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’ऋषि’और ’आध्यात्मिक’ नामों से किसी को भी परहेज हो तो इसे ’शून्य बजट की खेती’ भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें किसान को खेती के लिए बाजार से बहुत ही कम चीजें लानी हैं। यानी लगभग न के बराबर बाजार पर किसान की निर्भरता रहती है। हां, गोबर, गोमूत्र और कृषि के शेष अंश के साथ सूर्यप्रकाश के हिसाब से अपने प्रबंध से पर्याप्त अन्न उत्पादन हो सकता है।

अब यह बात बहस के लिए शेष नहीं बची है कि आजकल हम सब अपर्याप्त व जहरीले अन्न, जहरीले जल, जहरीली हवा और कुपोषण के बीच रहने के लिए अभिशप्त हैं। मानकर चलिए कि आज भी हमारे कदम, भविष्य को देखकर नहीं बढ़े, तो मौजूदा स्थिति वापस लौटकर जाने के लिए नहीं आई है। अब तो अपना ही मन प्रश्न करता है कि अपनी ही अगली पीढ़ी के जीवन के लिए, जो स्थितियां हम छोड़ जाएंगे, वे हमें खुद को मिली परिस्थियों से कितने गुना बदतर होंगी?

इस स्थिति के आने और आकर स्थाई हो जाने के कारणों की खोज में जब हम निकलते हैं, तो पाते हैं कि जिंदगी के हर हिस्से पर ’राज्य’ का ही कब्ज़ा शायद मुख्य कारण है। समाज की सक्रियता व सामूहिक बौद्धिकता तो कहीं दिखती ही नहीं। ऊपर से, हमने भी मान लिया है कि जो कुछ करना है, वह ‘सरकार’ को ही करना है।

दुर्दशाओं की एक बड़ी श्रृंखला है। हर दुर्दशा के मूल में, समाज की सामूहिक बौद्धिकता, उसकी सक्रिय भागीदारी और सबकी समाज संचालन में दिल से उपस्थिति का अभाव है।

बावजूद इसके, अच्छे कल के लिए की जाने वाली कोशिशें बंद नहीं हुई हैं। वे कोशिशें छोटी हो सकती हैं, बिखरी हुई हो सकती हैं, या सबको न भी दिखाई पड़ती हों, पर वे हैं तो सही। जरूरत बस, बृहत्तर स्तर पर उनकी पहचान की है, क्योंकि समाज-जीवन के रसायन शास्त्र में ये ही ‘उत्प्रेरक’हैं।

इन्हीं कोशिशों की चिनगारी, जिस दिन भी आग बनेगी, सब कुछ जरूर बदलेगा। असुरक्षा की गफलत में उनींदा पड़ा हमारा समाज बस एक बार ही तबियत से तय कर ले, तो ‘वह’ सबकुछ हो सकता है, जो हमारे कल को उज्ज्वल बनाएगा। हां, यहां तक कि ’आसमान में सूराख भी हो सकता है’।

किसान, किसानी, खेत, खलिहान, गांव, गरीब और गाय की निराशाजनक स्थिति की शुरुआत 1960 के दशक से मान ली जाना चाहिए। यही 1960 दशक था जब हमारे पेट संख्या में बढ़ गए थे, हमारे खाद्यान भंडार कम पड़ गए थे और हमारे पास विदेशी मुद्रा भी कम थी। तब सबके जिंदा रहने के लिए ‘लाल गेहूं’ अमेरिका से आया था। इसी संकट से निपटने के लिए, हमने ’हरित क्रांति’ का संकल्प लिया था।

संकट से टूटे हुए आत्म-विश्वास और ‘क्रांति’ लाने के जोश में, सबसे पहले, हमने अपनी खुद की सदियों से चली आ रही बौद्धिक-निधि को न सिर्फ भुला दिया, बल्कि उसे सदा सर्वदा के लिए विदा ही कर दिया।

क्योंकि ‘हरित क्रांति’ का आधार ही तथाकथित रूप से ज्यादा पैदावार देने वाले विदेशी बीज, विदेशी रासायनिक खाद, विदेशी कीटनाशक रसायन और विदेशी मॉडल के कृषि यंत्र थे। ये सब कब हमारी मजबूरी बन गए, हमें पता ही नहीं चला।

