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भारत में देश की गति-अगति के लिए प्रायः राजनीतिक कारणों को जिम्मेवार ठहराने की प्रवृत्ति रही है। यह एक हद तक सही भी है। नीति-निर्धारक सत्ता होने के कारण राजनीति की केन्द्रीय भूमिका तो है ही, लेकिन खुद राजनीति अब जिस कदर सूचना-प्रवाह के दबाव में कार्य कर रही है, राजनीति का एजेंडा जिस कदर मीडिया के द्वारा सेट हो रहा है, उससे यह आवश्यक हो जाता है कि विश्लेषण की राजनीतिक सीमाओं को तोड़ा जाए और सूचना-प्रवाह के देश पर पड़ने वाले प्रभावों का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए। इसका सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह है कि सूचना प्रवाह और उसके प्रभाव का आकलन आर्थिक आधार पर किया जाए।

जलवायु परिवर्तन का उदाहरण लेकर इस तथ्य को समझने की कोशिश करें तो बात अधिक स्पष्ट हो सकेगी। पहले जलवायु परिवर्तन  का आकलन सूखा-बाढ़ आदि के संदर्भों में किया जाता था। आम आदमी इस तरह के आकलन से अधिक जुड़ाव महसूस नहीं करता था, लेकिन जब से मौसम में होने वाली उठा-पटक का आर्थिक आधार पर आकलन होने लगा है, सामान्य व्यक्ति को भी जलवायु परिवर्तन की गंभीरता समझ में आने लगी है। ठीक इसी तरह यदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न मीडिया संगठनों द्वारा फैलाई जा रही फेक न्यूज का आर्थिक आकलन किया जाए तो हैरान करने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

फेक न्यूज का रैकेट गलत सूचनाओं के जरिए केवल निवेश को ही प्रभावित नहीं कर रहा है, भारतीय उपलब्धियों पर भी लीपा-पोती कर एक सशक्त देश के रूप में स्थापित होने की संभावनाओं को भी नुकसान पहुंचा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत को लेकर किस कदर दुराग्रही है, देश की छवि को खराब करने के लिए किस कदर अमादा है, इसका उदाहरण हम समय-समय पर देखते ही हैं।

मंगलयान की लांचिंग के बाद ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने एक कार्टून के जरिए भारत की उपलब्धि को जिस ढंग से रेखांकित किया था, उसको लेकर खूब गहमागहमी हुई थी। कार्टून में दिखाया गया था कि एक भारतीय किसान नंगे पैर अपनी गाय के साथ पश्चिमी देशों के इलीट स्पेस क्लब में शामिल होने के लिए दरवाजा खटखटा रहा है। यह कार्टून समाचार पत्र में ‘इंडियाज बजट मिशन टू मार्स’ नामक आर्टिकल के साथ प्रकाशित हुआ था। बाद में अखबार ने इस कार्टून को लेकर जो स्पष्टीकरण दिया वह भी लीपापोती करने जैसा था। सम्पादकीय पृष्ठ के सम्पादक एंडू रोसेनथाल ने कहा कि कार्टूनिस्ट हेंग किन सांग का लक्ष्य इस बात की तरफ संकेत करना था कि कैसे अब अंतरिक्ष अभियान पश्चिमी देशों का एकाधिकार नहीं रहा है।

न्यूयार्क टाइम्स की दुनिया भर में तीखी आलोचना उस समय भी हुई थी, जब पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान उसने समझौते में भारत को मुख्य बाधा बताते हुए एक कार्टून प्रकाशित किया था। कार्टून में रेखांकित किया गया था कि पेरिस जलवायु सम्मेलन की रेल आगे बढ़ रही है, लेकिन भारत हाथी के रूप में रेलवे ट्रैक के आगे आ गया है। इस कारण जलवायु सम्मेलन के डीरेल होने की संभावना बढ़ गई है।

