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गोरा चिट्टा, गोल-मटोल चंद्रमा सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकाश, शीतलता, अमृत तत्व आदि प्रदान करके सबका उपकार करता है। यही कारण है कि चांद को लेकर न जाने कितने मिथक, कितनी कहानियां, कितने गीत और कल्प कथाएं इस सृष्टि में प्रचलित हैं।

जहां एक ओर वैज्ञानिकों ने धरती के एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा को शोध का विषय बनाया है और चांद पर पहुंचने का प्रयास किया है,  वहीं वेद, पुराण, स्मृतियों और ज्योतिष शास्त्र ने चंद्र को देव मान कर उसके महत्व और प्रभाव को दर्शाया है। चांद के प्रति साधारण मनुष्य के अपने अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, जिनसे वह उसे सदियों से देखता और परिभाषित करता आ रहा है। न जाने कितनी किवदंतियां चांद के लिए कही जाती रही हैं। पृथ्वी के लोगों के साथ चांद का अटूट रिश्ता है।

वेदों में सुंदर, शीतल चमकीले चंद्रमा को पूजनीय माना गया है। जैसे अग्नि, इंद्र, सूर्य आदि देवों के स्तुति-मंत्र  वेदों में संकलित हैं, उसी प्रकार चंद्रमा के स्तुति-मंत्र भी वेद में मिलते हैं। सूर्य -चंद्रमा को सुपथगामी एवं अनुकरणीय बताया गया है।

ऋग्वेद में कहा गया है- हे ईश्वर! हम सूर्य-चंद्र की तरह स्वस्ति सुपथ का अनुसरण करें।

चंद्रमा को प्रत्यक्ष भगवान माना जाता है। अमावस्या को छोड़ कर चंद्र देव अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर साक्षात दर्शन देते हैं। भारतीय संस्कृति में चंद्रमा सदैव ही पूजनीय रहा है।

चंद्रमा की उत्पत्ति के विषय में भी पुराणों में अलग-अलग कथाएं हैं।

स्कन्द पुराण के अनुसार क्षीर सागर के मंथन में से चौदह रत्न निकले थे। चंद्रमा उन्हीं चौदह रत्नों में से एक है। इसे भगवान शंकर ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया था। परंतु अन्य ग्रंथों के आधार पर ग्रह के रूप में चन्द्रमा की उपस्थिति समुद्र मंथन से पूर्व सिद्ध होती है।

चंदा को मामा क्यों कहा जाता है, इस संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। समुद्र मंथन में माता लक्ष्मी  के बाद अन्य रत्न भी निकले थे, उनमें चंद्रमा भी एक था। इसलिए इसे माता लक्ष्मी का भाई माना गया है। मां का भाई मामा होता है। चंदा मामा सबका प्यारा होता है। इसीलिए मां हमेशा से बच्चों को चंदा मामा की कहानियां और लोरियां सुनाती आ रही हैं।

जब हम चंद्रमा के प्रभाव की बात सोचते हैं, तो ज्योतिष और वेदों में मोहक, निर्मल चांद को मन का स्वामी माना जाता रहा है। चंद्र देव वनस्पति, औषधि, जल, मोती, दूध, अश्व और मन पर राज करते हैं। यह भी कहा जाता है कि हमारे मन की बैचेनी और शांति का कारण भी चंद्रमा ही होता है। ज्योतिषियों द्वारा हम प्रायः यह सुनते हैं कि मन को शांत रखने के लिए मोती की अंगूठी धारण करें। ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा का प्रभाव धरती पर पूर्णिमा के दिन सबसे ज्यादा रहता है। चंद्रमा का प्रभाव केवल हम मनुष्यों के मन और संवेगों पर ही नहीं अपितु पेड़-पौधे, वनस्पति, पशु-पक्षियों पर भी स्पष्ट देखा जाता है। समुद्र में ज्वार-भाटा का कारण भी तो यह चंद्र ही होता है।

गोरा चिट्टा, गोल-मटोल चंद्रमा सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकाश, शीतलता, अमृत तत्व आदि प्रदान करके सबका उपकार करता है। चांद का अतुलित सौंदर्य सभी जीव-जंतुओं, प्राणियों और वनस्पतियों को आकर्षित करता है। यही कारण है कि चांद को लेकर न जाने कितने मिथक, कितनी कहानियां, कितने गीत और गल्प कथाएं इस सृष्टि में प्रचलित हैं।

