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*  पिछले अंक से आगे…

परिवार और संबंधों के महत्व और इन् संबंधों में प्रेम को इस दौर की फिल्मों में दर्शाया गया। बल्कि इन फिल्मों के कुछ साल बाद 2001 में आई “कभी खुशी कभी गम” में भी इसी प्रेम संबंध को बड़ी ख़ूबसूरती से दर्शाया गया। माता पिता, भाई बहन, दोस्ती, रिश्तेदारी और परिवार के प्रति प्रेम इन फिल्मों को हिट बना गया। उन्नीस सौ नब्बे के दशक में आईं कुछ फिल्में विशेष रूप से “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” ने प्रेम को सरहद के पार जीवित रखा – ये प्रेम केवल एक प्रेमी – प्रेमिका की युगल जोड़ी के बीच का सबंध ही नहीं था बल्कि ये प्रेम था देश की संस्कृति और अपनी मिट्टी की खुशबू से, अपने संस्कारों से। इसके बाद फिर 1998 में आई फ़िल्म “कुछ कुछ होता है” जिसने प्रेम के इन्हीं पहलुओं के साथ और एक प्रेम त्रिकोण के साथ, भारतीय सिनेमा में फिर से प्रेम को हर लिहाज से कहानी का मेन-प्लाट बना दिया। प्रेम का एहसास, प्रेम का निःस्वार्थ मूल, प्रेम के लिए समर्पण, प्रेम की कोमलता, प्रेम में तड़प और प्रेम के लिए त्याग जैसी भावनाओं को इन फ़िल्मों ने युवाओं में कूट-कूट कर भर दिया। एक रूमानी सी हवा बॉलीवुड से होती हुई देश भर में फैल चुकी थी। और इन कहानियों को अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर भी सफलता मिली। प्रेम अब अति महत्वपूर्ण था और परिवार इस प्रेम के साथ था। अपना प्रेम हासिल करने के साथ – साथ परिवार को जीतना इस दौर के प्रेमी अपनी वास्तविक जीत मानने लगे।

लेकिन, एक बार फ़िर, फ़िल्म पटकथाओं ने अपना चलन बदला और कुछ बेहद अलग कहानियाँ हाल ही में आईं फिल्मों में देखने को मिलीं। इस दशक की ये फिल्में जैसे कि “तमाशा” , “ऐ दिल है मुश्किल”, “बेफिक्रे”, “शुद्ध देसी रोमैंस” इत्यादि जिन्होंने प्रेम को कुछ ऐसे परिभाषित करने का प्रयास किया है कि उसमें व्यक्तिगत आज़ादी के महत्व को ही सर्वोपरि माना जा रहा है। किसी प्रकार की कोई प्रतिबद्धता ना होना इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशिष्टता है। फ़िल्म “शुद्ध देसी रोमैंस”‘ इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है जिसमें फ़िल्म के नायक और नायिका एक दूसरे से किसी प्रकार का कोई कमिटमेंट ना करने का फैसला लेते हैं लेकिन अपने रोमैंस को जीना चाहते हैं इसलिए एक साथ एक ही घर में रहने लगते है। प्रेम करना या प्रेम की अभिव्यक्ति को वे ‘स्टूपिड फीलिंग्स’ का नाम देते हैं और कभी ऐसा ना करने का निश्चय करते हैं। फ़िल्म “तमाशा” में नायक का संघर्ष अपने जुनून के प्रति उसके प्रेम को लेकर है, जिसमें ख़ुद को तलाशना ही उसके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहता है। इन कहानियों में समाज या माता पिता या खलनायक जैसा कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है, बस नायक – नायिका अपने ही भीतर की कमियों से जूझ रहे हैं। और यही कहानी का मेन प्लाट होता है।

मानव जीवन में लाइफस्टाइल में बढ़ते बदलाव, सोच और भावनाओं में आते बदलावों के चलते फ़िल्मी कहानियों पर एक बार फिर नया प्रभाव पड़ा है। एक बार पुनः ये फिल्में प्रेम को नए सिरे से परिभाषित कर रहीं हैं। कुछ इन्हें प्रैक्टिकल फ़िल्म्स भी कह रहे हैं। हर बार एक नई परिभाषा के साथ प्रेम भारतीय सिनेमा में उभर कर आया है और बार – बार बदलती प्रेम की इस अवधारणा को जनता ने समझा और सराहा भी है। कारण यही है कि फिल्में सदा से ही हमारे समाज और उसमें आये बदलावों को प्रीतिबिम्बित करती आईं हैं। तो, प्रतीक्षा करते हैं और देखते हैं, कि आने वाला बदलाव प्रेम की अवधारणा को अगली बार किस रूप में परिभाषित करेगा।

 

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