उसी मजबूरी में हमारा बैल, हमारी गाय और हमारे पारंपरिक बीज लगभग गायब ही हो गए। एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि एक ट्रैक्टर बीस बैलों को काम से बाहर करता है। अब आप देश में ट्रैक्टरों की गिनती कर, उसमें बीस का गुणा कर लें व गौ-मांस व्यवसाय के लाभ का अंदाज खुद ही लगा लें।

दुनिया के सारे तथ्य आजकल इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। ढूंढने से आप पाएंगे कि दुनिया भर के बीज और कृषि रसायनों के व्यापार पर मात्र छह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्ज़ा है। नाम जानना चाहें, तो वह भी जान लें- बीएएसएफ, बायर, डाउ, ड्यूपोंट, मोनसेंटो और सिंजेंटा। सब जगह इस व्यापार में, बाक़ी सब इन्हीं के बच्चे-कच्चे हैं।

भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के आयात के बाद सबसे ज्यादा आयात रासायनिक खादों का होता है। यानी पहले सभी (खाद-बीज और रसायन) मामलों में विदेशी मुद्रा का जाना और विदेशों पर हमारी निर्भरता रोज बढ़ रही है। किसी भी समाज की गुलामी, शायद ऐसे ही शुरू होती हो।

साठ के दशक का या ‘हरित क्रांति’ के हल्ले का यही वह काल था, जब सरकार कृषि के उत्पादन, उपार्जन और भंडारण में घुसी थी। इन्हीं दिनों ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य आयोग’ भी बना और सदियों से चली आ रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था समाप्त हो गई, क्योंकि अब हर जगह ‘सरकार’ थी।

‘हरित-क्रांति’ के नाम पर आई, व यहीं की बनकर रह गई कई विदेशी चीजों ने हमारी कृषि की लागत बढ़ाई, हमारी मिट्टी को भी बीमार कर दिया, और रसायनों ने खाद्यान्न को पहले जहरीला कर दिया, फिर उनकी पौष्टिकता को बर्बाद कर दिया।

साल-दर-साल यही हुआ और देश भीषण कृषि-संकट में आ गया। धीरे-धीरे यही संकट, जीवन और इंसानियत का संकट बन गया और अब इस संकट की विभीषिका को हम रोज भुगत रहे हैं।

खेती-किसानी के सामानों से जुड़ी कंपनियों की, अपने व्यापारिक लाभ के लिए की जाने वाली बदमाशियों की सैकड़ों-हजारों कहानियां हैं, और लगभग रोज ही दुनिया की कोई न कोई अदालत इनके खिलाफ फैसले सुनाती ही रहती है। भारत की किसी भी छोटी बड़ी अदालत में इनके फैलाए जहर और उससे होने वाली बीमारियों की सुनवाई रोज होती है।

इन कंपनियों ने सारी दुनिया के शोध और शिक्षण संस्थानों में रिसर्च फंडिंग के माध्यम से अपनी घुसपैठ कर ली है। साथ ही भारत सहित कई देशों की विधाई व्यवस्था में भी इनके दखल के कई प्रामाणिक उदाहरण हैं। इनकी घुसपैठ, और अपने देश की वोटों की राजनीति जब आपस में मिलती हैं, तो ‘नीम चढ़े करेले’ की कड़वाहट को भी मात दे देती हैं। इसी ‘मारक-मिलन’(डेडली कॉम्बिनेशन) ने चारों ओर तबाही मचा रखी है।

हरित क्रांति का जोर सिर्फ गेहूं और चावल के उत्पादन पर ही रहा, इसलिए भारत की वर्तमान राजनीति में ये दोनों ही फसलें वोट का साधन बनीं। क्योंकि इनकी सरकारी खरीद होती है। इस खरीदी में बड़ा भ्रष्टाचार होता है, व यही सरकारी खरीद सबके चुनावी घोषणा पत्रों में भी होती हैं। इसलिए बाकी सब फसलें छोड़कर किसान सिर्फ ये ही उगाते हैं। इसका पहला शिकार ईश्वर प्रदत्त ‘खाद्य विविधता’ को होना पड़ा।

