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एक रूखा सा भाव लगभग सभी महिलाओं के चेहरों पे, जैसे अपना आधिपत्य जमाए बैठा था। हैरानी थी तो बस इस बात की, के इस रूखेपन में डूबे ये चेहरे कैसे त्वचा पर क्रीम मल रहे थे? केशों को काढ़ रहे थे, कोई बिंदी लगाती तो कोई लिप्स्टिक।

एक दूसरे की मौजूदगी को महसूस किए बिना। कितनी सरलता से भूल बैठीं थी ये सभी कि ये श्रृंगार प्रक्रिया एक सार्वजनिक स्थान पर चल रही थी। बड़ी सहजता से स्वयं को ऑफिस जाने के लिए तैयार करतीं ये मेट्रोपोलिटन शहरों की महिलाएं काश इतनी ही सहजता से अपने जीवन के वो सारे दुःखद, कठिन क्षण भी भूल पातीं। वो सबकुछ जो इनके चेहरों की साज सज्जा पूरी होने के बाद भी उनकी आँखों से बरबस छलक ही जा रहा था।

कभी ज़ोर से तो कभी मद्धम गति से चलती लोकल ट्रेन में बड़े ही सधे हुए हाथों से बेहद अनुभवी अंदाज़ में अपना अधूरा श्रृंगार पूरा करना इनके रोज़ के रूटीन में शामिल था शायद। इसीलिए तो कहीं भी कोई चूक नहीं थी, फिर चाहे बाल काढ़ते समय बीच की मांग निकालना हो, माथे के बीचों बीच बिंदी लगाना हो, अपने अधरों के आकारानुसार लिपस्टिक लगाना हो या फिर बेरंग नाखूनों पर चमकीली नेल पॉलिश लिप्त छोटा सा ब्रश चलाना हो। सबकुछ परफेक्ट था।

मैं बड़े ही ग़ौर से सभी को बारी-बारी देख रही थी लेकिन जब भी देखती तो हर एक पर नज़र टिकी ही रहती। शायद मेरा मष्तिष्क मेरे स्वयं को आदेश देता अभिप्रेरित कर रहा था, प्रेरणा लेने का प्रयास कर रहा था।

कॉलेज में कई बार सहेलियां कहती थीं, रुपाली “थोड़ा कम किया कर श्रृंगार, देखो तो ज़रा काजल, बिन्दी, झुमके, पायल, चूड़ी, मेहँदी, उफ्फ, सबकुछ तो गिना भी नहीं सकते”। फिर सृष्टि कहती – “अभी ये हाल है, शादी के बाद क्या करेगी, जगह ही नहीं बची कुछ और पहनने को, पूरी कॉस्मेटिक की दुकान लग रही है”। मैं बस मुस्कुरा के इतना ही कहती ” आर यू गर्ल्स जेलस ?” फिर सब मिलकर हँसते और मैं अगले दिन फिर वैसे ही सजधज के कॉलेज जाती। खुद को बदलना मेरे बस का नहीं था। मैं ऐसी ही तो थी बचपन से।

मेरे इसी श्रृंगार पर कॉलेज में फ़िर अबोध ख़ूबसूरत शायरी किया करते थे। प्रोग्राम्स में मंच से बोलते थे तो सब समझ ही जाते थे कि इशारा किस तरफ है। पढ़ाई पूरी हुई और फिर शादी। मेरी सहेलियां तो सब इतनी उत्सुक थीं कि जितनी अपने कॉलेज के परिणाम घोषणा के दिन भी नहीं थीं। और जब मैं तैयार होकर मंडप पर पहुँची तो सबकी नजरें मुझ पर ही टिक गईं।

अबोध ने धीरे से कान में कहा, “आज तो ज़िन्दगी भर का रिकॉर्ड तोड़ दिया तुमने रूपाली, बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो।”

शादी को तीन साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। खुशियाँ जैसे हर आँगन छोड़कर मेरे ही घर बस गईं थीं।  मैं और अबोध और हमारा छोटा सा घर, मैं खुश थी, हम दोनों ही खुश थे, बहुत खुश और मेहमान नवाज़।

