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मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने राम वनगमन पथ बनाने का संकल्प दोहराते हुए 22 करोड़ का बजट प्रावधान कर दिया है। यह प्रस्ताव आध्यात्म विभाग ने तैयार किया है। इस पर क्रियान्वयन का काम श्राइन बोर्ड करेगा। चित्रकूट से अमरकंटक बनाए जाने वाले इस मार्ग पर प्राचीन समय की वास्तुकला को पुनर्जीवित करने के साथ पुराने समय की ही शहरी व्यवस्था को बहाल करना है। मसलन इस मार्ग पर जो प्राचीन नगर स्थित हैं, उनकी ऐतिहासिक विरासत का पुनरुद्धार किया जाएगा। इस रास्ते में चित्रकूट, पन्ना, बुधवारा, रामघाट, राम मंदिर तालाब, मंडला, शडहोल, डिंडौरी और अमरकंटक को शामिल किया गया है। इन सभी स्थलों में एक ही तरह के विकास कार्य विकसित किए जाएंगे। श्रद्धालुओं के लिए पैदल पथ, धर्मशालाएं, यात्री निवास, बांस की झोपड़ियां आदि बनाए जाएंगे। इस द़ृष्टि से 22 करोड़ रुपए ऊंट के मुंह में जीरा के समान हैं। चूंकि कांग्रेस ने अपने चुनावी वचन-पत्र में भाजपा के मुद्दों को हथियाने की द़ृष्टि से यह कठिन काम भी पत्र में शामिल कर लिया था, लेकिन इस काम का जितना विस्तार है, प्राचीन भवनों को तत्कालीन स्वरूप देने से भी जुड़ा है। गोया, इस संकल्प को पूरा करने के लिए करोड़ों रुपए की जरूरत तो होगी ही, संकल्प को साकार रूप देने में लंबा समय भी लगेगा।

कमलनाथ सरकार नरम हिंदुत्व के रंग में पूरी तरह समाती नजर आ रही है। 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम, पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ जिन मार्गों से गुजरे थे, उस ‘राम-वन-गमन-पथ‘ को नई पहचान देने का श्री गणेश होने जा रहा है। 10 साल पहले शिवराज सिंह चौहान सरकार ने ‘राम-वन-गमन-पथ‘ विकसित करने की घोषणा की थी। साथ ही यह भी दावा किया था कि भगवान राम जिन स्थलों पर ठहरे थे अथवा आततायियों से युद्ध लड़ा था, उन स्थलों को भी रामायण-काल के अनुरूप आकार दिया जाएगा। 2007 में की गई इस घोषणा पर 2018 तक भाजपा सरकार कोई काम जमीन पर नहीं उतर पाई। जबकि 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुद्दे को भुनाते हुए कांग्रेस को राम विरोधी सिद्ध करने की चाल चली थी। इस मुद्दे को भुनाने में भाजपा इसलिए भी सफल हुई, क्योंकि 2013 में समुद्र में निर्माणधीन ‘जल-डमरू-मध्य-मार्ग‘ बनाने के परिप्रेक्ष्य में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने यह शपथ-पत्र देने की भूल की थी कि भगवान राम काल्पनिक हैं और राम-सेतु मानव निर्मित नहीं है।

अर्से तक मुस्लिम तुष्टिकरण में लगी रही कांग्रेस अब हिंदुत्व से जुड़े उन मुद्दों को कुरेद रही है, जिनसे उसे नई ऊर्जा मिल सके। बहुसंख्यक आबादी के धार्मिक हितों को यह साधने की कोशिश है। खैर, इसमें कोई दो राय नहीं कि घोषणा के बावजूद प्रदेश की भाजपा सरकार ‘राम-वन-गमन-पथ‘ को लेकर सोई हुई थी। उसकी आंखें तब खुलीं थीं, जब दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा के दौरान इस मुद्दे को हवा दी। इसी का परिणाम रहा कि 2017 में प्रदेश सरकार ने 69 करोड़ रुपए का एक प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार को भेजा और इसे जल्द मंजूरी मिल जाने का दावा किया था। जबकि यह राशि इतनी छोटी थी कि इसका खर्च स्वयं प्रदेश सरकार उठा सकती थी ? लेकिन शिवराज सरकार यह भलि-भांति जानती थी कि इस काम को पूरा करने के लिए मोटी धनराशि के साथ लंबी अवधि की भी जरूरत पड़ेगी। इसलिए उसने वह उपाय किया जिससे सांप भी मर जाएं और लाठी भी न टूटें।

