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यदि अगले पांच सालों में भारत की आंतरिक मूलभूत संरचनाओं को पक्का करने को अग्रता दी जाए, साथ ही साथ स्टार्टअप इण्डिया, मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं का सही रूप में क्रियान्वयन हो तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने वाले देशों में से एक होगा।

मई 2019 में भारत में लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए और श्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दूसरी बार भारी बहुमत से केंद्र में सरकार की स्थापना की। सतही तौर पर देखने पर यह सिर्फ एक राजनैतिक पार्टी की जीत लग सकती है, परंतु इस जीत का विश्लेषण करने पर यह विदित होता है कि यह न केवल एक राजनैतिक पार्टी की जीत है, बल्कि इसके साथ भारत के इतिहास में पहली बार लगातार 10 साल तक एक दक्षिणपंथी विचारधारा की सरकार केंद्र में सत्ता में रहने जा रही है। सन 1947 से लेकर 2014 तक अधिकांश काल तक जो सरकारें सत्ता में रहीं उनकी आर्थिक नीतियां साधारण रूप से समाजवाद और साम्यवाद के इर्दगिर्द घूमती नजर आती थीं। इसमें पार्टियों का आना जाना भलेही लगा रहता हो, पर वैचारिक रूप से जिस प्रकार आर्थिक नीतियों का विचार या क्रियान्वयन किया जाता था वह काफी मात्रा में वामपंथी विचारकों तथा अर्थशास्त्रियों द्वारा निर्धारित किया जाता था।

इसमें मुख्य तौर पर दो अपवाद नजर आते हैं, पहला श्री नरसिंह राव की सरकार जिसमें मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। इसी सरकार के कार्यकाल में भारत ने अपने गृह व्यापार को पूरी दुनिया के लिए खुला किया और इसके साथ भारत में कई दशकों से चले आ रहे लायसेंस राज को ख़त्म किया। कुछ आश्चर्य करने वाली बात यह है कि सामान्यतः सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से दक्षिणपंथी पार्टियों ने इस आर्थिक दक्षिणपंथी निर्णय का शुरुआत में विरोध किया साम्यवादी अर्थशास्त्रीय संकल्पनाएं हमारे भारतीय मनोविज्ञान का किस हद तक हिस्सा हो चुकी हैं इस बात का यह प्रमाण है। दूसरा अपवाद है श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में स्थापित हुई NDA की सरकार। इस सरकार के कार्यकाल में भारत ने ओपन इकोनॉमी अर्थात खुली आर्थिक व्यवस्था को काफी बड़े पैमाने पर अपनाने की कोशिश की जिसके परिणाम हमें आगे आने वाले कई वर्षों में देखने को मिले।

21वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था का अध्ययन करने की कोशिश की जाए तो इन परिणामों की पुष्टि हमें देखने को मिलती है, चाहे वह टेलिकॉम, आईटी, पर्यटन जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश हो या देश की आधारभूत संरचना जैसे खनिज, परिवहन, निर्माण इत्यादि क्षेत्रों में आने वाले निवेशकों और कामों का सैलाब हो, ये सभी 20वीं शताब्दी के अंत में निर्धारित की गई सरकारी नीतियों का ही नतीजा था। यूपीए-एक के कार्यकाल में इन नीतियों को वामपंथी दल सरकार का हिस्सा होते हुए भी इसी दिशा में कुछ हद तक आगे बढ़ाया गया जिसका काफी श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है, किन्तु यूपीए-दो के आते-आते इस विचारधारा में पुनः काफी बदलाव हुए, और भ्रष्टाचार तथा क्रोनिज्म ने एक अच्छी खासी उभरती अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया।

मोदी सरकार के सत्ता में आने पर 2014 में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस अर्थव्यवस्था के बंटाधार को सुधारने की थी। यदि श्री नरेंद्र मोदी जी के पिछले पांच सालों के लोकसभा व राज्यसभा में दिए गए भाषणों को सुना जाए तो इसके कई प्रमाण हमें उनके भाषणों में सुनने को मिलते हैं। इतना ही नहीं, मोदी सरकार के पहले पांच सालों के कार्यकाल में लिए हुए निर्णयों को देखा जाए तो इस बात की पुष्टि की जा सकती है, चाहे वह श्री नितिन गडकरी के मंत्रालयों द्वारा बड़ी मात्रा में मुलभुत सुविधाओं में निवेश करना हो, या ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में मोदी सरकार ने किया हुआ अतुलनीय काम हो। किन्तु अब पांच साल गुजर चुके हैं, भारतीय जनता पार्टी जैसा दक्षिणपंथी दल पुनः एक बार सरकार बनाने में स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार सफल हुआ है, और आज सम्पूर्ण विश्व में बदलती हुई राजनैतिक व्यवस्थाओं ने भारत के सामने खड़ी की हुई चुनौतियां एवं मुश्किलें काफी अलग हैं।

