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आबोहवा का मिजाज बदल गया है और मौसम रूठ गए हैं। मनुष्य इसका दोषी है। जिस तेजी से हम जंगलों को काट कर हरियाली मिटा रहे हैं, जल, थल और आसमान में जहर भर रहे हैं, अपनी सदानीरा नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, उस सबका परिणाम है यह। नए भारत में इसे सुधारने के लिए हमें कदम उठाने होंगे।

तमिलनाडु के चेन्नई शहर में भीषण गर्मी और पानी के लिए त्राहि-त्राहि। विदर्भ और बुंदेलखंड क्षेत्र में वर्षा के लिए तरसते और सूखे की मार झेलते किसान। उत्तरी भारत के मैदानों में गर्मियों भर प्रचंड गर्मी और लू की लपटें। गर्मी से पहाड़ भी अछूते नहीं रहे। उधर यूरोप में भी पहली बार असहनीय गर्मी का आलम। इतना ही नहीं कहीं तबाही मचाते तूफान और कहीं बाढ़ की विभीषिका। यह सब क्या और क्यों हो रहा है? आखिर आबोहवा को क्या हो गया है?

ॠतुओं का चक्र

कभी समय पर ॠतुएं आती थीं, समय पर मौसम बदलते थे। वसंत का आगमन होता था और कली-कली खिल उठती थी। फिर ॠतु बदलती थी और वसंत का गुनगुना मौसम गरमाने लगता। लू की लपटें लेकर ग्रीष्म ॠतु आ धमकती और धरती को तपाती। फिर, तपती धरती की प्यास बुझाने के लिए उमड़ते-घुमड़ते बादलों और रिमझिम वर्षा के साथ पावस ॠतु आ जाती। बारिश की फुहारें रूकतीं तो गुनगुनी शरद ॠतु का आगमन हो जाता और दूर-दूर से प्रवासी पक्षी चले आते। तभी तो महाकवि तुलसी ने लिखा होगा, ‘जानि शरद ॠतु खंजन आए।’ शरद ॠतु विदा होती और मौसम में ठंड बढ़ने लगती। सर्दी साथ लेकर हेमंत ॠतु आ जाती। फिर शुरू होते पूस-माघ के चिल्ला जाड़े! सर्दी से दांत किटकिटाने और शरीर कंपकंपाने लगता। पता लग जाता था कि शिशिर यानी शीत ॠतु आ गई है।

मौसम और जलवायु

लेकिन, मौसम क्यों बदल रहे हैं? आइए, पहले यह समझ लें कि मौसम और जलवायु क्या है। हम अपने आसपास प्रकृति में जो परिवर्तन देखते हैं, वह उस जगह का मौसम कहलाता है। जैसे, जहां हम रहते हैं वहां कभी गर्म दिन होते तो कभी रिमझिम वर्षा होती है या सर्दी पड़ने लगती है। यह भी हो सकता है कि किसी दिन चटख धूप आ जाती है और दूसरे दिन आसमान बादलों से घिर जाता है। वातावरण में होने वाला यही परिवर्तन मौसम कहलाता है। अलग-अलग जगहों में अलग-अलग तरह का मौसम हो सकता है। किसी जगह का मौसम वहां की जलवायु या आबोहवा कहलाती है। अलग-अलग ॠतुओं की जलवायु भी अलग-अलग होती है। किसी जगह की जलवायु ग्रीष्म ॠतु में गर्म और शीत ॠतु में ठंडी होती है। यानी, अलग-अलग जगहों की जलवायु भी अलग-अलग तरह की हो सकती है। हमारे देश की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यहां विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरह की जलवायु पाई जाती है।

इसी तरह पूरी पृथ्वी की भी जलवायु होती है। पृथ्वी के विभिन्न भागों की जलवायु को समग्र रूप से देखा जाए तो वह पूरी पृथ्वी की जलवायु कहलाएगी। किसी जगह का मौसम चंद घंटों में बदल सकता है लेकिन पृथ्वी की जलवायु को बदलने में सदियां ही नहीं हजारों-हजार वर्षों का समय भी लग सकता है।

जलवायु परिवर्तन

इधर सदियों से चली आ रही जलवायु में विश्व के अनेक भागों में भारी परिवर्तन देखा जा रहा है। ़ॠतुओं का चक्र गड़बड़ा गया है। जब गर्मी पड़नी चाहिए, तब वर्षा की झड़ी लग जाती है और जब वर्षा होनी चाहिए तब सूखा पड़ जाता है। वसंत भी समय पर नहीं आता। कई बार तो सर्दियों में ठंडे, ऊंचे पहाड़ों का मौसम गर्म और नीचे मैदानों का मौसम बेहद ठंडा हो जाता है। जगह-जगह मौसम की इन गड़बड़ियों से पूरी पृथ्वी की जलवायु बदल रही है। पृथ्वी का वातावरण पहले की तुलना में बहुत गर्म हो गया है। इससे ग्लोबल वार्मिंग यानी वैश्विक तपन बढ़ती जा रही है।