इसी तरह पेरिस जलवायु सम्मेलन में भारत के मजबूत और स्पष्ट रूख को देखते हुए एक आस्ट्रेलियन अखबार न्यूज कॉर्प ने एक अति नस्लवादी कार्टून प्रकाशित किया था। दरअसल इस सम्मेलन में भारत ने विकसित देशों से अधिक जिम्मेदारी उठाने की मांग की थी और जलवायु परिवर्तन से संबंधित जटिलताओं से निपटने के लिए विकसित देशों से विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की भी शर्त रखी थी, ताकि विकासशील देश हरित तकनीक को अपना सकें। भारत ने पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान ही अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा गठबंधन के लिए भी पहल की थी।

इसी का मजाक उड़ाते हुए आस्ट्रेलियन अखबार ने एक कार्टून प्रकाशित किया। कार्टून में दिखाया गया था कि एक दीन-हीन भारतीय परिवार का एक सदस्य सोलर पैनल के टुकड़ों को आम की चटनी के साथ खाने की योजना बना रहा है। इस पर भी खूब बवाल मचा था।

इसके अतिरिक्त बीबीसी, अल जजीरा, फॉक्स न्यूज की भी उनके भारत विरोधी रूख के कारण बार-बार आलोचना झेलनी पड़ती है। बीबीसी ने अभी हाल ही में पशु-चोरी के कारण जनता द्वारा की गई हत्याओं को गोरक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किया। भारत अधिकृत कश्मीर को लकर भी उसकी खबर जगजाहिर है। इसके कारण उसकी किरकिरी हुई। भैंस-बकरी की चोरी की संबंधी घटना को गोरक्षा से जोड़ने का काम बीबीसी ही कर सकती है! बीबीसी की निर्भया रेप केस पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ भी भारत की छवि हनन का एक कुत्सित प्रयास था। इस डॉक्यूमेंट्री में एक बलात्कारी के चटपटे बयान को इस तरह से उछाला गया, मानो पूरा भारतीय समाज ही बलात्कार की मानसिकता से पीड़ित हो। इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रिनींग के बाद जर्मनी से ऐसे उदाहरण आए, जिसमें विश्वविद्यालयों ने भारतीय विद्यार्थियों को एडमिशन देने से मना कर दिया। यह इस डॉक्यूमेंट्री द्वारा बनाई गई गलत छवि का ही परिणाम था।

भारत का गलत नक्शा दिखाने के कारण भारत सरकार अप्रैल 2015 में अल जजीरा के प्रसारण को 5 दिनों के लिए रोक दिया गया था।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ही नहीं भारतीय मीडिया का भी एक वर्ग देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली खबरें लगातार प्रसारित कर रहा है। मुंबई में हुए आतंकी हमलों के दौरान भारतीय मीडिया का व्यवहार न केवल मीडिया नैतिकता को धत्ता बताने वाला था, बल्कि देश की सुरक्षा को भी नुकसान पहुंचाने वाला था। उस दौरान ऐसी खबरें आई थीं कि आतंकवादियों के आका टेलीविजन प्रसारण को देखकर आतंकियों को निर्देश दे रहे थे। इसके कारण आतंकियों के खिलाफ चलाए जाने वाला ऑपरेशन न केवल लंबा चला बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था की खामिया भी दुश्मनों के सामने उजागर हो गई।

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे मुकदमे के दौरान पाकिस्तान के पास जब कोई तर्क नहीं बचे तो उसने कुछ भारतीय समाचार-पत्रों और पत्रकारों के लेखों के जरिए कुलभूषण जाधव को भारतीय जासूस साबित करने की कोशिश की। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि किसी देश की मीडिया का उपयोग उसका दुश्मन अपने हितों को पूरा करने के लिए करे। भारतीय पक्ष का जवाब देते हुए कोर्ट में पाकिस्तान के प्रतिनिधि अधिवक्ता खव्वर कुरैशी ने भारतीय पत्रकार करण थापर और प्रवीण स्वामी के लेख को उदधृत किया। करण थापर का लेख इंडियन एक्सप्रेस में 2017 में प्रकाशित हुआ था, जबकि प्रवीण स्वामी ने फ्रंट लाइन के जनवरी 2018 के अंक में लेख लिखा था।

इसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि तो प्रभावित होती ही है विदेशी निवेश और सुरक्षा अभियानों को भी नुकसान पहुंचता है। इसके अतिरिक्त देश के अंदर भी घृणा और विद्वेष का माहौल पनपता है। सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचता है और आंतरिक चुनौतियां भी बढ़ जाती हैं।

