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पाकिस्तान दो तरह से घिरा हुआ है। एक तरफ वह आर्थिक संकट में है और दूसरी तरफ मुस्लिम देश भी उससे कन्नी काट रहे हैं। इसके विपरीत मुस्लिम देशों से भारत के रिश्तों में गजब का सुधार हुआ है। यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी उपलब्धि है।

हाल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन के लिए रवाना होने के पहले अपने देश के निवासियों से कहा था, मैं ‘मिशन कश्मीर’ पर जा रहा हूं, इंशा अल्लाह सारी दुनिया हमारी मदद करेगी। पर हुआ उल्टा। महासभा में अपने भाषण के पहले ही उन्होंने स्वीकार कर लिया कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण के अपने प्रयासों में विफल रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने के भारतीय फैसले का ज्यादातर देशों ने समर्थन किया है और किसी भी मंच पर पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिल पाया है, यहां तक कि मुस्लिम देशों का भी नहीं। अमेरिका जाने के पहले इमरान खान सऊदी अरब गए थे, वहां से भी उन्हें कुछ मिला नहीं।

पाकिस्तान दो तरह से घिरा हुआ है। एक तरफ वह आर्थिक संकट में है और दूसरी तरफ इस्लामिक आतंकवाद का केंद्र बनने के फेर में ऐसा फंसा है कि उससे बाहर निकलने का रास्ता खोज नहीं पा रहा है। उसके सिर पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की तलवार अलग लटकी हुई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में तो उसे मुंह की खानी पड़ी ही है, पर इसके पहले 16 अगस्त को हुई सुरक्षा परिषद की बैठक में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इस्लामिक देशों में केवल तुर्की उसका समर्थन करता है, पर उसका समर्थन भी उसकी डूबती नैया बचाने में मददगार नहीं है। इसके विपरीत भारत को वैश्विक समर्थन तो मिला ही है, इस्लामिक देशों का भी साथ मिला है।

कोई सहारा नहीं

पाकिस्तानी नेताओं के उन्मादी बयान अब केवल अपने देश की जनता को भरमाने के लिए रह गए हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इस बात को अपने संपादकीय में स्वीकार किया है। अखबार ने लिखा है, ‘दुनिया ने पाकिस्तान की गुहार पर वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, जिसकी उम्मीद थी, बल्कि अमेरिका और यूएई ने तो भारत की इस बात को माना है कि यह उसका आंतरिक मामला है।’

इमरान खान ने भारत के आर्थिक कद और वैश्विक प्रमुखता को स्वीकार करते हुए कहा कि इसी वजह से कश्मीर पर पाकिस्तान के बयान की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा, लोग भारत को सवा अरब लोगों के बाजार के रूप में देखते हैं। अगस्त महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के गृह मंत्री ब्रिगेडियर एजाज अहमद शाह ने भी स्वीकार किया था कि पाकिस्तान, कश्मीर मुद्दे पर अपने रुख को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन पाने में विफल रहा है। मंत्री एजाज शाह ने कहा था कि, लोग हम पर विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन वे उन पर (भारत) भरोसा करते हैं।

मुस्लिम देशों के बीच भारत की बढ़ती और पाकिस्तान की घटती साख का पता पिछले कई सालों से नजर आ रहा है। खासतौर से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तथा ओमान जैसे देशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिले सम्मान से यह बात साबित भी हुई। इस साल फरवरी में पुलवामा कांड के बाद के घटनाक्रम में पाकिस्तान को इस्लामी देशों से जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हुई। खासतौर से इस्लामिक देशों के संगठन के सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्री को निमंत्रण दिए जाने के बाद इन रिश्तों में और खटास आई है।

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सऊदी रुख में बदलाव

इस साल फरवरी-मार्च में दोनों देशों के तनाव के बीच सऊदी अरब के शहजादे मोहम्मद बिन सलमान पाकिस्तान और भारत की यात्रा पर आए। उस यात्रा के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का परम्पराओं को तोड़ कर स्वागत करने के लिए हवाई अड्डे पर जाना सुर्खियों में था। सऊदी अरब में भी बदलाव आ रहा है। अब स्थितियां बदल रहीं हैं। शहजादे के नेतृत्व में सऊदी राज-व्यवस्था ने पुरातनपंथी मौलवियों पर दबाव बनाया है, स्त्रियों की दशा में सुधार किया है। अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने का प्रयास किया है, ताकि खनिज तेल पर अवलंबन खत्म हो। इसी रोशनी में सऊदी शहजादे की नवीनतम विदेश-यात्राओं को देखा जाना चाहिए। सरकार की विजन-2030 योजना एक आर्थिक-राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा है। सामान्यतः वह भारत की संवेदनशीलता की काफी हद तक अनदेखी भी करता रहा है, पर हाल के वर्षों में भारत के साथ उसके रिश्तों में नाटकीय बदलाव आया है।

पिछले दिनों सऊदी अरब की यात्रा के दौरान नरेन्द्र मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया। पिछले साल भारत से इजरायल की सीधी विमान सेवा सऊदी अरब के सहयोग से ही शुरू हो पाई। दोनों देशों की सेनाओं के बीच समन्वय और सहयोग की खबरें भी हैं। यह दर्शाने के लिए कि हम भारत के साथ अपने रिश्तों को पाकिस्तान के नजरिए से नहीं देखते, सऊदी शहजादे की यह यात्रा पाकिस्तान की यात्रा के फौरन बाद शुरू नहीं हुई, बल्कि वे पहले वापस अपने देश गए और फिर वहां से भारत आए। इन बातों का राजनयिक दृष्टि से महत्व होता है।

