टोपियां वितरित की जाती है। तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि विदेशों में घूम-घूम कर चीन के आक्रमण के विषय में प्रचार करते रहते हैं। परंतु इनको बहुत सफलता नही मिल रही है। जो तिब्बती भागकर भारत आ गये थे, उनका भी अब तिब्बत से संबध धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। एवं स्वतंत्रता आंदोलन कमजोर हो रहा है।

  • तिब्बती स्वतंत्रता संग्राम की कठिन डगर

संक्षेप में चीन तिब्बत पर निरंतर आक्रमण कर रहा है जिसमें बड़े-बड़े बांध बनाये जा रहे हैं, नदियों का प्रवाह बदला जा रहा है। पर्यावरण आक्रमण हो रहा है। इतना ही नही भविष्य के दलाई लामा पर चीन का नियंत्रण रहने की संभावना है। इसके कारण आने वाले वर्षों में तिब्बत में निश्चित क्या होगा ? चीन के विरूद्ध लड़ाई में उन्हे सफलता मिलेगी क्या ? सोशल मीडिया का उपयोग और भाषण देकर कुछ फरक पड़ेगा क्या ? तिब्बतियों की स्वतंत्रता की आकांक्षा क्यां चीन पूरी करेगा ? इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक ही लगता है। अन्य देशों में रहकर तिब्बतियों के स्वतंत्रता संग्राम को सफलता मिलेगी, ऐसा नही लगता।

परंतु कुछ जानकारों के मत में शांतिपूर्ण मार्ग से किया जाने वाला आंदोलन, उनकी सॉफ्ट पॉवर, आध्यात्मिक शक्ति यह चीन की तानाशाही के सामने ज्यादा परिणामकारण होगी। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तब इस प्रकार के राज्य वहां बनेंगे, ऐसा किसी ने नही सोचा था। इसलिये तिब्बतियों को लगता है कि कभी ना कभी चीन का विघटन होगा और तिब्बत को स्वतंत्र होने में सहायता मिलेगी। परंतु तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन की राह आज तो कठिन ही नजर आती है। उन्हे भारतीयों के मदद की दरकार है।

 

This Post Has 2 Comments

  1. तिब्बत पर पूर्ण रूप से अधिकार जमाने हेतु चीन ने ल्हासा तक रेल सेवा आरंभ की। अब ल्हासा से नेपाल तक पटरी बिछाई जा रही है। चीन के अधिकार का प्रतिकार करनेवाले गायब कर दिये जाते है। ऐसी स्थिती मे तिब्बती जनता द्वारा विरोध करना निकट भविष्य मे असम्भव प्रतीत होता है।

  2. यह सचमूच भयावह है । इसके बारे में सरकार ने सोचना चाहिये

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