सूर्य की रोशनी से प्रकाशित, सबके मन को मोहने वाला प्यारा चांद जब मुस्कराता हुआ गगन में अपनी रूपछटा बिखेरता है, तब चांद के सौंदर्य से सभी का मन प्रभावित हो जाता है। कोई उसके सौंदर्य को देख श्रृंगार की अनुभूति में लिप्त होकर गा उठता है- रुक जा रात ठहर जा रे चंदा, बीते न मिलन की बेला- तो कोई विरही उसकी शीतलता में भी तपिश महसूस कर विरहाग्नि में जल उठता है। चांद हमेशा प्रेमियों का सबसे प्रिय साथी बन जाता है। वह प्रेम में उद्दीपन का कार्य करता है। कोई अपनी प्रेमिका के सौंदर्य की तुलना चांद से करता है, तो कोई नायिका चांद में लगे दाग का उलाहना देकर बुरा मान जाती है। कहते हैं, एक बार जब शीतल-मनोरम चांदनी में राधा-कृष्ण रासलीला कर रहे थे तब कृष्ण ने राधा के मुख की समता चंद्रमा के सौंदर्य से कर दी थी। राधा को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। वे रूठ गईं और बोलीं कि चंद्रमा में तो दाग है फिर उनकी सुंदरता की तुलना चांद से क्यों की? कृष्ण ने बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाया था।

पूनम के चांद की तो अनगिनत कहानियां इस संसार में यहां से वहां तक ़फैली हुई हैं। उस पर शरद यामिनी की पूर्णिमा का तो कहना ही क्या। कहते हैं इस दिन चंद्रदेव अमृत की वर्षा करते हैं। द्वापर युग में सोलह कलाओं के स्वामी भगवान कृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात को सोलह हजार गोपियों के साथ वृंदावन में महारास किया था। उस दिन ऐसी अमृत वर्षा हुई कि हर एक गोपी श्री कृष्ण के सानिध्य की अनुभूति कर आनंदमग्न हुई रास करती रही। आज भी शरद पूर्णिमा का बहुत अधिक महत्व है। शरदोत्सव बहुत जोर शोर से मनाया जाता है। इस दिन लोग खीर बना कर चांदनी रात में रखते हैं और उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। शरदोत्सव पर वृंदावन में तो बांके बिहारी के मंदिर में बांके बिहारी धवल चांदनी में दर्शन देते हैं।

तारक-छाया में सजी, मधुर- मदिर शरद पूनम निशा में मनोरम चांद की शोभा अद्वितीय लगती है। ऐसा लगता है जैसे दुल्हे सा सजा चंद्रमा तारों की बारात लेकर आ गया हो। चंदा की चांदनी दुल्हन सी प्रतीत होती है। चांद -चांदनी के मिलन का प्रतिबिम्ब जब सागर और नदियों के जल में पड़ता है, तब लहरों में लहराता चांद अपनी अनूठी छाप लोगों के हृदय पर अंकित कर देता है। चांद की शीतल चांदनी में रातरानी महक उठती है और  वातावरण को और भी अधिक मोहक बना देती है।

वैसे चाँद की हर तिथि की अपनी कहानियाँ अपने व्रत -उपवास हैं ।कहा जाता है – जिन बहनों के भाई नहीं होते वे भाईदूज के दिन चंद्रमा को अपना भाई मान कर उसकी आरती उतारती  हैं । इसीलिये बच्चे चाँद को ‘चंदा मामा’ कहते हैं और खुश हो कर चंदा मामा के गीत गाते हैं ।

चंदा मामा दूर के, पूए पकाएं बूर के

करवा चौथ पर स्त्रियां छलनी से चांद को देखती हैं और चांद की पूजा करती हैं। दूज, तीज, चतुर्थी, पंचमी, पूर्णिमा आदि तिथियों से सम्बंधित कई ऐसे त्यौहार हैं जिनमें स्त्रियां अपने पति एवं परिवार के मंगल की कामना करती हैं और पूरे दिन उपवास रखती हैं। वे चंद्र दर्शन के बाद ही भोजन ग्रहण करती हैं। कभी -कभी जब चंद्र देव बदली में छिप जाते हैं, तब गहन आस्था के कारण स्त्रियां चांद के दर्शन के लिए घंटों इन्तजार करती रहती हैं। चंद्रमा के प्रति उनकी आस्था देखते ही बनती है। कुछ लोग तो प्रत्येक पूर्णिमा के दिन उपवास कर चांद की पूजा अर्चना करते हैं।

चांद करवा चौथ का हो या ईद का हो, चांद तो सबका होता है। चांद कोई पक्षपात नहीं करता। वह तो एकदम धर्मनिरपेक्ष है। अन्य त्योहारों की तरह ईद का चांद भी बहुत सी खुशियां लेकर आता  है।

गीत-संगीत, साहित्य, शायरी, कला आदि में चंद्र के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। जब चंद्र के सौंदर्य के साथ कवि की कल्पना मिल जाती है, तब चांद के अतुलित सौंदर्य में भी चार चांद लग जाते हैं। सूर के पद में बाल कृष्ण मां यशोदा से कहते हैं,

मैया मैं तो चंद्र खिलौना लेहों।

साहित्य में चांद का उपमान के रूप में खूब प्रयोग किया गया है। बिहारी कवि कहते हैं,

गोरे मुख पर तिल बन्यो, ताहि करों पर नाम।

मानो चंदबिछाइकै, पौढ़े सालिग्राम॥

नायिका के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कवि बिहारी कहते हैं,

