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दुनिया के सबसे प्राचीन सांस्कृतिक देश भारत और चीन है. हजारों वर्षो से भारत – चीन के मधुर सांस्कृतिक संबंध रहे है और इसी के आधार पर फिर से भारत – चीन के रिश्ते बेहतर हो सकते है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत व समान नैतिक मूल्यों को रेखांकित करने के लिए तमिलनाडु के महाबलीपुरम को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए चुना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत की यात्रा पर आए हुए है. वैश्विक परिदृश्य में बदलती चुनौतिया, आतंकवाद, रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, सीमा विवाद, आदि अनेक मुद्दों पर दोनों नेताओं की व्यापक चर्चा होगी. बता दें कि दुनिया में एक ओर इसाई देशों और इस्लामिक देशों की लामबंदी हो रहीं है, जो भविष्य के युद्ध की भूमिका तैयार कर रही है और दुनिया को अपने तरीके से चलाने के लिए प्रयत्नशील है. सीरिया युद्ध और अमेरिका – चीन ट्रेड वार इसका उदाहरण है. क्या आनेवाले खतरे को देखते हुए भारत और चीन एक साथ नहीं आ सकते ? जानकारों का मानना है कि यदि वैश्विक चुनौतियों व इस्लामिक आतंकवाद का सामना करने के लिए भारत – चीन साथ नहीं आये और आपस में ही लड़ते रहें तो इसका खामियाजा दोनों देशों को भुगतना पड़ेगा. इसमें सबसे अधिक नुकसान चीन का होगा. दोनों ही देशों का विश्व की महाशक्ति बनने का सपना एक साथ आने से ही पूरा हो सकता है. दुनिया में सबसे युवा देश भारत से बैर रखना चीन के लिए घाटे का सौदा हो सकता है और आतंकिस्तान कंगाल पाक का समर्थन करना चीन की नैया डुबो सकता है. क्या दूरदृष्टि का परिचय देते हुए दोनों नेता अपने राष्ट्रीय हित को साधते हुए भारत – चीन संबंधो को विश्वासपूर्ण मजबूत रिश्ते में तब्दील कर पाएंगे ? क्या एतिहासिक सांस्कृतिक विरासत के आधार पर फिर से भारत और चीन अच्छे दोस्त बन पाएंगे ? अपनी बेबाक राय दें 

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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