शादी की तीसरी सालगिरह थी, अबोध ने सभी को पार्टी में आने के लिए कॉल कर दिए थे। मैंने भी चाय, नाश्ता, भोजन की सब तैयारियाँ कर ली थीं। अबोध ने भी ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। शाम हुई और मेहमानों का आना शुरू हुआ, दोस्त, कलीग्स, रिश्तेदार, पड़ोसी, सभी जब लगभग आ गए तो मैं फ्रिज से केक निकाल लाई। सेंटर टेबल पर रखा, कैंडल्स जलाई और नाइफ हाथ में लेके अबोध को पुकारा, अबोध आये,  लेकिन उनके चेहरे का भाव कुछ समझ सा नहीं आया। ना खुश थे ना उदास। “शाम तक तो ठीक थे, क्या हुआ होगा”- उनका चेहरा देखकर कुछ घबराहट सी हुई लेकिन सोचा रात को अकेले में पूछुंगी। और केक काटने के लिए उनका हाथ थामा तो उन्होंने बहुत धीरे से अपने हाथ पर से मेरा हाथ हटाते हुए कहा -” ये पार्टी मेरी सालगिरह की खुशी में नहीं रखी गई है, मैं आप सबको यहां एकसाथ एकत्रित कर के बस यही कहना चाहता था कि मैं और रूपाली अलग हो रहे हैं।” सभी हतप्रभ रह गए।

हाथ तो बहुत धीरे से छुड़ाया था अबोध ने लेकिन उसका प्रभाव बहुत गहरा पड़ गया। फिर, अबोध के पीछे ही खड़ी सृष्टी अबोध जैसे ही भाव चेहरे पे लेकर अचानक मेरे सामने आकर बोली -” मैं आज से यहीं रहूँगी रूपाली”।

कुछ समझ नहीं आ रहा था, ना मुझे, ना किसी और को, मम्मी पापा, भैय्या भाभी, ननद, देवर, दोस्त, सभी बस अबोध को अलग – अलग नज़रों से लगातार देख रहे थे।

बहुत से सवाल थे मन में, लेकिन ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं पड़ी मुझको। अबोध खुद ही बोले -“तलाक़ एक लंबी प्रक्रिया है, और इतना समय नहीं है मेरे पास। सृष्टि के माता पिता उसका विवाह करना चाहते हैं, सो वो घर छोड़ कर आ गई है। जब तक तलाक़ नहीं होता, तुम चाहो तो यहाँ रह सकती  हो, लेकिन गेस्ट रूम में। और हाँ, प्लीज, हमारे कमरे से अपना सामान- वो बिन्दी, झुमके, चूड़ियाँ, सब हटा देना। अब ये सब सहना मेरे बस का नहीं। तुमने कुछ पूछा नहीं, लेकिन कहना चाहता हूँ कि तुमसे अलग होने की वजहें बहुत हैं, लेकिन सृष्टि के साथ होने की एक ज़रूरी वजह है कि वो कॉस्मेटिक की दुकान नहीं लगती कम से कम। ज़िन्दगी में मेन्टेनेन्स, और उसपे स्टेटस मेन्टेनेन्स ज़रूरी होता है रूपाली। मेरे लिए भी है। सारी ज़िन्दगी बस यूँही नहीं चल सकती। हमें खुद ही इसे बेहतर बनाना होता है। तुम बता देना कब खाली करोगी कमरा।”

“अभी, अभी ही कर देती हूँ । बस पांच-दस मिनट लगेंगे अबोध”

मम्मी पापा कुछ कहने को आगे बढ़े तो मैंने बीच में ही टोक दिया था। मैं कमरे की ओर बढ़ी और मेहमान सब अपने अपने घर चले गए।

एक महीना बीत गया, बिना काजल, बिना बिन्दी, बिना चूड़ी और पता भी नहीं चला। लेकिन कितनी अजीब है ना ये मेट्रोपोलिटन शहरों की चाल, हर कदम कुछ सिखा जाती है। आज फिर जब ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी, तो वो सभी रूखे से भाव चेहरे पे लिए, लोकल ट्रेन में श्रृंगार करती महिलाएं याद आ गईं। वो ऑफिस जाते वक़्त तैयार हो रहीं थीं, किसी दूसरे के लिए नहीं, अपने लिए। और अबोध की कही बात उन पर बिल्कुल सटीक बैठती थी – “ज़िन्दगी बस यूँही नहीं चल सकती। हमें खुद ही इसे बेहतर बनाना होता है।”

आज ऑफिस जाने से पहले, कुछ मॉव सी लिपस्टिक लगाई, वैसी ही बिन्दी, अपने लंबे वाले झुमके, अपना वाला काजल और फिर चूड़ी पहनी। जब आईने में देखा, तो ऐसा लगा के एक अरसे बाद खुद से मिल रही हूँ। मैं ऐसी ही तो थी बचपन से ! ये मैं ही तो थी ! सच, ज़िन्दगी का संघर्ष चेहरे पर शारीरिक थकान से कुछ देर के लिए रूखापन ज़रूर ला सकता है, लेकिन जीवन से उसका श्रृंगार नहीं छीन सकता।

 

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