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चंद्रयान-2 अंतरिक्ष में भारत की एक लंबी छलांग के समान है। आने वाले समय में गगनयान और स्पेेस स्टेशन की स्थापना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। हम सभी भारतीयों के साथ इन अभियानों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में कई उपलब्धियां और पड़ाव आए हैं लेकिन उनमें से चंद्रयान-2 का महत्व कुछ और है। चंद्रमा के अज्ञात तथ्यों की टोह लेने निकला यह उपग्रह कई मायनों में अनोखा है। हालांकि इसका लैंडर 7 सितम्बर 2019 को अपेक्षित लैंडिंग करने में विफल रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की समूचा चंद्रयान-2 विफल हो गया। हमें याद रखना होगा कि चंद्रयान-2 के तीन मुख्य हिस्से हैं आर्बिटर, लैंडर और रोवर। लैंडर के भीतर रोवर था जिसे चंद्र सतह पर टहलते हुए चंद्रमा के भूगर्भीय अतीत, खनिज, तापमान आदि से जुड़े कई प्रयोग करने थे जो कि हो न सका। मगर हमें नहीं भूलना चाहिए कि आर्बिटर चंद्रमा की पूरे एक साल तक परिक्रमा करेगा और चंद्रमा के बारे में अनेक अज्ञात जानकारियां जुटा कर इसरो को प्रेषित करेगा। इसरो ने इस बात की पुष्टि की है कि चंद्रयान-2 मिशन में उन्हें सौ फीसदी नहीं बल्कि 90 से 95 फीसदी कामयाबी मिली है। विज्ञान के प्रयोग तो सतत रूप से जारी रहते हैं। वैज्ञानिक इस बात से परिचित हैं और इसके लिए तैयार रहते हैं।

इस संदर्भ में बिजली के बल्ब के आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन का बहुत अच्छा उदाहरण है। वह 1200 प्रयोगों के बाद बल्ब का आविष्कार करने में सफल हुए थे। एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने सारे प्रयोगों में विफल हुए और अंत में जाकर बल्ब का आविष्कार कर पाए। इस सफलता पर आप कैसा महसूस करते हैं? एडिसन ने बड़ी सहजता से पत्रकार को जवाब दिया। उन्होंने कहा-

एक वैज्ञानिक और आविष्कारक होने की वजह से सबसे पहले तो मैं इन प्रयोगों को विफलता नहीं मानता। वैज्ञानिक अनुसंधान में उसे प्रयोग कहते हैं जिसे आप विफलता नाम दे रहे हैं। दूसरी बात मुझे 1199 में ऐसे प्रयोगों के बारे में पता चल गया है जिनसे बल्ब का आविष्कार नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक प्रयोग और अन्वेषण को लेकर ऐसी सकारात्मक भावना किसी वैज्ञानिक या वैज्ञानिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के पास ही हो सकती है।

इसी संदर्भ में चंद्रयान-2 की आंशिक विफलता को भारत की कमजोरी मानना हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के मनोबल को कमजोर करना होगा। आप इसे ऐसे देखिए। इसरो के वैज्ञानिकों ने अपने पहले प्रयास में साल 2008 में चंद्रयान-1 से मिले नतीजों के द्वारा चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बर्फ जमे पानी के होने का संकेत दिया था। यह जानकारी पूरी दुनिया के लिए नई थी। चंद्रयान-1 में कुछ पेलोड और उनसे जुड़ी तकनीकें दुनिया के अन्य देशों के सहयोग से प्राप्त की गई थीं। लेकिन भारत के पहले चंद्र के करीब 11 साल बाद भारत ने अपने को इतना सशक्त बनाया कि चंद्रयान-2 को पूरी तरह स्वदेशी तकनीकों से विकसित किया। फिर इसे पानी की टोह लेने तथा चंद्रमा की सतह पर हीलियम आदि से जुड़े तथ्यों की जानकारी लेने के लिए अंतरिक्ष में भेजा। इतने बड़े अभियान में चंद्रयान-2 पर भारत का केवल 978 करोड़ का खर्च आया जबकि दुनिया के बड़े देश अपने अंतरिक्ष अभियान में इससे कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं। इतने कम बजट में भारत ने आर्बिटर को सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में स्थापित कर दिया जो कि अगले एक साल तक जानकारी देगा। यह अपने-आप में बहुत बड़े साहस, आत्मविश्वास और गौरव का विषय है।

चलें चंदा मामा के पास!