यों लाखों वर्षों के दौरान अतीत में पृथ्वी की जलवायु में कई परिवर्तन होते रहे हैं। कभी इसकी जलवायु काफी गर्म थी तो कभी बेहद ठंडी भी हो गई। लेकिन, इधर मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है। पृथ्वी का तापमान पिछले 100 वर्षों के दौरान करीब एक डिग्री फारेनहाइट बढ़ चुका है। यों तो जलवायु परिवर्तन का कारण सूरज की लपटों से धरती की ओर आती अधिक गर्मी, पृथ्वी पर यहां वहां फटते ज्वालामुखी और वायुमंडल में फैलता उनका धुवां भी है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं मनुष्य की करतूतें हैं।

विश्व भर के शहरों में दिन-रात दौड़ती लाखों-करोड़ों गाड़ियां और कल-कारखाने वायुमंडल में जहरीला धुवां उगल रहे हैं। जंगल कटने और हर साल जंगलों में लगने वाली आग से भी वायुमंडल में धुवां भर रहा है। कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से भी वायुमंडल में हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। जैसे कांच और प्लास्टिक के ग्रीनहाउस के भीतर गर्मी बढ़ जाती है, वैसे ही ग्रीनहाउस का जैसा ही प्रभाव पैदा करने वाली इन गैसों के कारण गर्मी बढ़ती जाती है। सूरज की किरणों से जो गर्मी पृथ्वी पर पहुंचती है, उसका काफी अंश पृथ्वी से आसमान की ओर लौट जाना चाहिए। लेकिन, ये ग्रीनहाउस गैसें उस गर्मी को रोक देती हैं। इनमें सबसे हानिकारक गैस है- कार्बन डाइऑक्साइड।

अनुमान है कि हर साल करीब 3.2 अरब टन कार्बन डाइआक्साइड वायुमंडल में पहुंच रही है। औद्योगिकीकरण से पहले की तुलना में आज वायुमंडल में यह गैस 30 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ चुकी है। आज यह 38 भाग प्रति दस लाख भाग है जो पिछले  6,50,000 वर्षों में सर्वाधिक है। औद्योगिक क्रांति से पूर्व यह केवल लगभग 280 भाग प्रति दस लाख भाग थी। यानी, विगत 300 वर्षों से भी कम समय में ही वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा करीब 30 प्रतिशत बढ़ चुकी है। आइ पी सी सी ने आशंका जताई है कि यही हाल रहा तो सन् 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 450 से 550 भाग प्रति दस लाख भाग तक बढ़ सकता है जिसके कारण तापमान और समुद्रों का जल स्तर काफी बढ़ जाएगा।

वैज्ञानिक कहते हैं कि पिछला हिम युग करीब 11,000 वर्ष पहले समाप्त हुआ था और तब से पृथ्वी का तापमान लगभग 14 डिग्री सेल्सियस बना रहा। लेकिन, अठारहवीं सदी में औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ औसत तापमान भी बढ़ने लगा और पृथ्वी की जलवायु में भी परिवर्तन होने लगा। जलवायु परिवर्तन का पता इन सात लक्षणों से बखूबी लग जाता है : 1. बढ़ता तापमान, 2. वर्षा की घट-बढ़, 3. ॠतुओं में बदलाव 4. समुद्र में पानी के स्तर का बढ़ना, 5. पिघलते ग्लेशियर 6. आर्कटिक समुद्र में बर्फ का घटना और 7. ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक में बर्फ की परतों का पिघलना।

जानते हैं, अगर तापमान बढ़ता गया तो क्या होगा? धरती पर जीना दिनों-दिन दुश्वार होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन बढ़ता जाएगा जिसके कारण अकल्पनीय मौसमी घटनाएं होंगीं। बढ़ती वैश्विक तपन के कारण साइबेरिया, अलास्का और अन्य क्षेत्रों में जंगलों में भीषण आग लगने की घटनाएं भी हुई हैं। धुर उत्तर के वनाच्छादित क्षेत्रों में जमीन की सतह पर जमी ‘पीट’ और बर्फ की मोटी पर्माफ्रॉस्ट परत के पिघलने से उसमें संचित मीथेन तथा अन्य ग्रीन हाउस गैसें मुक्त हो जाएंगी और वायुमंडल में पहुंच कर तापमान को और अधिक बढ़ा देंगी। इस तरह तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया तो विश्व के कई हिमाच्छादित पहाड़ों की बर्फ पिघल जाएगी और वे सामान्य पहाड़ रह जाएंगे।

वैश्विक तपन के कारण ग्लेशियर भी पिघल कर सिकुड़ते जा रहे हैं। हिमालय क्षेत्र में ये तेजी से पिघल रहे हैं और आने वाले समय में इनके कारण गाद भर जाने से नदियों में भारी बाढ़ आ सकती है। ध्रुवों पर जमा बर्फ के बाद हिमालय में ही बर्फ के रूप में सबसे अधिक पानी जमा है। ग्लेशियरों के पिघलने से भारत, नेपाल और चीन में भारी जल संकट पैदा हो सकता है।

