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यूँ तो शिक्षा, शिक्षक, शिष्य, और शिक्षित-अशिक्षित समाज पर कई फिल्में अब तक बन चुकी हैं लेकिन फिर भी “सुपर थर्टी” ने सिनेमा हॉल में जो खचाखच भीड़ एकत्रित करने का रिकॉर्ड बनाया है वो काबिले- तारीफ है। फ़िल्म एक बड़ी हिट हो चुकी है और इसका श्रेय पूरी टीम को जाता है विशेष रूप से हृतिक रौशन को जिन्होंने इस बार अपने फैंस को अपने नए अंदाज़ में लुभाया है।  फ़िल्म की कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित होने के कारण जनता के करीब आ चुकी है। कहानी आधारित है आनन्द कुमार के असल जीवन के अनुभवों पर। एक होनहार शिष्य होने के साथ- साथ एक बेहतरीन शिक्षक बनने तक के उनके असल जीवन के सफर पर आधारित ये कहानी, हमारे देश की शिक्षा प्रणाली पर सीधा वार है।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षा का महत्व हर क्षण तीन गुना गति से बढ़ रहा है। आज हर व्यक्ति अपने बच्चे को बेहतर से बेहतर शिक्षा देना चाहता है। जो अपने बच्चों को सुविधा दे सकता है वो भी और जो नहीं दे सकता वो भी – सभी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य निर्माण के लिए ही दिन रात मेहनत कर रहें हैं और ऐसे में अगर भेदभाव और पक्षपात जैसे दुष्विचारों से शिक्षा दूषित हो जाए तो निश्चित ही देश का भविष्य खतरे में है। लेकिन सच यही है कि ऐसा हो रहा है। शिक्षा व्यवस्था केवल एक व्यवसाय बनकर रह गई है और विद्यालय भी किसी बाज़ार से कम नहीं। शिक्षा व्यवस्था के इन्हीं पहलुओं को फ़िल्म में दर्शाया गया है।

आनंद कुमार का पात्र, जो कि हृतिक रोशन ने निभाया है, इस खोखली व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होता है। शुरुआती दौर में, परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर आ जाने के कारण आनंद कुमार का लक्ष्य अपने परिवार की देख रेख ही होता है लेकिन गुज़रते समय के साथ उसे शिक्षा के महत्व का एहसास होता है। शिक्षा पर सबका समान अधिकार होते हुए भी लोग शिक्षा से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनके पास साधन नहीं। ये बात उसे भीतर तक झकझोरती है और इसी वंचित वर्ग की शिक्षा दीक्षा को वो अपना लक्ष्य बना लेता है। और इसमें सफल भी होता है।  देश के प्रतिष्ठित आई.आई.टी प्रवेश परीक्षा में उसके पढ़ाये तीस के तीस शिष्य सफल होते हैं – “सुपर थर्टी”। फ़िल्म का डायलॉग “राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा” इस बात को दृढ़ता देता है।

लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उसे बहुत कुछ खोना पड़ता है। ये रास्ता उसके लिए कई नई मुसीबतें लेकर आता है। आर्थिक तंगी के साथ- साथ शिक्षा माफ़िया उसकी जान का दुश्मन बन जाता है। आनंद कुमार अपने सुनहरे भविष्य को किनारे रखकर शिक्षा पर सबका समान अधिकार है कहते हुए इस लड़ाई को आज भी जारी रखे हुए हैं। इस बात ने फ़िल्म के प्रति जनता का आकर्षण और भी बढ़ा दिया है। फ़िल्म में सभी पात्रों ने अच्छा काम किया है। फिर चाहे मृणाल ठाकुर हो, पंकज त्रिपाठी, वीरेन्द्र सक्सेना, नंदीश संधू, आदित्य श्रीवास्तव, अमित साध या मानव गोहिल। इसका फायदा उन्हें भविष्य में बॉलीवुड में मिल सकता है। साधना सिंह ने भी फ़िल्म से एक दमदार वापसी की है। हृतिक रौशन की सभी हिट फिल्मों में से ये फ़िल्म उनके प्रशंषकों के लिए यादगार साबित होगी। स्क्रीन पर अपनी ‘ग्रीक गॉड’ की छवि को तोड़ते हुए, हृतिक रौशन ने एक बार पुनः अपने हुनर का लोहा मनवाया है। उनके करियर की ये एक बेहतरीन फ़िल्म है। एक बार फिर जनता ने ये साबित किया है कि अश्लीलता और आइटम नंबरों से ही फिल्में नहीं चलती। ऐसे विषयों की भी प्रतीक्षा जनता को रहती है।

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