जैसी कि हमने ऊपर चर्चा की, चंद्रयान-2 भारत का अनोखा अंतरिक्ष मिशन है। इसका गंतव्य यानि चांद का दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र ऐसा स्थान है जहां दुनिया का कोई देश पहले नहीं पहुंचा था। यदि ‘विक्रम’ लैंडर की यहां पर सॉफ्ट लैंडिंग सफल होती और ‘प्रज्ञान’ रोवर अपना प्रेक्षण कर पाता तो चंद्रमा के बारे में अनेक अज्ञात जानकारियां मिलतीं। वैसे इसरो को अपेक्षा है कि आर्बिटर अपनी सीमा और क्षमता के भीतर एक वर्ष की अपनी परिक्रमा अवधि में कुछ ठोस जानकारियां एकत्र करेगा जिनसे भावी चंद्र अन्वेषण को दिशा मिलेगी। चंद्रयान-2 इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे प्राप्त जानकारी से चंद्रमा को लेकर हमारी समझ पहले से अधिक बढ़ जाएगी।

मिसाइल मैन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी एक बार कहा था कि चांद पर पहुंचने के बाद बुध और मंगल जैसे पृथ्वी से आगे के ग्रहों की टोह लेना (गहन अंतरिक्ष अन्वेषण) आसान हो जाएगा। इसके अलावा पानी की मौजूदगी की अगर भविष्य में पुष्टि हो जाती है तो चांद पर मानव बस्तियां भी बसाई जा सकती हैं। स्टीफेन हाकिंग ने कहा था कि आने वाले सौ वर्षों के बाद पृथ्वी मानव जीवन के अनुकूल नहीं रहेगी। इसलिए हमें परग्रही जीवन के लिए अनुकूल दिशाएं निर्मित करनी होंगी।

चूंकि चंद्रमा हमारा सबसे नजदीकी पड़ोसी और नैसर्गिक उपग्रह है। इसलिए इसकी सतह, खनिज, भूगर्भ इतिहास, चुम्बकीय क्षेत्र आदि की जानकारी से चंद्रमा के साथ-साथ पृथ्वी के विकास की गुत्थियां भी सुलझेंगी। इस संबंध में वैज्ञानिकों ने कुछ माडल बनाए हैं लेकिन चंद्रमा के बारे में अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। चंद्रयान-2 और भावी चंद्र मिशन चंद्रमा की उत्पत्ति के रहस्य से पर्दा उठाने का काम करेंगे। इनसे पृथ्वी की उत्पत्ति के जुड़े तार भी स्पष्ट होंगे।

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव जहां पर पानी के होने की संभावना मिली है, वह हिस्सा चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव की अपेक्षा अधिकतर छाया में रहता है। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि चांद के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र में पानी मौजूद है। इसके अलावा इस हिस्से में असंख्य क्रेटर भी मौजूद हैंं जिनमें आरंभिक सौरमंडल के जीवाश्म पाए जाने की प्रबल संभावना है।

चंद्रयान-2 दुनिया के अन्य चंद्र अभियानों से तीन मुख्य वजहों से अलग था। पहला चांद के दक्षिण ध्रुव क्षेत्र में सॉफ्ट लैंडिंग का यह प्रथम प्रयत्न था। दूसरा यह चंद्र मिशन समग्र स्वदेशी तकनीक से निर्मित था। तीसरा चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का यह प्रयास विश्व में अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे देश भारत ने किया। 