पत्रा ही तिथि पाइए, व घर के चहुँ पास ।

नित प्रति पून्यौ ही रहे, आनन ओप उजास।

पूर्ण चंद्र की प्राकृतिक सुषमा को राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त जी ने कितने सुंदर शब्दों में सजाया है-

चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल- थल में।

स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है, अवनी और अम्बर तल में।

सूर्य – चंद्र के गुणगान करते हुए कवि कहते हैं-

रवि जग में शोभा सरसाता, सोम सुधा बरसाता।

शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष में तिथियों के अनुसार चांद हमेशा अपने रूप बदलता रहता है। वह कभी एकदम लुप्त हो जाता है तो कभी छोटा तो कभी बड़ा। चंद्रमा के छोटे -बड़े रूप को देख कर कवि रामधारी सिंह दिनकर की कल्पना देखिए-

हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला,

सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

इस पर मां कहती है-

घटता-बढ़ता रोज़, किसी दिन ऐसा भी करता है

नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज़ लिवाएं

सी दे एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आए!

चंद्रमा में जो दाग दिखाई देता है उसके लिए भी नानी -दादी द्वारा बहुत सी कहानियां सुनाई गई हैं। किसी के अनुसार चंदा में बुढ़िया चरखा कातती दिखाई पड़ती है तो किसी के अनुसार उसमें खरगोश दिखाई पड़ता है।

चंद्रमा पर न जाने कितनी कविताएं, कितने गाने लिखे गए हैं। कहीं चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो, कहीं चांद सी महबूबा हो मेरी तुम और कहीं मां कहती है- चंदा है तू, मेरा सूरज है तू। कहीं चंदा और चकोर के अटूट प्रेम को दर्शाया गया है तो कहीं नटखट चांदनी के अतुलनीय सौंदर्य को दर्शाया गया है।

चंद्रमा पर अनेक मुहावरे भी प्रसिद्ध हैं- जैसे चार चांद लगाना (शोभा बढ़ाना ), चांद पर थूकना (निर्दोष पर दोष लगाना), ईद का चांद होना (बहुत दिन बाद दिखाई देना) आदि।

चंद्रमा लोगों के मनों पर इस कदर छाया हुआ है कि कई देशों ने तो चंद्रमा को अपने राष्ट्रीय ध्वज में भी स्थान दिया है। जैसे  सिंगापुर, नेपाल, मलेशिया, मंगोलिया, टर्की, पकिस्तान आदि।

चांदनी रात में नौका विहार का भी अपना आनंद है। मचलती लहरों पर चंचल शुभ्र चांदनी इठलाती हुई खेलती सी प्रतीत होती है और नभ में चमकता चंदा अपनी कलाओं से मन को मुग्ध कर देता है। शीतल नभ पवन जब छू कर जाती है तो रोमांचित कर देती है।

परंतु एक सत्य यह भी है कि इस नवीन युग में हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। आज इक्कीसवीं सदी में जब मनुष्य एक ओर चांद पर जमीन खरीदने की कल्पना करता है, वहीं दूसरी ओर हम बढ़ते कंंक्रीट के जंगल और प्रदूषण के कारण चांद- तारों से दूर होते जा रहे हैं। पहले लोग छत पर सोया करते थे। चांद की शीतल चांदनी की अमृत वर्षा से वे अतुलित आनंद प्राप्त करते थे। उनके मन-मस्तिष्क पर चांद-चांदनी का सकारात्मक प्रभाव पड़ता था। बच्चे सप्तर्षि तारों को ढूंढ़ते थे। अपने बड़ों से उनकी कहानियां सुनते थे, पर आजकल यह वातावरण लुप्तप्रायः हो गया है। आज तो हमारे हिस्से में खिड़की भर आसमान ही आता है और उसको भी मोबाइल चुरा कर ले जाता है।

आज विकास का युग है। विकास अति आवश्यक भी है, परंतु विकास के साथ प्रकृति के संसर्ग को भी ध्यान रख कर भवन आदि का निर्माण कार्य किया जाना चाहिए। जहां मात्र खिड़की भर नहीं, पूरा आसमान हमारा हो। अपने प्यारे चांद, तारों के अनूठे सौंदर्य से आनंद एवं अमृत तत्व  को हम प्राप्त करते रहे, जिससे मन प्रसन्न और स्वस्थ रहे। जीवन को नव ऊर्जा मिलती रहे। हम चांद-तारों से प्रेरित हो परोपकार करना सीखते रहें।

आज आवश्यक है कि हम अपनी प्रकृति से, नभ में चमकते सूरज, चांद -तारों से, बहती शीतल समीर से, पेड़-पौधों से प्यार करें। हम अपनी सृष्टि के अतुलनीय सौंदर्य से जुड़े रहें। प्रकृति के प्रति मानव का जुड़ाव स्वयं मानव के सुख-चैन के लिए परम आवश्यक है। प्रकृति से जुड़ कर ही हम सुख, समृद्धि, उत्साह, उमंग और शांति प्राप्त कर सकते हैं।

 

 

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