 संस्कृति विभाग द्वारा 11 विद्धानों की एक समिति बनाकर ‘राम-वन-गमन-पथ‘ का मानचित्र भी बना लिया गया है। इसके अनुसार भगवान राम ने सीता व लक्ष्मण के साथ चित्रकूट से वर्तमान मध्य-प्रदेश में प्रवेश किया। तत्पश्चात अमरकंटक होते हुए वे रामेश्वरम् और फिर श्रीलंका तक गए। पौराणिक मान्यता और वाल्मीकि रामायण भी यही दर्शाते हैं। साथ ही यह भी मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास में भगवान राम ने लगभग 11 वर्ष 5 माह इन्हीं वनों में व्यतीत किए और वनवासियों को अपने पक्ष में संगठित किया। इस कालखंड में राम जिन मार्गों से गुजरे और जहां-जहां ठहरे, उनमें से ज्यादातर सतना, रीवा, पन्ना, छतरपुर, शडहोल और अनूपपुर जिलों में हैं। इस मानचित्र और प्रतिवेदन को तैयार करने में रामकथा साहित्य, पुरातत्व, भूगोल, हिंदी और भूगर्भ शास्त्र के विषयों से जुड़े करीब 29 विद्धानों की मदद ली गई। हालांकि जनश्रुतियों में ये सभी स्थान पहले से ही मौजूद हैं और भगवान राम से जुड़े होने के कारण पूजा और पर्यटन से भी जुड़े हैं। इस मार्ग के मानचित्र भी इतिहास की पुस्तकों में दर्ज हैं।

हालांकि फिलहाल प्रदेश सरकार केवल चित्रकूट को प्राचीन स्वरूप देने की इच्छुक है। भगवान श्रीराम ने वनवास के कालखंड में सबसे ज्यादा समय चित्रकूट में ही व्यतीत किया था। इसका जीर्णोद्धार किया जाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि एक तो यहां यात्रियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, दूसरे इस धार्मिक पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार और सरकार को मोटी आय भी होने लग गई है। 2001 में यहां पांच लाख लोग धर्म-लाभ लेने आए थे, जबकि यह संख्या 2013 में बढ़कर 1.67 करोड़ हो गई। इस क्षेत्र में कामदगिरी पर्वत के दर्शन का बड़ा महत्व है। इसके साथ रामघाट, हनुमानधारा, भरतमिलाप मंदिर और मंदाकिनी नदी प्रमुख धर्म स्थल हैं। यदि इस पूरे क्षेत्र में सुगम पथ, ठहरने व खान-पान और वाहनों के आवागमन व पार्किंग की उचित व्यवस्था हो जाती है तो यात्री संख्या में वृद्धि के साथ सरकार की आय में भी इजाफा होगा।

इस पथ पर वर्चस्व कायम करने के साथ प्रदेश सरकार प्रत्येक ग्राम पंचायत में गौशाला का निर्माण भी कर रही हैं। भाजपा गो सरंक्षण को खूब भुनाती रही है। इसलिए मुख्यमंत्री कमलनाथ इस मुद्दे को भी समाप्त कर देना चाहते हैं। याद रहे 1934 में महात्मा गांधी ही पहली बार गौरक्षा का प्रस्ताव लेकर आए थे। 1954 में मध्य-प्रदेश के गठन के बाद 1954-55 में कांग्रेस के तत्कालीन और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ला ने प्रदेश में कानून बनाकर गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया था। यह भी ठोस हकीकत है कि कांग्रेस के राज में ही प्रदेश में बड़ी और प्रमुख गौशालाएं बनीं थीं। यदि शिवराज सरकार की गौ-रक्षा की इच्छा प्रबल होती तो भाजपा 15 साल के लंबे कार्यकाल में प्रत्येक पंचायत में गौशाला अस्तित्व में ला सकती थी ? बहरहाल कांग्रेस ने भाजपा के हथियार से ही भाजपा को भौंथरा कर देने की रणनीति चल दी है।

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