हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

भारत की मिट्टी बहुत सी उप्लाब्धियों के लिए प्रसिद्ध है। देश विदेश में यहां की संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों का डंका बजता है और यही कारण है कि आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ भारत की गुणवत्ता की प्रशंषा न होती हो। इसी श्रृंखला में सबसे ऊपर है भारतीय सिनेमा की विश्वस्तर पर लोकप्रियता।

यूँ तो हर विषय पर भारतीय सिनेमा में फ़िल्में बनाई गई हैं। फिर चाहे कमर्शियल सिनेमा हो या आर्ट फ़िल्में जीवन के हर पहलू को क़रीब से छूती कोई न कोई फ़िल्म हमें देखने को मिल ही जाती है। लेकिन मानव जीवन के सबसे अनमोल पहलू जिसपे सर्वाधिक फ़िल्में भारतीय सिनेमा में उपलब्ध हैं, वह है ‘प्रेम’। बॉलीवुड फ़िल्मों में प्रेम कहानियों का अपना ही अलग आकर्षण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्ल्ड सिनेमा में भारत अपनी लव स्टोरीज के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय है। शायद इसलिए क्योंकि प्रेम हमारी देव भूमि की परंपरा और संस्कारों में इस तरह रचा बसा है कि हमारे सिनेमा में इसका न होना दर्शकों की सोच के परे है।

प्रेम कहानियों पर आधारित फ़िल्में तो जैसे अपने साथ बॉक्स ऑफिस पर हिट होने की गारंटी लेकर आती हैं। प्रेम के हर पहलू को जिस खूबसूरती से भारतीय सिनेमा के अधिकतर फ़िल्म लेखकों और निर्देशकों ने दर्शाया है वह काबिले तारीफ है।

जात पात, रंग भेद, अमीर गरीब, गाँव – शहर, देश विदेश की हर सीमा का फर्क मिटाती इन् फिल्मों ने संबंधों को ही नहीं संपूर्ण मानव जीवन को नया आयाम दिया है। प्रेमी प्रेमिका, पति – पत्नी ही नहीं माता पिता, भाई बहन, मित्र, पड़ोसी, और दुश्मनों के प्रति स्नेह का भाव रखने का संदेश देती ये कहानियाँ भारतीय सिनेमा की प्रतिनिधि बन चुकी हैं।

लेकिन एक और खास बात है जो प्रेम की इस अवधारणा को भारतीय सिनेमा के लिए एक अलग पैमाने से तोलती है – और वो है स्वयं ‘प्रेम’ की अवधारणा में आया बदलाव। सिनेमा की शुरुआत से लेकर अब तक जितनी भी फिल्में इस विषय पर बनती आईं हैं उनमें धीरे – धीरे प्रेम को परिभाषित करने का तरीक़ा बदलता गया।

उन्नीस सौ पचास और साठ के दशकों में प्रेम कहानियाँ  मुख्य कहानियों का केवल एक हिस्सा हुआ करती थीं। अर्थात मेन – प्लॉट के अंदर एक छोटा हिस्सा यानी सब – प्लॉट। मुख्य कथा अधिकतर सामाजिक चिंतन पर आधारित होती थी जिसमें सामाजिक संदेश भी दिए जाते थे। फिल्मकारों का उद्देश्य समाज की बेहतरी के लिए एक कलात्मक प्रस्तुति देना होता था, अतः इन्हीं सामाजिक कहानियों के चलते, इनका अहम हिस्सा होते हुए भी, प्रेम कथा फ़िल्म के पिछले पृष्ठ पर ही रही थी। इस तरह की बहुत सी फिल्में उस दौर में बनीं और सुपरहिट भी हुईं। जैसे की – “बंदिनी, आवारा, प्यासा, दाग, सुजाता, काला बाज़ार, काला पानी, टैक्सी ड्राइवर, श्री420, दीदार, बाज़ी, गाईड” इत्यादि। प्रेम को अलग अंदाज में परिभाषित करतीं ये फिल्में सामाजिक चिन्तन और संदेशों से सजाई गईं और इनमें से बहुत सी फिल्में अन्तर्राष्टीय सिनेमा के इतिहास में भी मील का पत्थर साबित हुईं।

                                                                                                                                      * यह आर्टिकल अगले अंक में जारी रहेगा, ज़रूर पढ़ें।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu

विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

स्वंय के लिए और अपने परिजनों के लिए ग्रंथ का पंजियन करें!
ग्रंथ का मूल्य 500/-
प्रकाशन पूर्व मूल्य 400/- (30 नवम्बर 2019 तक)

पंजियन के लिए कृपया फोटो पर क्लिक करें

%d bloggers like this: