हिंदी विवेक : we work for better world...

****अविनाश सिन्हा***
अंगे्रजी मेें लिखी गई यह प्ाुस्तक आजकल मीडिया मेेंकाफी चर्चा मेें है और इसके लेखक ‘हिंदी विवेक’ के पाठकोें के जाने माने श्री रतनशारदाजी हैं। उनकी इस प्ाुस्तक मेें उनकी सामाजिक सजगता और विभिन्न समय पर होने वाले आंदोलनोें से विचार करने की प्रवृत्ति और उससे होने वाला चिंतन अभिव्यक्त हुआ है। उनकी यह प्ाुस्तक उन सभी लोगोें के लिए है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना चाहते हैं, इसकी गतिविधियोें को जानना चाहते हैं और उनके लिए भी जो रा.स्व. संघ पर नजर रखे हुए हैं। इससे देश और दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से को विश्व के इस सबसे बड़े गैरसरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) के कार्यकलापोें को देखने और समझने का मौका मिलेगा। प्रमुखता से यह इस संगठन का जीवंत खाका है जो सभी की जानकारी के लिए लिखा गया है, जो बहुत कम लोगोें को पता है। रा.स्व.संघ के कार्यकर्ता कैसे तैयार होते हैं, संघ की कार्यप्रणाली क्या है – इससे हम बहुत कुछ जान सकते हैं। उन्होेंने स्वतः यह प्ाुस्तक साक्षीभाव से लिखने का प्रयत्न किया है। लेखक ने नपीतुली बातोें मेें विषय को समझाया है। फिर भी उनका संघप्रेम और उसके प्रति निष्ठा उनके संस्कारोें मेें समाविष्ट होने के कारण पुस्तक मेें अवश्य हर जगह व्यक्त है। उनके मन मेें आदर का स्थान रखने वाले सभी व्यक्तियोें के संस्मरणोें का उपयोग करने से प्ाुस्तक पठनीय हो जाती है और जमीनी सचाई की ओर हमेें ले जाती है। पुस्तक मेें ऐसे भी संस्मरण हैं जिसे पढ़ने से कई घटनाएं प्ाूरी तरह सामने साक्षात आ जाती हैं। लेखक का सोचना है कि प्रत्येक आंदोलन को अपना आधार बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक संपर्क के साधनोें का इस्तेमाल करना चाहिए।
पुस्तक की शुरूआत मेें उन्होेंने आपात्काल के समय मेें संघ की तत्कालीन सत्ता से संघर्ष की चर्चा की है। इस संघर्ष मेें संघ ने सिर्फ जनतंत्र की रक्षा के लिए काम किया था। उस समय के क्रूर दमनचक्रोें को लेखक ने गिनाया है और उस समय की परिस्थिति का वर्णन भी किया है। उसको उन्होेंने युवा कार्यकर्ताओें को सीखने का समय बताया है जिसमेें कार्यकर्ताओें ने भूमिगत होना सीखा, जेल जाना सीखा, संघ से अलग मत रखने वालोें का विचार जाना और विभिन्न राजनीतिक नेताओें की चुनावी राजनीति को समझा। आपातकाल के अंत मेें संघ के प्रमुख श्री बालासाहब देवरसजी ने बीती हुई बातोें को भूल कर राष्ट्र के समग्र विकास की ओर ध्यान दिलाया था।
लेखक ने प्रस्तुत प्ाुस्तक मेें संघ के इतिहास को इन महत्वप्ाूर्ण घटनाक्रमोें मेें गिनाया है – भारत का विभाजन, प्रथम संघ बंदी १९४८, विवेकानन्द केन्द्र निर्माण, दूसरी संघ बंदी और आपातकाल, एकात्मता यात्रा डॉ. हेडगेवार जन्मशताब्दी, रामजन्मभूमि आंदोलन, तीसरी संघबंदी. इन सभी आंदोलनोें से संघ को समाज की अन्य संस्थाओें के साथ काम करने का मौका मिला। इससे संघ शक्तिशाली हुआ तथा उसकी ताकत बढ़ी। इस तरह समन्वय कर राष्ट्र निर्माण के नए आयाम खुले और विभिन्न क्षेत्रोें मेें काम करने की आवश्यकता समझ मेें आई।
पुस्तक मेें संघ के संविधान के महत्त्वप्ाूर्ण हिस्से दिए गए हैं। भारत का विश्व मेें योगदान मेें लेखक ने योग, आय्ाुर्वेद, संस्कृत, आध्यात्मिकता और प्ाुराने ग्रंथ जैसे गीता, वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत बताया है। लेखक ने भारत की संगणक क्षेत्र मेें प्रगति और सूचना प्रौद्योगिकी मेें विस्तार को गणित, विज्ञान और ज्योतिष मेें भारत के प्ाुराने इतिहास और संय्ाुक्त परिवार की परंपरा की देन बताया है। लेखक ने अपने देश के हिंदुओें की इतिहास भूल जाने की प्रवृत्ति बताई है और प्ाुस्तकोें मेें इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश करने से उठे प्रश्नोें को भी उठाया है।
