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हमारे पूज्य गुरुदेव कभी-कभी अपने जीवन की घटित घटनाएं सुनाते थे तो मन में एक आनंद की अनुभूति भी करा देते थे। उन सुने हुए अनेक प्रेरक प्रसंगों में से अब हमारे लिए वे सब संस्मरण हो गए हैं। हम सबके संज्ञान में यह पूर्व से ही है, हमारे गुरुदेव अपनी बाल्यावस्था से ही साधु-जीवन धारी रहे हैं। प्रारंभिक जीवन में गुरुकुल शिक्षा पद्धति से उन्होंने अक्षरज्ञान और संस्कार ग्रहण किया है। उन्होंने ब्रह्मचर्य दीक्षा उत्तराखंड में ऋषिकेश के आध्यात्मिक साधक महामण्डलेश्वर स्वामीश्री वेदव्यासानंद सरस्वतीजी से ली थी, उन्हें अपने गुरु का नैकट्य और उनका भरपूर प्यार व पूर्ण संरक्षण मिला है। योग, ध्यान, साधना, संध्या वंदन, गायत्री मंत्र जाप, गीता स्वाध्याय, स्वर्गाश्रम स्थितगीता आश्रम की सहज प्रवृत्ति और दैनिक चर्या रही है। ऐसे संस्कारों में पलने-ढलने वाला ही तो श्रेष्ठ महापुरुष सिद्ध होता है। हुआ भी वही, हमारे श्री सद्गुरुदेव विश्व- विश्रुत, विश्ववंद्य अध्यात्म जगत् के शिखर पुरुष रहे हैं।

उन्होंने संन्यास दीक्षा 27 वर्ष की आयु में ली थी। वाराणसी में हम संन्यासियों का एक प्रसिद्ध मठ है, जिसे मछली बंदर मठ के नाम से जाना जाता है। वहां एक वयोवृद्ध दण्डी संन्यासी से उन्होंने दण्ड दीक्षा लेकर दण्ड धारण किया था, तथा स्वामी सदानंद गिरिजी महाराज से संन्यास दीक्षा लेकर भानपुरा मठ के शंकराचार्य बनाए गए। इतनी कम आयु में दण्ड धारण कर संन्यास दीक्षा उपरांत जब हमारे आराध्य की शंकराचार्य पद पर अभिषेक पूर्व प्रतिष्ठा हुई तब यह समाचार सर्वत्र सूर्य के प्रकाश की भांति फैला। स्वाभाविक रूप से कानपुर जिले में, घाटमपुर तहसील के छोटे से ग्राम फत्तेपुर में पहुंचा। (यह गांव हमारे पूजनीय गुरुदेव का पैतृक ग्राम और यहां उनका पैतृक घर भी था) स्वामीजी का जन्म ननिहाल में आगरा में हुआ था। पूरा गांव इस उपलब्धि से झूम उठा, आनंदित हो प्रफुल्लित हो गया। हमारे गुरुदेव का घर का नाम था श्री अम्बिका पाण्डेय और आपके पिताजी का नाम था पं. शिवशंकर पाण्डेय। माताजी का नाम था श्रीमती त्रिवेणी देवी पाण्डेय। माता-पिता की खुशी का क्या कहना! उन्हें गांव भर की बधाइयां मिलने लगीं। गांव के तत्कालीन 90 वर्षीय बुजुर्ग व्यक्ति ने पं. शिवशंकर पाण्डेय जी से कहा- पांड़ेजी! अपना अम्बिका शंकराचार्य हो गया है, हमारी इतनी बड़ी आयु हो गई, शंकराचार्य जी के दर्शन ही नहीं किए है। गांव का लड़का धर्म और अध्यात्म की इतनी  ऊंची जगह पर पहुंचा है, उसे एक बार गांव में लाओ, हम सबका जीवन धन्य हो जाएगा। फिर क्या था, गांव में एक कमेटी बनी जिसके अध्यक्ष पं. शिवशंकर पाण्डेय जी को ही बनाया गया। पाण्डेय जी को शंकराचार्य जी को आमंत्रित करने के लिए अधिकृत किया गया, स्वीकृती मिल जाने पर यही समिति शंकराचार्य का अभिनंदन भी करेगी, अभिनंदन का दायित्त्व भी पाण्डेय जी को ही दिया गया।

पं. श्री शिवशंकर पाण्डेय जी ने शंकराचार्य जी को एक पत्र आमंत्रण के आशय से लिखा, उस पत्र की भाषा जो गुरुदेव ने मुझे सुनाई वह इस प्रकार थी:-

परमपूजनीय, श्रद्धेय आचार्य जी!