चंद्रयान-2 कई मायने में अनोखा मिशन

चंद्रयान-2 कई मायनों में पहले के अंतरिक्ष मिशन से अलग था। इस मिशन को विकसित होने में इसरो को लगभग एक दशक का समय लगा। चंद्रयान-1 के बाद चंद्रयान-2 चंदा मामा को नजदीक से जानने-समझने का एक सुनहरा मौका देगा। इस अभियान से अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में पूरी दुनिया में भारत की एक महत्वपूर्ण छाप पड़ी है। भारत सहित दुनिया भर के वैज्ञानिक, इंजीनियर, बच्चे और आमजन चंद्रमा और अंतरिक्ष विज्ञान को जानने के लिए उत्साहित-उत्प्रेरित हुए हैं। बच्चों में एक सहज उत्कंठा चंद्रयान-2 की पूरी कालावधि के दौरान देखने को मिली।

चंद्रमा की कक्षा में परिक्रमा कर रहे आर्बिटर के पेलोड द्वारा चंद्रमा से 100 किलोमीटर की दूरी से रिमोट सेंसिंग प्रेक्षण संपन्न किए जाएंगे। आर्बिटर, लैंडर और रोवर में 8 पेलोड लगाए गए थे जिनके अलग-अलग कार्य थे। लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर को चंद्रमा की सतह के तत्वों के गठन की जानकारी इकट्ठा करनी थी। इमेजिंग आईआर स्पेक्ट्रोमीटर का कार्य पानी की पुष्टि और खनिज मानचित्रण था। सिंथेटिक एपरचर राडार से ध्रुवीय क्षेत्र का मानचित्रण होना था। आर्बिटर हाई रिजोल्यूशन कैमरा वर्ष भर चंद्रमा का उच्च आवृत्ति मानचित्रण करेगा। सर्फेश थर्मो फिजिकल प्रयोग द्वारा चांद के सतह के तापमान और संबंधित की वैज्ञानिक पुष्टि की जाएगी। अल्फा पार्टिकल एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोप के द्वारा सतह के तत्वों का विश्लेषण किया जाना था।

22 जुलाई 2019 को भारत द्वारा चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष में इसके क्रमिक यात्रा पथ पर पूरी दुनिया की नजर थी। सभी बेहद कौतूहल से इसका अवलोकन कर रहे थे। यह मिशन भारत से निकल कर अंतरिक्ष में गोंते लगाते हुए चंद्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया। फिर एक और बड़ी सफलता मिली जब आर्बिटर से लैंडर बखूबी और सुनियोजित तरीके से पृथक हुआ और 7 सितम्बर 2019 को चांद की ओर पेंग बढ़ाने लगा।

लैंडर की साट लैंडिंग को मुकम्मल बनाने के लिए इसमें लगे थ्रस्टर को पृथ्वी से ऑन किया गया परंतु इसकी गति वांछित गति से अधिक रही, जिसके कारण लैंडर चंद्रमा की सतह पर उपयुक्त ढंग से सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर पाया। इसके बाद लैंडर से संपर्क टूट गया। 10 सितम्बर 2019 को आर्बिटर के द्वारा चंद्रमा की सतह पर लैंडर का चित्र इसरो को प्रेषित किया गया मगर हर संभव प्रयास के बाद भी इससे संपर्क नहीं साधा जा सका। बहरहाल आर्बिटर में लगे सर्वश्रेष्ठ रिजोल्यूशन कैमरे से पृथ्वी को चंद्रमा की शानदार छवियां प्राप्त हो रही हैं जो विश्व वैज्ञानिक समुदाय के लिए कई मायने में फायदेमंद हैं।

भारत एक समृद्ध वैज्ञानिक विरासत वाला देश है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अनेक उपलब्धियों के साथ अंतरिक्ष अन्वेषण इस देश को एक विशेष पहचान दिलाता है। इसके पीछे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की अहम भूमिका है। इस अमूल्य पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित करने में विक्रम साराभाई, सतीश धवन और कलाम जैसे भारतीय वैज्ञानिकों का अमिट योगदान रहा है। चंद्रयान-2 अंतरिक्ष में भारत की एक लंबी छलांग के समान है। आने वाले समय में गगनयान और स्पेश स्टेशन की स्थापना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। हम सभी भारतियों के साथ इन अभियानों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। हमें विश्वास है कि हम होंगे कामयाब!

 

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