बढ़ते तापमान के कारण पिछले 100 वर्षों में विश्व में समुद्रों का जल स्तर 10 से 25 सेमी तक बढ़ चुका है। तापमान इसी तरह बढ़ता गया तो ग्लेशियरों के पिघलने तथा सागर जल के गर्मी से फैलने के कारण समुद्रों का जल स्तर काफी बढ़ जाएगा। इसके परिणाम भयानक होंगे। सागर तटोें पर बसे शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो जाएगा। महासागरों में स्थित तमाम द्वीप डूब जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण जलप्लावन की यह प्रक्रिया कई क्षेत्रों में शुरू भी हो चुकी है। हमारे देश के सुंदरवन क्षेत्र में घोड़ामारा द्वीप का क्षेत्रफल पहले 22,400 बीघा था जो अब केवल 5,000 बीघा रह गया है। उस 5,000 की आबादी वाले द्वीप में अब केवल लगभग 3,500 लोग रह रहे हैं। उन्हें मालूम है कि उनका यह द्वीप जल्दी ही डूब जाएगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2020 तक सुंदरवन का करीब 15 प्रतिशत क्षेत्र डूब जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अगर सागरों का जल स्तर 1.5 मीटर बढ़ गया तो दुनिया भर में सागर तटों पर बसे करीब 2 करोड़ लोगों के डूबने का खतरा पैदा हो जाएगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र और नील नदी के किनारे बसे शहर डूब सकते हैं। मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों को लहरें घेर लेंगी। हालैंड, जमैका और मालदीव जैसे देश जल प्रलय की भेंट चढ़ जाएंगे। तापमान बढ़ने से हरियाली उत्तर की ओर सिमटती जाएगी। धीरे-धीरे टुंड्रा वनों तक हरियाली नष्ट हो जाएगी जिसके कारण लाखों पशु-पक्षियों का जीवन संकट में पड़ जाएगा। अनुमान है कि वैश्विक तपन के कारण 2050 तक पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की लगभग 10 लाख से अधिक प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी।

जलवायु विज्ञानी बढ़ती वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन के कारण एक और आसन्न खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं। वह खतरा है भीषण समुद्री तूफान और घनघोर बारिश। विगत लगभग पचास वर्षों में वायुमंडल की तपन से सागरों का पानी भी गरमा गया है जिसके कारण सागरों से उठने वाली भाप की मात्रा में काफी इजाफा हुआ है। इस कारण तेज और भीषण समुद्री तूफानों की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा वर्षा का पैटर्न भी बदल गया है। मौसम, बेमौसम, कहीं भी, कभी भी घनघोर बारिश हो जाती है। कहीं भीषण गर्मी पड़ रही होती है तो कहीं लंबे समय तक भारी बर्फबारी होने लगती है। इस कारण खेती पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग यानी वैश्विक तपन बढ़ने से आबोहवा बदलती जा रही है। विश्व के कई भागों में भारी वर्षा हो रही है तो अनेक भागों में भयंकर सूखा पड़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। एशिया, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका में पानी का भारी संकट शुरू हो चुका है। तापमान बढ़ने से फसलों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। नतीजतन उपज घट रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्षा पर आधारित खेती में फसलों की उपज आधी रह जाएगी। इस तरह अकाल का साया फैलता जाएगा और विश्व भर में गरीब वर्ग ही नहीं, मध्यम वर्ग भी भूख से बुरी तरह प्रभावित हो जाएगा।

मतलब यह कि आबोहवा का मिजाज बदल गया है और मौसम रूठ गए हैं। इस समस्या की जड़ तक पहुंचने के बाद वैज्ञानिकों को इस रहस्य का पता लगा है कि इसमें हमारा यानी इस पृथ्वी पर निवास करने वाले मनुष्यों का हाथ है। हम ही जिस डाल पर बैठे हैं, उसे काट रहे हैं।

जिस तेजी से हम जंगलों को काट कर हरियाली मिटा रहे हैं, जल, थल और आसमान में जहर भर रहे हैं, अपनी सदानीरा नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, उस सबका परिणाम है यह। हमें यानी विश्व भर के सभी मनुष्यों को इससे सबक लेकर अब अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी धरती को फिर से संवारना होगा। अपनी गलतियों को स्वीकार करके फिर से हरियाली वापस लानी होगी और जल, थल तथा आकाश को विषैले रसायनों से बचाना होगा। अपनी भावी पीढ़ियों को बचाने के लिए हमें अपनी धरती और अपने पर्यावरण को बचाना ही होगा। दूसरा कोई रास्ता नहीं है, भले ही हम ‘चले जाएंगे कहीं और’ के सब्जबाग देखते रहे।

     लेखक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।

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