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बच्चे प्रेम और स्नेह के भूखे होते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉं. अरूणा बूटा का कहना है कि ”बच्चों की मानसिक बीमारियों का सबसे बड़ा कारण उनकी बातें न सुनना है. उनके साथ स्कूल में क्या हो रहा है, दिन भर वे स्कूल में क्या करते हैं, किसके बारे में क्या सोचते हैं आदि के विषय में उनसे बातें करना जरूरी है. आजकल की व्यस्त होती जिंदगी में अक्सर माता-पिता ऐसा नहीं करते. दिनभर में वे अपने कामकाज में व्यस्त होते हैं और शाम को फुर्सत मिलने पर अपने मोबाइल फोन या टीवी में. ऐसे में बच्चे बेचारे खुद को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस करते हैं. अलगाव की यही भावना उन्हें अवसाद की ओर ले जाती है. इस स्थिति से अपने बच्चों को बचाने के लिए कुछ प्रमुख बातों पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है

कम नहीं आंकें बच्चों की क्षमताओं को

कई अभिभावक दुनिया के बाकी सारे बच्चों को बेहतर और अपने बच्चे को ‘बेकार’ और ‘नकारा’ समझते हैं. बाकी बच्चों की तुलना में उनकी क्षमताओं को कम आंकते हैं. ऐसा करने से बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है और उसका आत्मविश्वास भी कमजोर होता है. ऐसा कतई न करें. बच्चे क्या कहना चाहते हैं, क्या करना चाहते हैं, क्या सोचते हैं, उसे जानने की कोशिश करें. धैर्यपूर्वक उनकी बातों को सुनें. उनसे ज्यादा उम्मीदें न पालें, बल्कि वे जो कर रहे हैं, उसकी सराहना करें. उनका हौसला बढ़ाएं.

    अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे कुछ गलत कर रहे हैं, तो भी उन्हें डांटने-फटकारने के बजाय उन्हें प्यार से समझाएं. उनकी गलतियां निकालने के बजाय उनके द्वारा किये जानेवाले कार्य के अच्छे व बुरे दोनों पक्षों के बारे में उन्हें विस्तार से बताएं और उनसे खुद सही निर्णय लेने को कहें. इससे बच्चे के मन में जिम्मेदारी का अहसास पैदा होगा, जो उसे गलत निर्णय लेने से बचायेगा.

बच्चे को नकारात्मक माहौल से रखें दूर

अभिभावकों को चाहिए वे अपने बच्चों को ऐसे लोगों या ऐसी परिस्थितियों से हमेशा दूर रखें, जो उनमें नकारात्मक भाव पैदा करती हों. आप चाहे, लाख अपने बच्चे की सराहना कर लें, उनका हौसला बढ़ा लें या उनमें आत्मविश्वास पैदा करें, लेकिन अगर आपके आस-पास मौजूद कुछ अन्य लोग ठीक इसके विपरीत कार्य करते हैं, तो आप अपनी कोशिशों में कभी भी पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकते.

 बेहतर होगा बच्चे को सदैव सकारात्मक वातावरण और लोगों के बीच रखें. स्थिति न बिगड़े इसके लिए किसी बाल मनोवैज्ञानिक के संपर्क में रहें. इससे आपको बच्चे को सही निर्देशन एवं मार्गदर्शन देने में सहूलियत होगी. सही निर्देशन के अभाव में बच्चे के मानसिक, शैक्षणिक और शारीरिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

बच्चों की हर हरकत पर हो आपकी नजर

उपरोक्त मामलों के संदर्भ में बात करें, तो इनमें शामिल सभी बच्चों ने किसी एक ही घटना के आधार पर आत्महत्या जैसा इतना बड़ा कदम नहीं उठाया होगा. इसके पीछे जरूर कोई-न-कोई और कारण रहा होगा.

       आमतौर पर डिप्रेशन से ग्रस्त लोग भी सबसे आखिर में यह कदम उठाते हैं और उससे पहले भी ऐसा कदम उठाने से पहले कई हिंट देते हैं. अत: वह बच्चों की छोटी – से – छोटी हरकतों पर भी ध्यान दें. अगर बच्चा कई दिनों से चुप है या ज्यादा परेशान है, तो उससे बात करें. उसकी चुप्पी के पीछे की वजह को जानने का प्रयास करें. उनके साथ घूमने जाएं. उन्हें कोई हॉबी डेवलप करने और उसे एंजॉय करने के लिए प्रेरित करें. यह उनके लिए स्ट्रेस बस्टर का काम करेगा. किशोरावस्था डिप्रेशन से बचने के लिए भी यह तरीका बेहद कारगर है.

फिजिकल एक्टिविटी और आउटडोर गेम्स जरूरी

पैरेंट्स अपने बच्चों को हमेशा बाहर खेलने और फिजिकल ऐक्टिविटी के लिए हमेशा प्रेरित करें.
आजकल अधिकतर बच्चे फिजिकल एक्टिविटी नहीं करते हैं. दिन भर मोबाइल फोन, गेमिंग गैजेट्स आदि के अधीन हो चुके हैं, इससे उनकी दुनिया सिमट जाती है. परिणाम, जरूरत पड़ने पर वे अपने दिल की बात किसी से शेयर नहीं कर पाते. उनके जीवन में दोस्त, प्राकृतिक रोमांच आदि का अभाव हो जाता है, जो कि एक स्वस्थ्य शरीर एवं मन के विकास के लिए बेहद जरूरी है. ऐसे बच्चों के डिप्रेशन में पड़ने की संभावना बढ़ जाती है.

 

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