मेरे ग्रामवासियों की ओर से और पत्र लेखक इस सेवक की ओर से आपके चरणों में सादर प्रणाम।

मैं कानपुर जनपद की घाटमपुर तहसील के अंतर्गत एक छोटे से गांव फत्तेपुर का निवासी हूं। आप इसी गांव के हैं, आपके शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त होने का वृत्त हम ग्रामवासियों को मिला, गांव में अपार प्रसन्नता का माहौल है। गांव के लोगों ने आपको आमंत्रित करने हेतु मुझे अधिकृत किया है। गांव के सर्वाधिक आयु के वृद्ध एक सज्जन, जो इस समय 90 वर्ष की आयु को स्पर्श कर रहे हैं, उनका भी बार-बार आग्रह है। मैंने अपने जीवन में शंकराचार्य जी का दर्शन ही नहीं किया है, अपने गांव के सपूत को यह पद मिला है, हम सब उनके दर्शन करने के अभिलाषी हैं। पं. श्री शिवशंकर पाण्डेय जी ने आगे लिखा, आपके स्वागतार्थ हमारे ग्राम में समिति का गठन हो गया है जिसका प्रथम सेवक मुझे ही नियुक्त किया गया है। मैं ग्राम वासियों की ओर से आपकी स्वीकृती की प्रतीक्षा सहित आपको सादर आमंत्रित करता हूँ।

आपका सेवक

(पं.शिवशंकर पाण्डेय)

ग्राम फत्तेपुर, जनपद कानपुर।

परम पूजनीय स्वामीजी महाराज ने अपने सेवक से पत्र लिखवाया- शंकराचार्य जी को आपका पत्र प्राप्त हुआ। उनका आदेश है कि मैं आपको सूचित करूं। शंकराचार्य जी जब भी कानपुर प्रवास पर आएंगे, आपको पूर्व से सूचित कर, आपके ग्राम में अवश्य पधारेंगे।

स्वामीजी महाराज पूर्व सूचना देकर ग्राम फत्तेपुर गए। पिता जी उन्हें समस्त ग्रामवासियों सहित लेने आए। गांव में धर्म सभा का आयोजन किया गया। शंकराचार्य जी का पूजन हुआ। यह पूजन गांव की ओर से हमारे पूज्य परमाराध्य का प्रथम पूजन पं.श्री शिवशंकर पाण्डेय जी ने किया। जब स्वामीजी का प्रवचन आरंभ हुआ तब पं.श्री शिवशंकर पाण्डेय जी ने स्वामीजी से आग्रह किया, शंकराचार्य जी आप अपने सेवक से कहें वे मुझे चंवर दे दें मैं अपने हाथ से चंवर डुलाऊंगा, स्वामीजी ने चंवरधारी को आज्ञा दी। पं. शिवशंकर पाण्डेय जी ने आचार्य जी के प्रवचन पर्यंत चंवर डुलाया और बीच-बीच में शंकराचार्य जी की जय-जयकार के नारे भी लगवाए।

धन्य है हमारी भारतीय संस्कृति और भारतीय सनातन परम्परा का यह पवित्र भाव। मुझे जब पूजनीय गुरुदेव ने यह प्रसंग सुनाया, मैं भावविभोर हो गया। इतना ही नहीं पूज्य गुरुदेव भी अतीत की स्मृति में खो गए, भावुक हो गए, उनके नेत्र सजल हो गए, नेत्र की गंगा-यमुना ने पितृ स्मृति में अपने प्रवाह पर नियंत्रण खो दिया।

