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नरेन्द्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं विदेश यात्राओं में भारतवंशियों को संबोधित करने की एक अलग किस्म की सुविचारित आकर्षक और प्रभावी परंपरा को आगे बढ़ाया है। अमेरिका के टेक्सस के ह्यूस्टन शहर में हाउडी मोदी कार्यक्रम इसी कड़ी का एक अंग था। 28 सितंबर 2014 के न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर के बाद से मोदी एवं उनके रणनीतिकारों ने यह सिद्ध किया था कि इन सभाओं का भारतवंशियों को भारत के साथ भावनात्मक रुप से जोड़ने, विदेश नीति में भारत के दूत के रुप में उनका उपयोग करने तथा देश और नेता की छवि को उच्चतम सोपान पर ले जाने के रुप में सफल उपयोग किया जा सकता है। इसके माध्यम से अपनी बात मेजबान देश एवं दुनिया तक बेहतर तरीके से पहुंचाई जाती है। इन कसौटियों पर यदि ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम का मूल्यांकन करें तो इसे भारत की दृष्टि से सफल कार्यक्रम कहा जा सकता है।

22 सितंबर का दिन इस मायने में वाकई ऐतिहासिक था, क्योंकि अभी तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसके पूर्व किसी विदेशी नेता के साथ इतनी बड़ी सभा को संबोधित नहीं किया था। भारत के नेता के साथ तो कभी मंच साझा हुआ ही नहीं था। इस सभा में डोनाल्ड ट्रंप का आना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय कद और साख के साथ इस बात का भी प्रमाण है कि कई मामलों में मतभेद के बावूजद अमेरिका भारत को पूरा महत्व देता है। सभा समाप्त होने के बाद जिस तरह दोनों नेता एक दूसरे का हाथ पकड़कर उपर उठाए लंबे समय तक आरएनजी स्टेडियम का चक्कर लगाकर लोगों का अभिवादन करते रहे निश्चित रुप से उसका व्यापक संदेश केवल अमेरिका में नहीं पूरी दुनिया में गया होगा।

भारत ऐसा देश है जहां अब विदेश नीति के मामले में भी एक स्वर कठिन है, अन्यथा इस यात्रा को भारत की दृष्टि से ऐतिहासिक मानने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अगर अमेरिकी भारतीय इतनी बड़ी सभा अपने प्रधानमंत्री के लिए आयोजित कर सकते हैं जिसमें जितने स्टेडियम के अंदर थे उससे ज्यादा संख्या में आने के इच्छुक जगह के अभाव में वहां पहुंच नहीं सके तो यह इनके बढ़े हुए प्रभाव का ही प्रमाण है। कह सकते हैं कि ट्रंप अपने चुनाव को देखते हुए वहां पहुंचे थे ताकि भारतीय अमेरिकियों का मत वे पा सकें। इसे सच मान लें तो भी यह भारतवंशियों की ताकत को ही साबित करता है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सभा में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों के 50 से ज्यादा सांसद तथा कई राज्यों के गवर्नर उपस्थित थे जिनमें रिपब्लिकन भी थे और डेमोक्रेट भी। इसके अलावा अनेक महत्वपूर्ण अमेरिकी नागरिक आए थे जिनका वहां सत्ता और कारोबार पर भी प्रभाव है। अमेरिका में इतना महत्व किस देश और नेता को मिलता है ?

मोदी के नेतृत्व में आर्थिक – सामाजिक विकास की आकड़ों के साथ बात करते हुए ट्रंप द्वारा भारत को विश्व की प्रमुख शक्ति मानना भी सामान्य बात नहीं है। दुनिया की महाशक्ति का नेता यदि भारत को प्रमाणपत्र देता है तो उसका असर पूरी दुनिया में होता है। इस समय अमेरिका में दुनिया भर के नेता और राजनयिक संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आ रहे हैं। उसमें अमेरिका और भारत के नेताओं की एकजुटता का असर लंबे समय तक रहना निश्चित है। पाकिस्तान की निराशाजनक प्रतिक्रिया तो हमें तुरंत मिल गई, क्योंकि उनके नेता इमरान खान तथा हमारे नेता के आवभगत में जमीन और आसमान का अंतर साफ दिख रहा था।

स्वागत के बाद ह्यूस्टन के मेयर सिल्वेस्टर टर्नर ने मोदी को ह्यूस्टन शहर की प्रतीकात्मक चाबी भेंट की, क्यों ? क्योंकि वे भारतवंशियों को वहां के विकास में योगदान और महत्व को स्वीकार करते हैं तथा भारत और अमेरिकी कंपनियों के साथ उर्जा सहयोग पर व्यापक समझौता हो चुका था। इसका प्रतीकात्मक महत्व यह था कि अब इस शहर की एक चाबी आपके पास है, क्योंकि इसके विकास में आपकी ज्यादा भूमिका होने वाली है। यहां हम ट्रपं एवं मोदी के भाषणों में विस्तार से नहीं जा सकते। पूरे देश और दुनिया के बड़े भाग ने उसे सुना है। यह ठीक है कि ट्रपं ने वहां भारत में अपने गुणवत्तापूर्ण सामग्रियों के निर्यात की उम्मीद प्रकट की, लेकिन जिन लोगों ने यह सोचा था कि वे वहां कुछ ऐसा बोल देंगे जिससे मोदी और उनके रणनीतिकारों के लिए विकट स्थिति पैदा हो जाएगी उन्हें निश्चय ही निराशा हाथ लगी है।