लेखक ने संघ का डॉ. हेडगेवारजी के द्वारा प्रारंभ करना, अल्पसंख्यकों के बारे मेें संघ के विचार, वामपंथी धर्मनिरपेक्षता का फासीवाद, हिन्दुओें की संगठित होने की आवश्यकता पर बहुत कुछ जोर दिया है। संघ की प्रार्थना, उसका अर्थ, शाखा पध्दति, संघ के विभिन्न कार्यक्रम और उनका मानवीय संबंधोें पर प्रभाव कार्यकर्ताओें की प्रबंधन क्षमता मेें वृध्दि, कार्यकर्ताओं का बंधुभाव और नेतृत्व क्षमता मेें विकास जो संघ मेें होता है का कर्णन किया है और इसके लिए डॉ. श्रीमती साधना सतीश मोद के रिसर्च अध्ययन का भी संदर्भ लिया गया है। संघ के संगठन का खाका, संस्कारोें की योजना और संघ के उत्सवोें का भी विस्तार से वर्णन है। संघ से संबंधित सेवा कार्यों की लंबी सूची भी उन्होेंने पेश की है। प्रचारक जैसी विश्व मेें एकमात्र योजना संघ मेें ही है। जिसका विस्तार से जिक्र किया गया है।
वर्तमान मेें संघ के विचार, संघ के सरसंघचालकोें का छोटा सा परिचय, १९४२ के आंदोलन मेें संघ की भूमिका, १९४८ की संघ बंदी, संघ प्रमुख और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री श्री वल्लभभाई पटेलजी से संवाद के अंश, १९४८ का सत्याग्रह संदर्भ और पढ़ने के लिए प्ाुस्तकोें की सूची भी प्ाुस्तक की विशेषता है।
संघ की रहस्यात्मकता का आवरण हटाते हुए लेखक ने कहा है कि, संघ का सबसे बड़ा रहस्य है आत्मा और ह्दय से काम करना, न कि तर्कों से। कार्यकर्ता यहां ह्दय से जोड़े जाते हैं और उनमेें समाज के कष्टोें को दूर करने की इच्छा जगाई जाती है। देशभक्ति और राष्ट्रनिर्माण की भावना उन्हेें कार्यक्रमोें से मिलती है। यह संस्कार प्ाुराने कार्यकर्ताओें के जीवन को देख कर नए कार्यकर्ताओं मेें आता है। त्याग की भावना इस तरह खड़ी होती है कि नए लोगोें को पता भी नहीं चलता और वह अपना सब कुछ देने के लिए तैयार होने लगता है। मिलबैठकर सोचना और बंधुभावसर्वत्र दिखाई देता है।
यहां तक कि दूसरे कार्यकर्ताओें के परिवार के सदस्योें को भी वह अपना लगने लगता है। निष्कलंक चरित्र जो शाखा पध्दति से तैयार होता है वह अन्य संगठनोें के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। कार्यकर्ता अपने विरोधियोें से भी स्नेह संबंध रखता है। जिससे विरोधी भी संघ के नजदीक आकर संघ समर्थक बन जाते हैं। लेखक ने इस संघगीत का मुखड़ा लिया है- शुध्द सात्विक प्रेम ही संघ का आधार है।
लेखक के अनुसार संघ मेें कुछ गुप्त है यह प्रसार माध्यमोें में लगने का एक प्रमुख कारण शब्दावली है जो संघ ने विकसित की है और उनके रोजमर्रा के प्रयोग मेें आने वाली से अलग है। इसके अलावा उन माध्यमोें को इस बात का आश्चर्य भी होता है और विश्वास ही नहीं होता कि यह संगठन अपने किए हुए कामोें को छपवाता भी नहीं है। इसका कारण भी संघ के प्रमुख ३३ वर्षों तक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर जी रहे जो स्वयं आध्यात्मिक और प्रचंड बौध्दिक प्रतिभा के धनी थे और उन्होेंने संघ कार्यकर्ताओें को प्रसार माध्यमोें से दूर रखा। लेखक का यह स्पष्ट मत है कि प्रसार माध्यम और संघ नजदीक आयेें। उनमेें संघ के विचारोें का, कार्यक्रमोें का उसके दिए जाने वाले संस्कारोें का सही उल्लेख हो यह आवश्यक है।
एक ज्येष्ठ और कार्यरत संघ कार्यकर्ता द्वारा लिखे जाने से प्ाुस्तक मेें संघ के प्रभाव को व्यापक बनाने की इच्छा सन्निहित है। प्ाुस्तक अँग्रेजी मेें है, पर इसका हिंदी अनुवाद शीघ्र प्रकाशित हो यह अपेक्षा रहेगी जिससे संघ विचारोें का प्रभाव क्षेत्र बढ़े।
मो.: ९८२०१८८७६०
 

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