मेरे ब्रह्मचर्य आश्रम के दीक्षा गुरु स्वामी श्री अव्यक्तबोधाश्रम जी महाराज सन 1995 में ब्रह्मलीन हो गए। अतः सन 1998 में मैंने भारतमाता मंदिर हरिद्वार के कल्पक व संस्थापक पूज्य श्रीस्वामी जी महाराज से संन्यास दीक्षा ग्रहण की। श्रीस्वामीजी महाराज ने मुझे संन्यास दीक्षा उपरांत समन्वय परिवार जबलपुर का दायित्त्व सौंप दिया, जिसका निर्वहन मैं आज तक कर रहा हूं। भारत में जहां-जहां समन्वय की इकाइयां हैं, स्वामी जी महाराज के आदेश से मैं समय-समय पर वहां पहुंचता रहा हूं। मैं यहां स्वामीजी महाराज का एक भावनात्मक पक्ष अपने इस संस्मरण के माध्यम से उद्घाटित कर रहा हूं वह यह कि-

मैं एक बार ग्रीष्मकालीन सत्संग में हरिद्वार समन्वय कुटीर में गया। मैं वहां अपराह्नकालीन सत्संग में पौन घण्टे साधना विषयक प्रवचन करता था। एक दिन स्वामीजी के साथ मेरा ऋषिकेश जाना हुआ। नीलकंठ महादेव एवं वीरभद्र महादेव के दर्शन करके हम लोग हरिद्वार वापस आए, पूज्य गुरुदेव ने कहा- अब तुम मेरे साथ कुटिया में चलो, वहीं भिक्षा पाना(हम संन्यासी लोग भोजन को भिक्षा ही कहते हैं)। उन्होंने कहा कि आश्रम के भोजन का समय समाप्त हो गया है, कुटिया में भोजन तैयार होगा केवल गरम-गरम रोटियां बना लेंगे। हम कुटिया में आए लगभग एक बज गया था। स्वामीजी ने मुझसे कहा- तुम हथपोई रोटी बना लेते हो (हथपोई रोटी का मतलब होता है बिना चौकी, बेलन की रोटी, इसे सधुक्कड़ी भाषा में टिक्कड़ भी कहते हैं) बनाओ। मैंने रोटी बनाई। स्वामी जी ने मात्र आधी रोटी ली। मैंने एक अपनी और आधी प्रसाद स्वरूप गुरूजी वाली रोटी ली। अब हम गुरुजी के कक्ष के बगल वाले कमरे में विश्राम के लिए गए। मुझे बाथरूम जाना था। मैं कक्ष में गया। तीन मिनट बाद बाहर आया तो देखा पूज्य गुरुदेव अपने हाथ से मेरा बिस्तर व्यवस्थित कर चादर बिछा रहे थे। मैंने गुरुदेव का हाथ पकड़ लिया और कहा- गुरुदेव ये आप क्या कर रहे हैं? उन्होंने अपने मुख पर तर्जनी रख कर कहा चुप रहो, मैं स्तब्ध रह गया। उन्होंने तकिया रखी, पतली चादर ओढ़ने हेतु दी और कहा- सुनो!! पिता अपने नन्हें बालक की सेवा नहीं करता क्या? तुम मेरे पुत्र हो, मैं पितृ धर्म का पालन कर रहा हूं। मैं तुम्हारा समर्थ पिता हूं, लौकिक पिता तो अपने पुत्र से अपेक्षा रखता है परंतु मेरी तुम लोगों से (मेरे संन्यासी शिष्यों से) कोई अपेक्षा नहीं है। अच्छा तुम अब विश्राम करो। मैं अपने कक्ष में जाता हूं। दो घण्टे बाद चाय लेंगे।

निष्छलमना, निष्कपट ह्रदय और वात्सल्यपूर्ण, अपनत्व, ममत्त्व भरा गुरुदेव का वह आत्मीय व्यवहार हम कभी भूल नहीं पाएंगे।

 

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