ट्रपं ने भारत के साथ भारतीय अमेरिकियों की प्रशंसा करते हुए वही बातें बोलीं जो सभी विवेकशील भारतीय सुनना चाहते थे। डॉनल्ड ट्रंप ने भारत – अमेरिका संबंधों की गर्मजोशी और दोनों देशों की साझा चुनौती का जिक्र करते हुए आतंकवाद पर जिस तरह हमला बोला वह हमारे बिल्कुल अनुकूल है। जब उन्होंने कहा कि अमेरिका कट्टर इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं और हम मिलकर इससे लड़ेंगे तो पूरा स्टेडियम बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा और लोगों ने स्टैंडिंग ओवेशन दिया।

उसके बाद उन्होंने सीमा सुरक्षा के महत्व पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि यह अमेरिका के साथ भारत के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। उनका यह कहना कि सीमा सुरक्षा को लेकर वह भारत की चिंताओं को समझते हैं का अर्थ समझना कठिन नहीं है। हमारी सीमा सुरक्षा की समस्या सबसे ज्यादा इस समय किस देश के साथ है ? ट्रंप का भाषण निश्चय ही पाकिस्तान के लिए तत्काल बड़ा धक्का है।

मोदी वैसे तो भारतवंशियों की सभा में भारत की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, इतिहास आदि की गौरवान्वित करने वाले अध्यायों का वर्णन कर आत्मगौरव बोध कराने की कोशिश करते हैं। लेकिन हाउडी मोदी में उनका भाषण बहुत हद तक भारत के वर्तमान और भविष्य पर केन्द्रित रहा। हाउडी मोदी यानी आप कैसे हैं ? मोदी का जवाब उन्होंने यह कहकर दिया कि भारत में सब अच्छा है। फिर भारत की दस भाषाओं में इसे बोलकर अमेरिकियों और दुनिया को बता दिया कि इतनी विविध भाषाओं वाले हमारे देश में एकता इसीलिए कायम है, क्योंकि निरंकुश एकरुपता का हमारा चरित्र नहीं है। उन्होंने कहा भी विविध पंथ, संप्रदाय सब हमारे यहां अपनी – अपनी उपासना पद्धतियों का पालन करते हुए साथ रहते हैं और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। यह दुनिया को बिना नाम लिए पाकिस्तान जैसे देशों के इस आरोप का दिया गया जवाब है कि भारत में अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है।

इसमें मोदी ने अपनी ही परंपरा का पालन करते हुए भारत में आ रहे बदलावों को रेखांकित कर यह स्थापित किया कि ‘न्यू इंडिया’ रुपाकार ले रहा है। अर्थव्यवस्था को लेकर क्या – क्या कदम उठाए गए हैं, भ्रष्टाचार के विरुद्ध क्या किया गया है, किस तरह कंपनियों के लिए काम करना आसान हुआ है, कर संग्रह को आसान बनाया गया है आदि की चर्चा इसलिए आवश्यक थी ताकि भारत में अपनी क्षमता का उपयोग करने पर विचार कर रहे भारतवंशियों तथा विदेशियों को निवेश करने की प्रेरणा मिले। आज भारत अपने से ही प्रतिस्पर्धा कर रहा है, वर्तमान भारत चुनौतियों को टालता नहीं उसका सामना करता है। हम 5 खरब की अर्थव्यवस्था बनाने को लेकर संकल्पित हैं।

इसी सदंर्भ में उन्होंने अपनी ही एक कविता की पंक्ति सुनाई कि ‘वो जो मुश्किलों का अंबार है वही तो मेरे हौंसलों की मीनार है।‘ बाजार पूंजीवाद के दौर में अपने देश की बेहतर ब्रांडिंग करना नेता की मुख्य भूमिका में शामिल है। कह सकते हैं कि मोदी ने इस भूमिका का ठीक प्रकार से निर्वहन किया।

किंतु लोगों की उत्कंठा अनुच्छेद 370 हटाने, जम्मू कश्मीर, आतंकवाद एवं पाकिस्तान पर सुनने की थी। यह इसलिए भी जरुरी था क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान ने जो रवैया अपनाया है उसमें भारतीय कूटनीति का मुख्य फोकस अभी यही है। अमेरिकियों और दुनिया को भी इसके बारे में संदेश देना अत्यावश्यक था। मोदी ने जैसे ही 370 को फेयरवेल देने की बात की लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। यह विचार करने की बात है कि जब उन्होंने यह कहा कि इस धारा को खत्म करने के बाद आम कश्मीरियों को भी वे सारे अधिकार मिल गए हैं जो इसके कारण उन्हें प्राप्त नहीं था तो ट्रंप एवं अन्य प्रभावी अमेरिकियों पर इसका क्या असर हुआ होगा ? इसके बाद उन्होंने बिना पाकिस्तान का नाम लिए यह प्रश्न उठाया कि चाहे 26 नवंबर का मुंबई हमला हो या 11 सितंबर को न्यूयॉर्क हमला उसके स्रोत कहां मिलते हैं ? इसके बाद उनका दृढ़ स्वर था कि अब समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। इसमें उन्होंने अपनी रणनीति से यह भी जोड़ दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ता से खड़े हैं और इसके लिए उनका स्टैंडिंग ओवेशन भी करवा दिया। यह ट्रंप को प्रकारांतर से बांधने की रणनीति थी और पाकिस्तान को संदेश कि कश्मीर और आतंकवाद पर अमेरिका हमारे साथ है। भारत को पता है कि यह लड़ाई हमें ही लड़नी है, पर ऐसे भंगिमाओं का अपना अलग असर होता है।

 

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