अगर हम 2010 के बाद हो रहे दुनियाभर के बदलाव पर नजर घुमाए तो हमें इसके कई प्रमाण सामने देखने को मिलते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के रूप में एक ऐसी सरकार कार्यकाल में है जिसका अगला कदम क्या होगा यह सोचना किसी मंज़े हुए विदेश नीति के जानकार के लिए भी असंभव सा काम है। ट्रम्प सरकार निर्वासन के प्रति हर संभव मंच से विरोध जताने से नहीं चुकती। अमेरिका फर्स्ट के नारे में अमेरिका जिस प्रकार ग्लोबल आइसोलेशन की भूमिका अपनाने की कोशिश कर रही है, वह भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी प्रकार ख़ुशी की बात नहीं हो सकती। इसके सिवा हाल ही में अमेरिका ने जिस प्रकार चीन के साथ व्यापार युद्ध की शुरुआत की है, तथा भारत को भी इसी सिलसिले में दबाने, धमकाने की कोशिश की है वह हमारे अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ाने का काम ही कर सकती है। यूरोप में भी यह नई अलगाव की भावना पिछले कई वर्षों में पहली बार इतने चरम पर जाती हुई प्रतीत हो रही है। ब्रिटेन की यूरोप से अलग होने की मांग अर्थात ब्रेक्जिट, इसी भावना का दृश्य रूप है। ब्रिटेन की जनता ने हालाँकि ब्रेक्सिट का चुनाव तो कर लिया है, पर यूरोपीय यूनियन ने जो समझौता अर्थात ब्रेक्जिट डील इंग्लैण्ड के सामने रखी है वह इंग्लैण्ड की संसद पारित करने में अभी भी कामयाब नहीं हुई है। यह समझौता हुए बिना यदि ब्रेक्जिट करना पड़ा तो ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर आर्थिक मंदी आने के आसार हैं। इसीसे बचने के लिए इंग्लैण्ड ने जो नए प्रधानमंत्री का चुनाव किया है वे भी डोनाल्ड ट्रम्प की ही तरह काफी अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं। उन पर भरोसा करने से स्वयं ब्रिटेन की जनता भी कतरा रही है। ऐसे में भारत उनसे किस प्रकार कूटनयिक सम्बंध प्रस्थापित करता है यह देखना बहुत दिलचस्प होगा।

तीसरी तरफ रूस और पुतिन है, जिन पर दिन-ब-दिन अमेरिकी चुनावों में हेराफेरी करने और अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी बातों में फंसाकर रूस का उल्लू सीधा करने के आरोप बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि आज के समय में रूस व्यापार एवं अर्थव्यवस्था के मामले में वैश्विक पटल पर कुछ बड़ा करने जितना सक्षम नहीं है परंतु फिर भी रक्षा, ऊर्जा, और ईंधन जैसे क्षेत्रों में आज भी एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी माना जाता है।

अंत में आती है आज के समय भारत के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती – चीन। चीन आज के समय में सिर्फ भारत ही नहीं अपितु अमेरिका, यूरोप, और साथ ही साथ कई छोटे दक्षिण एशियाई देशों के सामने बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहा है। आने वाले समय में भारत इस चीनी आर्थिक आक्रमण का किस प्रकार सामना करता है यह देखने वाली बात होगी।

यद्यपि भारत में अर्थव्यवस्था के दरवाजे 1990 के दशक में खुले, किन्तु चीन में इन दरवाजों ने 1980 के दशक में ही खुलना शुरू कर दिया था। 1980 के शुरुआती दौर में चीन ने खुली अर्थव्यवस्था के फायदों को समझने की शुरुआत कर दी थी। जिस ज़माने में हम एक बजाज स्कूटर खरीदने के लिए सालों वेटिंग में लगाते थे (क्योंकि लायसेंस राज) जिस ज़माने में भारत में काले बाजार में वस्तुएं खरीदना वैध तरीके से ज्यादा आसान था, उस समय में चीन एक बड़ी औद्योगिक उलथ-पुलथ से गुजर रहा था। जब हमने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खुला करना शुरू किया उस ज़माने में चीन हमसे पहले ही दस साल आगे निकल चुका था। इसका परिणाम यह हुआ कि इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में चीन एक बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था के रूप में खड़ा हो चुका था।

चीन ने इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में जो औद्योगिक घुड़दौड़ शुरू की उसकी प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे बाकी दुनिया को 2010 के बाद महसूस होना शुरू हुई।