भारत लंबे अरसे बाद विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति को लगातार मजबूती प्रदान कर रहा है। विश्व की स्थापित शक्तियां और सभ्यताएं कभी भी यह नहीं चाहेंगी कि भारत इसी तरह निरंतर आगे बढ़ता रहे और विश्व महाशक्ति बने या भारतीय शब्दावली में कहें तो विश्वगुरू के पद पर आसीन हो सके।

स्वतंत्रता के बाद अब भारत एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि उस पर राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक दबाव नहीं बनाए जा सकते हैं। इसीलिए सभी स्थापित शक्तियां सूचना-प्रवाह और संचार प्रक्रिया के जरिए भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। देश के, विकास पथ को सूचना षड़्यंत्रों के जरिए अवरुद्ध करने की चालें चली  जा रही हैं।

इस परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता हासिल करें। अपनी विशेषताओं को सही और सटीक ढंग से विश्वपटल पर रखने की योग्यता हासिल करें। सांस्कृतिक आक्रमणों का उत्तर देने के लिए वैश्विक सूचनात्मक अवसंरचना का विकास करें। अभी तक भारत में ऐसी कोई संस्था खड़ी नहीं हो पाई है, जो विश्व-भर में घट रही घटनाओं को भारतीय नजरिए और हितों के अनुसार प्रस्तुत कर सके। दुनिया भर को देखने का हमारा नजरिया अब भी पश्चिमी देशों की न्यूज एजेंसियों पर निर्भर करता है।

फेक न्यूज का रैकेट गलत सूचनाओं के जरिए केवल निवेश को ही प्रभावित नहीं कर रहा है, भारतीय उपलब्धियों पर भी लीपा-पोती कर एक सशक्त देश के रूप में स्थापित होने की संभावनाओं को भी नुकसान पहुंचा रहा है।

 मुंबई में हुए आतंकी हमलों के दौरान भारतीय मीडिया का व्यवहार न केवल मीडिया नैतिकता को धत्ता बताने वाला था, बल्कि देश की सुरक्षा को भी नुकसान पहुंचाने वाला था।

 इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि किसी देश की मीडिया का उपयोग उसका दुश्मन अपने हितों को पूरा करने के लिए करे।

 हम अपनी जरूरतें, विशेषताओं और योग्यताओं के आधार पर एक वैश्विक सूचना तंत्र खड़ा करें।

इसी कारण हमारे यहां यूरोप और अमेरिका को लेकर तो खूब चर्चा होती है लेकिन भारत से सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से गहराई के साथ जुड़े हुए पड़ोसी देशों के बारे में समाचार-पत्रों में एक तरह से सन्नाटा ही छाया होता है। भारतीय मीडिया पश्चिमी देशों में हो रहे विकास को एक मॉडल की तरह प्रस्तुत करता है और उसे अपनाने के लिए एजेंडा भी सेट करता है, लेकिन ठीक बगल में भूटान किस तरह सस्टेनेबल विकास को साध रहा है और शिक्षा स्वास्थ्य को सर्वोच्च वरीयता प्रदान कर रहा है, वह हमारे लिए खबर ही नहीं बनती। मूल प्रश्न यही है कि हम अपनी जरूरतें, विशेषताओं और योग्यताओं के आधार पर एक वैश्विक सूचना तंत्र खड़ा करें। अल जजीरा का उदाहरण यह बताता है कि वैश्विक सूचना तंत्र को खड़ा करना सुरक्षा और सभ्यता के लिहाज से कितना महत्वपूर्ण है। अल जजीरा की कहानी यह भी बताती है कि वैश्विक सूचना तंत्र खड़ा करना कोई बहुत महंगा और मुश्किल कार्य नहीं है। जरूरत केवल समझ और संकल्प की है। भारत का सूचना महाशक्ति बनने की दिशा में पहल करना समय की मांग है। विश्वगुरू बनने का लक्ष्य एक वैश्विक संचारीय अधोसंरचना के बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता।

   लेखक हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्व विद्यालय में असिस्टंट प्रोफेसर हैं।

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