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निस्संदेह, पूरा देश हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले पर नजर गड़ाए हुए था। आखिर एक निर्दोष भारतीय की जीवन रक्षा का सवाल है जिसे पाकिस्तान ने जासूस और आतंकवादी करार देकर फांसी की सजा सुना दिया है। जैसे ही न्यायालय के अध्यक्ष अब्दुलकवी अहमद यूसुफ ने फैसला पढ़ना आरंभ किया पाकिस्तानियों के चेहरे उतरने लगे तो भारत के लोगों ने राहत की सांस लेना आरंभ किया। वास्तव में अपने फैसले के आठ मुख्य बिन्दुओं में न्यायालय ने एक भी शब्द भारत के विरुद्ध नहीं कहा है जबकि सभी में पाकिस्तान के खिलाफ या उसके लिए नकारात्मक टिप्पणियां हैं या फिर उसकी दी गई दलीलों की नकार है। यह पाकिस्तान की करारी पराजय है। हालांकि इस फैसले से जाधव की रिहाई सुनिश्चित नहीं हुई है, लेकिन उसकी फांसी की सजा निलंबित हुई है तथा नए सिरे से पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया की थोड़ी उम्मीद जगी है। हमारे लिए इस मुकदमे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि विश्व मंच पर हमने साबित कर दिया कि पाकिस्तान किस तरह एक लोकतांत्रिक देश की आड़ में सामान्य अंतरराष्ट्रीय नियमों-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए अपरादर्शी तरीके से किसी को भी जीवन ले लेने की सजा दे देता है।

आठ में से सात बिन्दुओं का फैसला 15-1 से हुआ है। यानी 15 न्यायाधीश पक्ष में तथा एक तदर्थ पाकिस्तानी न्यायाधीश विपक्ष में। पाकिस्तान ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में सुनवाई के योग्य है ही नहीं। सभी 16 न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से माना कि उनके पास भारत के आवेदन को स्वीकार करने का अधिकार है। कंसुलर रिलेशंस यानी राजयनिक संबंधों पर 24 अप्रैल 1963 के वियना संधि के मुताबिक मामला उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय ने यह दलील भी खारिज कर दिया कि भारत का आवेदन स्वीकार करने योग्य नहीं है। इसी तरह जाधव को वियना सधि के तहत राजनयिक पहुंच का अधिकार नहीं होने के पक्ष में दी गई दलीलों को नकारते हुए साफ कहा कि पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव को वियना संधि की धारा 36 (1-बी) के तहत राजनयिक पहुंच तक के जो अधिकार मिले थे, उसके बारे में उन्हें जानकारी न देकर तथा भारत को जाधव तक दूतों को न जाने देकर वियना संधि का, भारत एवं जाधव के अधिकारों का उल्लंघन किया है।

पाकिस्तान जो भी कहे दुनिया उसका असली चेहरा देख चुकी है। बहरहाल, यहां प्रश्न उठता है कि इसके आगे क्या ? न्यायालय ने फांसी की सजा पर रोक लगाते हुए पाकिस्तान को आदेश दिया कि वह जाधव के दोष और उन्हें सुनाई गई मौत की सजा की प्रभावी समीक्षा करे, उस पर पुनर्विचार करे तथा यह सुनिश्चित करे कि जाधव और भारत को वियना संधि के अनुसार सारे अधिकार मिलें। इसका सीधा मतलब हुआ कि पाकिस्तान की अब तक की पूरी न्यायिक प्रक्रिया को बिना कहे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने खारिज कर दिया।

नए सिरे से सुनवाई का अर्थ इसके अलावा क्या हो सकता है ? किंतु भारत के लिए नए सिरे से चुनौतियां भी आरंभ होती है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने आगे की कार्रवाई का क्रियान्वयन पाकिस्तान पर ही छोड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अवश्य कहा है कि पाकिस्तान एक सभ्य देश की तरह आचरण करे, लेकिन जाधव को उसने एक बड़ी रणनीति के तहत फंसाया है। पाकिस्तान यह साबित करना चाहता है कि बलूचिस्तान में आजादी के लिए जो हिंसक संघर्ष चल रहा है उसके पीछे भारत है। वह आसानी से जाधव को निर्दोष साबित नहीं होने देगा। हालांकि ऐसा करते हुए भी अपने बचाव के लिए पाकिस्तान ने जाधव की पहचान पर भ्रम पैदा करने के लिए उसके पास हुसैन मुबारक पटेल नाम का भी पासपोर्ट दिखाया था। उसने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में तर्क दिया कि उसकी पहचान भी सुनिश्चित नहीं है और भारत जाधव की राष्ट्रीयता साबित नहीं कर सका है। न्यायालय ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके समक्ष जो साक्ष्य हैं वो जाधव की भारतीय नागरिकता पर संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। यह पाकिस्तान के गाल पर बहुत बड़ा तमाचा है। इससे भारत का यह आरोप सही साबित होता है कि पाकिस्तान ने उसे जासूस साबित करने के लिए हुसैन मुबारक पटेल के नाम से नकली पासपोर्ट बनाया। उसका रवैया देखिए। 3 मार्च 2016 को उसे गिरफ्तार किया गया लेकिन भारत को सूचना दी गई 25 मार्च 2016 को। वियना संधि के अनुसार वह भारत को तुरंत सूचना देने के लिए बाध्य था। भारत ने 17 बार उच्चायोग के अधिकारियों को उससे मिलने यानी कन्सूलर एक्सेस के लिए आवेदन किया और हर बार इसे नकारा गया। 4 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि जाधव को सैन्य न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई है। जाहिर है, इस खबर से पूरे भारत में आक्रोश फूट पड़ा था। वर्तमान विदेश मंत्री एस. जयशंकर तब विदेश सचिव थे। उन्होंने पाकिस्तानी उच्चायुक्त को बुलाकर स्पष्ट कह दिया कि अगर पाकिस्तान ने जाधव को फांसी दी तो भारत मानेगा कि उसके नागरिक की हत्या की गई है और उसी अनुसार कार्रवाई होगी।