ये दोनों फसलें अधिक पानी, अधिक खाद और अधिक रसायन लेती हैं, जो या तो हैं नहीं और हैं तो बहुत महंगे हैं। इनके दामों पर हमारा नियंत्रण नहीं हैं, इसलिए ये रोज महंगे ही होते जा रहे हैं। यह दुष्चक्र साल-दर-साल लगभग लाइलाज होकर चला आ रहा है।

इस दुष्चक्र को कुछ लोगों ने पहचाना व हमारी अपनी प्राचीन ‘मनीषा’ को वर्तमान संदर्भों में अपनाकर देखा और यह सिद्ध कर दिया कि हमारी भविष्य की खेती तो बहुत पहले से हमारे ही पास है।

विदर्भ में प्रो़फेसर श्रीपाद दाभोलकर ने अपने मित्रों और शिष्यों की एक बड़ी फ़ौज ही खड़ी कर दी, जिन्होंने ‘आध्यात्मिक खेती’, ‘ऋषि खेती’ या ‘शून्य बजट की खेती’ के नाम से स्वयं खेती कर यह बता दिया कि हमारे पूर्वजों की विधि से खेती करने पर पेट ही नहीं भरा जा सकता है, भूमि को स्वस्थ भी रखा जा सकता है, पर्यावरण को बचाया जा सकता है और लाभ भी कमाया जा सकता है।

विदर्भ में ही जन्मे सुभाष पालेकर को अब दुनिया ने जानना और मानना शुरू कर दिया है। अब लोग मानने लगे हैं कि हां, ऋषि-खेती या आध्यात्मिक-खेती पश्चिमी खेती से कहीं कमतर नहीं है।

1960 दशक था जब हमारे पेट संख्या में बढ़ गए थे, हमारे खाद्यान भंडार कम पड़ गए थे और हमारे पास विदेशी मुद्रा भी कम थी।

 ‘हरित क्रांति’ का आधार ही तथाकथित रूप से ज्यादा पैदावार देने वाले विदेशी बीज, विदेशी रासायनिक खाद, विदेशी कीटनाशक रसायन और विदेशी मॉडल के कृषि यंत्र थे।

 हमारे पूर्वजों की विधि से खेती करने पर पेट ही नहीं भरा जा सकता है, भूमि को स्वस्थ भी रखा जा सकता है, पर्यावरण को बचाया जा सकता है और लाभ भी कमाया जा सकता है।

 बंगलुरु, भोपाल, चंडीगढ़, जयपुर और दिल्ली के आसपास कई युवक विदेशों से वेतन के बड़े-बड़े ‘पैकेजेस’ छोड़कर ऋषि खेती, आध्यात्मिक खेती या शून्य बजट की खेती में काम कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के देवास जिले में नर्मदा के किनारे बसा क़स्बा नेमावर है। वहां बहुत ही कम जमीन पर, ऐसी ही खेती करते हुए एक किसान दीपक सचदे अपना परिवार तो चला ही रहे हैं, लाभ भी कमा रहे हैं। दीपक महंगी कार ‘जायलो’ रखते हैं। दीपक सचदे के खेत में अपनी संतुष्टि के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक सुदर्शनजी जाकर रहे थे। सारी चीजें अपनी आंखों से देखकर ही, उन्होंने सलाह दी थी कि सरकारों में बैठे लोगों को इधर जरूर देखना चाहिए।

अपनी विज्ञान की पृष्ठभूमि होने के कारण सारे तथ्यों को देखकर ही उन्होंने इसे भारत की ‘भविष्य की खेती’ माना था। मध्य प्रदेश के ही होशंगाबाद में राजू टाइटस हुआ करते थे, जो अब नहीं रहे। वे जिंदगी भर ‘ऋषि खेती’ कर बताते रहे कि यह यंत्रों और रासायनिक खेती का व्यावहारिक और श्रेष्ठतम विकल्प है।

आजकल गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित अपने गुरुकुल में दो सौ एकड़ जमीन में आध्यात्मिक खेती करते हैं। उनकी फसल, उनके उत्पादनों की पौष्टिकता और उनका लाभ, बिलकुल खुली किताब की तरह है, जो कोई भी देख सकता है। हिमाचल का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने इसी ऋषि, आध्यात्मिक या शून्य बजट की खेती को सारे राज्य के लिए स्वीकार्य करवा दिया था।

