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देश में वायु प्रदुषण का स्तर इस हद तक बढ़ गया है कि हर साल लाखों लोगों की जान इसके कारण जा रहीं है. विकास की अंधी दौड़ में मानव जीवन खतरे में पड़ गया है और किसी को इसकी परवाह नहीं है. वायु प्रदुषण का बढ़ता स्तर जहरीली हवा का रूप ले चुका है और न जाने कितने लोगों को काल के गाल में समा चुका है. जंगलों का सफाया कर कांक्रीट के जंगलों का निर्माण, सड़कों पर गाड़ियों से निकलते बेतहाशा धुएं आदि के चलते लोगों का सांस लेना दूभर हो गया है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष २०१७ में ५ साल से कम उम्र वाले १,०३५,८८२.०१ बच्चों की मृत्यु विभिन्न कारणों से हुई. इनमें से १७.९ फीसदी यानी १८५४२८.५३ बच्चें फेफड़ों के संक्रमण के कारण मौत का शिकार बने. खासकर शहरों में वायु प्रदुषण के कारण सांस की बीमारी तेजी से फैलती जा रहीं है. अस्थमा, खांसी, एलर्जी, आदि अनेकानेक बीमारियां जहरीली हवा की देन है. जहरीली हवा यानी वायु प्रदुषण का निराकरण यदि जल्द नहीं किया गया तो न जाने कितने और लोगों की बलि चढ़ेगी. क्या वायु प्रदुषण को नजरअंदाज करने के बजाए प्रशासन इसका हल ढूंढेगा और सार्थक पहल कर इस समस्या से निजात दिला पाएगा ?स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टी से वायु प्रदुषण को खत्म करने के लिए क्या सरकार ठोस कदम उठाएगी ? अपनी बेबाक राय दें 

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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