ध्यान रखिए, भारत को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दूसरी बार विजय मिली है। भारत 8 मई 2017 को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय गया था। 18 मई 2017 को ही न्यायालय ने अपने अंतरिम फैसले में भी फांसी पर रोक लगाते हुए जाधव को राजनयिक पहुंच न देने की आलोचना की थी। उस समय के फैसले की कुछ पंक्तियां देखिए, “पाकिस्तान जाधव पर भारत को राजनयिक पहुंच दे। …..“जाधव को दया याचिका दायर करने का हक है। सभ्य समाज में हर देश को पहले से तय नतीजे पर सजा देने का अधिकार नहीं है।….’’ पाकिस्तान के व्यवहार को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विपरीत तथा एक देश के व्यवहार के नाते उसे अविश्वसनीय मानने के लिए इससे कड़े शब्द नहीं हो सकते थे।

किंतु पाकिस्तान अपनी जिद पर अड़ा रहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय को इस पर सुनवाई का अधिकार ही नहीं है। यही नहीं पाकिस्तानी कानून के मुताबिक भी जाधव को दया याचिका दायर करने का अधिकार था वह भी नहीं करने दिया गया। उस समय भी न्यायालय ने साफ कह दिया कि जाधव की गिरफ्तारी को लेकर विवाद हैं इसे ध्यान में रखना होगा। यह भी भारत के पक्ष की विजय है। साफ है कि जाधव को ईरान के चाबाहार के आसपास पकड़ा गया था। एक आतंकवादी समूह ने उसका अपहरण कर पाकिस्तान को सौंप दिया। न्यायालय ने इस पर स्पष्ट मत नहीं दिया है लेकिन बलूचिस्तान में उसकी गिरफ्तारी को स्वीकार नहीं किया है। ऐसे देश को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि वह मानती है कि सजा पर लगातार रोक जाधव की सजा की प्रभावी समीक्षा के लिए अपरिहार्य स्थिति है। पाकिस्तान प्रभावी समीक्षा का अर्थ क्या लगाता है यह देखना होगा। उससे यह उम्मीद करना कि वह ईमानदारी से फैसले की प्रभावी समीक्षा करेगा बेमानी ही है।

जाधव के नेशनल डिफेंस एकेडमी में जाने से लेकर नौसेना अधिकारी के रुप में सेवा तथा सेवानिवृत्ति तक का पूरा रिकॉर्ड हमारे पास है। वह ईरान में व्यापार कर रहा था इसके भी प्रमाण है। किंतु पाकिस्तान के लिए वह एक ऐसा महाशक्तिशाली जासूस है जो डुरंड रेखा को पार कर 12 बार बलूचिस्तान में गया, वहां आतंकवादियों का समूह खड़ा किया, ग्वादर बंदरगाह तक पाक चीन आर्थिक गलियारे को ध्वस्त कराने पर काम कर रहा था। पाकिस्तान अफगानिस्तान के बीच डुरंड रेखा 2640 किलोमीटर है। कोई सामान्य मानव 12 बार वहां जा नहीं सकता। पाकिस्तान ने उसे रॉ का जासूस और आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त साबित करने के लिए उसे टीवी पर लाया। 358 सेकेंड के उस वीडियो में 102 कट थे। यह सब दुनिया के सामने है। कहने का तात्पर्य यह कि कुलभूषण जाधव पूर तरह निर्दोष है इसमें दो राय हो ही नहीं सकती। किंतु

पाकिस्तान उसे हर हाल में देश तोड़ने सहित आतंकवादियों गतिविधियों को बढ़ावा देने में संलिप्त रॉ का जासूस साबित करने पर तुला है। वह किस न्यायालय में मामला फिर से आरंभ करता है, राजनयिकों को कितनी पहुंच देता है, भारतीय वकीलों को वहां मुकदमा लड़ने में कितनी स्वतंत्रता रहती है, उसके परिजनों के साथ वहां न्यायिक प्रक्रिया के दौरान क्या व्यवहार होता है यह सब अभी भविष्य के गर्त में है। सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि पाकिस्तान की न्यायपालिका जिस तरह सेना के दबाव में है उसमें क्या कोई न्यायाधीश सैन्य न्यायालय के फैसले को निरस्त करने का साहस करेगा ? कहीं ऐसा न हो कि सरबजीत सिंह की तरह जेल में ही उसके साथ कुछ कांड कर दिया जाए। हालांकि भारत सरकार की भूमिका से साफ है कि वह हर हाल में जाधव की रिहाई के लिए संकल्पित है। बालाकोट जैसी कार्रवाई पाकिस्तान देख चुका है। इसलिए ऐसे दुस्साहस से वह बचेगा। पर भारत को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। 

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