और आज यह हालत है कि अमेरिका चीन का सबसे बड़ा कर्जदार देश बना हुआ है।

इस प्रतिस्पर्धा के सामने टिकने के लिए भारत आने वाले पांच से दस सालों में क्या कदम उठाता है यह देखना बहुत दिलचस्प होगा।

जहां चीन ने अपनी सस्ती निर्माण क्षमता के बल पर सारी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है, उसी प्रकार भारत की विदेशी अर्थनीति पिछले 20 सालों में काफी हद तक सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों पर निर्भर थी। भारत के आयात निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा सूचना प्रौद्योगिकी था। अमेरिका के सर्वाधिक एचबी-1 वीजा भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र द्वारा हासिल किए जाते थे। किन्तु पिछले कुछ सालों में इसमें कमी आई है। जैसे- जैसे भारत एक मजबूत उभरती अर्थव्यवस्था बनने के कगार पर है, वैसे-वैसे सेवा और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सस्ती सेवाएं देना भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किल साबित होता जा रहा है। फिलीपींस, वियतनाम जैसे छोटे देश इन सस्ती सेवाओं में तेजी से अपनी पैठ बनाते हुए देखे जा सकते हैं।

विश्व के बाकी देशों में पैदा हुई आइसोलेशन की भावना इस कठिनाई को और भी बढ़ाती हुई नजर आ रही है। किसी प्रौद्योगिकी, निर्माण या विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की क्षमता विकसित करना किसी देश के लिए थोड़ा कठिनाई भरा काम हो सकता है, परन्तु आयटी जैसे क्षेत्रों में स्वयंसिद्ध होना तुलनात्मक रूप से आसान होता है।

आने वाले समय में इसीलिए भारत को ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, छोटे गृह उद्योग जैसे वैकल्पिक व्यापार के क्षेत्रों में विनिमय करना अत्यावश्यक है।

इसके लिए जिस प्रकार के विनिवेश की आवश्यकता है वह चाहे ऋऊख के माध्यम से हो या मेक इन इंडिया जैसे प्रयासों से हो, करना बहुत आवश्यक है। साथ ही चीन जैसे खिलाड़ियों से जरूरत पड़ने पर मदद लेने के साथ ही आवश्यकता होने पर दो हाथ दूर रखना महत्वपूर्ण है। आर्थिक कर्ज के रूप में चीन ने धीरे-धीरे अफ्रीका और साथ ही साथ श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों को निगलना शुरू कर दिया है। कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है कि यह दूसरे औपनिवेशीकरण की शुरुआत है जिसके चरम स्थान पर आज चीन नजर आ रहा है। चीन जिस प्रकार अफ्रीका में निवेश कर रहा है, साथ ही साथ अपने बड़े-बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स पाकिस्तान जैसे देशों में एक मोटी रकम लेकर फैला रहा है वह किसी व्यापारिक युद्ध से कम नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत को जरूरत पड़ने पर चीन की भाषा में ही उसे उत्तर देना जरूरी होगा। यह करने के लिए क्या हम तैयार हैं, इसका जायजा लेना अगले पांच सालों में महत्वपूर्ण साबित होगा।

रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने कुछ मूलभूत निवेश करने में सफलता हासिल की है, जिसके परिणाम अब धीरे-धीरे हमारे सामने आ रहे हैं। भारतीय सेना धीरे-धीरे भारत निर्मित शस्त्रों का उपयोग करने लगी है जो आने वाले समय में हमें रक्षा क्षेत्र में स्वयंपूर्ण होने में मदद करेगा। यह स्वयंपूर्णता हमें बड़ी मात्रा में रक्षा पर खर्च होने वाली विदेशी पूंजी से छुटकारा दिलाएगी। इस क्षेत्र में काफी लम्बी दूरी तय करनी है, पर हमने कदम बढ़ाना शुरू कर दिए हैं, यह उल्लेखनीय बात है।

चंद्रयान-2 जैसी सफलताएं हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में भी काफी कुछ कहती हैं। किसी भी पश्चिमी देश की तुलना में अंतरिक्ष विज्ञान से सम्बंधित परियोजनाएं भारत में एक चौथाई कीमत में पूरी करना यह भारत की विशेषता है। अमेरिका के नासा जैसे संस्थानों के लिए भी ये बहुत अचंभित करने वाली बात है। इस क्षेत्र में यदि दूरदर्शिता दिखाई जाए तो आने वाले समय में यह क्षेत्र भारत के लिए विदेशी पूंजी का भंडार खोल सकता है।

आने वाला समय भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। एक मजबूत और निर्णयक्षम सरकार भारत के केंद्र में है। इसके साथ आज हम दुनिया की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में से एक गिने जाते हैं।

लेखक जर्मनी निवासी अर्थ विशेषज्ञ हैं।

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