ये तो कुछ बड़े नाम हैं। बंगलुरु, भोपाल, चंडीगढ़, जयपुर और दिल्ली के आसपास कई युवक विदेशों से वेतन के बड़े-बड़े ‘पैकेजेस’ छोड़कर ऋषि खेती, आध्यात्मिक खेती या शून्य बजट की खेती में काम कर रहे हैं। ‘ऋषि’और ’आध्यात्मिक’ नामों से किसी को भी परहेज हो तो इसे ’शून्य बजट की खेती’ भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें किसान को खेती के लिए बाजार से बहुत ही कम चीजें लानी हैं। यानी लगभग न के बराबर बाजार पर किसान की निर्भरता रहती है। हां, गोबर, गोमूत्र और कृषि के शेष अंश के साथ सूर्यप्रकाश के हिसाब से अपने प्रबंध से पर्याप्त अन्न उत्पादन हो सकता है।

सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के उद्देश्य से आंध्र प्रदेश की सरकार ने ‘शून्य बजट’ की इस खेती पर संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना प्रस्तुतीकरण दिया था। उन्होंने तय किया है कि वे वर्ष 2024 तक, अपने सभी  60 लाख किसानों की 80 लाख हेक्टेयर भूमि में बिना रासायनिक खाद, बिना रसायनों, यंत्रों और बिना विदेशी बीजों से खेती शुरू कर देंगे। इसमें लगने वाली अधिकांश वस्तुएं किसान के अपने घर से आएंगी। छत्तीसगढ़ राज्य की तत्कालीन सरकार ने भी पहले-पहल अपने चार जिलों में शतप्रतिशत और शेष प्रत्येक जिले के एक ब्लॉक में ‘शून्य-बजट’की इस खेती का संकल्प लिया था। मध्य प्रदेश के ही सतना जिले के उचेहरा कस्बे में, हाल ही में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित गुमनाम किसान बाबूलाल दहिया रहते हैं। साधारण से किसान बाबूलाल हमारे देशी बीजों और उनके संरक्षण के काम को मौन साधना की तरह करते हैं। उनके पास धान की, हमारी अपनी पारम्परिक तीन सौ से ज्यादा किस्में सुरक्षित हैं।

बाबूलाल गौ-वंश की उपस्थिति मात्र को खेती में सफलता की गारंटी मानते हैं। वे तो कहते हैं कि एक ट्रेक्टर बीस बैलों को काम से बाहर करता है। जबकि भूमि के स्वास्थ्य के लिए गोबर और गौ-मूत्र बहुत जरूरी हैं। वे यह भी कहते हैं कि बीस बैल एक ट्रैक्टर के साल भर के सारे खर्चे से ज्यादा सस्ते पड़ते हैं। ये सारे उदाहरण सब लोग अपनी आंखों से देख सकते हैं। इसलिए संकट में पड़ी खेती में सफलता का त्रिलोक नापने या दुष्चक्र की आग का दरिया पार करने में ये कदम छोटे जरूर दिखें पर, इनकी दिशा तो सही है।

नए भारत की नई खेती यही ऋषि-खेती, आध्यात्मिक-खेती या शून्य बजट की खेती होगी। बस हम सबको ही प्रयास करना है और अपने आपके प्रयासों पर भरोसा भी रखना है।

       लेखक वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ हैं।

This Post Has 2 Comments

  1. किसानों की गंभीर स्थिति, हमारी परंपरागत ‘सर्वजन हिताय’ कॄषि को मात्र , ज्यादा और ज्यादा उत्पादन की एकमात्र सोच ,धरती माता का निष्ठुरता से दोहन ,इन गंभीर हो चुकी समस्याओं पर आपकी चिंता और व्यग्रता नितांत वाजिब है। इन विषयों पर आप लगातार लिख रहे हैं, साधुवाद । अरे !! कोई है ? कोई है भाई ? सुनो नं …. सुन रहें हैं ? मैं आप सभी के लिए ही कह रहा हूं!!! अब इस जलजले से डर लगता है मुझे !!! सबको सन्मति दे भगवान…. दिलीप व प्रधान

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