वह यात्रा पुलवामा हमले के फौरन बाद हुई थी, इसलिए माहौल में तल्खी थी, फिर भी भारत में उनका अच्छा स्वागत हुआ। सऊदी अरब के लिए दोनों देशों के बीच संतुलन साधना काफी मुश्किल काम है, पर उसे निभाने की बखूबी कोशिश की गई है। सऊदी विदेश मंत्री अदल अल-जुबैर ने अपने इंटरव्यू में कहा कि हम दक्षिण पूर्व एशिया में तनाव खत्म करने में मददगार बनेंगे और हम किसी भी किस्म के आतंकवाद के विरोधी हैं।

  आर्थिक रिश्तें

सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते हजारों साल पुराने हैं। इस वक्त करीब तीस लाख भारतीय सऊदी अरब में काम कर रहे हैं। सऊदी अरब ने पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर के निवेश का समझौता किया है, पर भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश का आश्वासन दिया है। हाल में वहां की पेट्रोलियम कंपनी ने भारत में बड़े निवेश की घोषणा की है। भारत की अर्थ-व्यवस्था में विकास कती संभावनाओं को देखते हुए सऊदी अरब को पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत जैसे देश बेहतर नजर आते हैं।

सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों इस्लामिक देश हैं और सऊदी अरब पाकिस्तान के काफी करीब रहा है। वह इस्लामिक देशों का नेता भी है, पर अब इस्लामिक देशों में भी उसके नेतृत्व को चुनौतियां मिल रही हैं। सीरिया, कतर और यमन में उसका सामना इस्लामिक देशों के साथ ही है। अरब राष्ट्रवाद का तीखापन भी अब कम होता जा रहा है। सऊदी अरब के अलावा यूएई भी अपने दृष्टिकोण में बदलाव ला रहा है। भारत के साथ दोनों के रिश्तों में काफी तेजी से परिवर्तन आया है।

  ओआईसी की भूमिका

सबसे बड़ा बदलाव इस्लामिक देशों के सहयोग संगठन (ओआईसी) में है। ओआईसी ने भारत के मामलों में हस्तक्षेप करना अब काफी कम कर दिया है। ओआईसी के विदेश मंत्रियों के उद्घाटन सत्र में इस साल भारत को आमंत्रित किया गया। विदेश मंत्रियों की परिषद का यह 46वां सत्र 1 और 2 मार्च को अबू धाबी में हुआ। भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस सत्र में ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ के तौर पर शरीक हुईं। उन्होंने वहां कहा कि चरमपंथ के ख़िलाफ लड़ाई किसी मज़हब के ख़िलाफ नहीं है। जो देश आतंकवाद को पनाह देते हैं, उन्हें निश्चित ही उनकी धरती से आतंकी शिविरों को समाप्त करने के लिए कहा जाना चाहिए।

पाक विदेश मंत्री शाह महमूद ़कुरैशी ने सुषमाजी की उपस्थिति की वजह से इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस न्योते को भारत में 18.50 करोड़ मुसलमानों की मौजूदगी और इस्लामी जगत में भारत के योगदान को मान्यता देने वाला एक स्वागत योग्य कदम बताया था। भारत की दिलचस्पी हमेशा ओआईसी की गतिविधियों में शामिल होने की रही है। दुनिया में दूसरे या तीसरे नम्बर की मुस्लिम आबादी भारत में रहती है, पर पाकिस्तान के दबाव में भारत को पर्यवेक्षक तक बनाने की कोशिशें विफल हुई हैं।

सन 1969 में जब ओआईसी की पहली बैठक रबात में हो रही थी, सऊदी अरब के तत्कालीन शाह ़फैसल के प्रयास से भारत को भी निमंत्रण दिया गया था। केंद्रीय मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद के (जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने थे) नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधि मंडल इस बैठक में शामिल होने के लिए रवाना हो भी गया था, पर रोम पहुंचने पर इस प्रतिनिधि मंडल से कहा गया कि वे वापस लौट जाएं, क्योंकि पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान ने धमकी दी है कि भारत इसमें शामिल हुआ, तो हम इस सम्मेलन का बहिष्कार करेंगे। मोरक्को स्थित तत्कालीन भारतीय राजदूत की एक टीम रबात पहुंच भी गई थी, पर उसे बाहर कर दिया गया। इस मामले के बाद भारत ने मोरक्को से अपने राजदूत को वापस बुला लिया था।

  घटता पाकिस्तानी असर

इसके बाद कई बार कोशिशें हुईं, पर सफलता नहीं मिली। सन 2002 में कतर ने पेशकश की कि भारत को विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में ऑब्जर्वर के रूप में बुलाया जाए, पर पाकिस्तान ने उसे ब्लॉक कर दिया। पाकिस्तान की पहल पर इस संगठन में कई बार कश्मीर के मसले को उठाया गया और भारतीय नीतियों की आलोचना की जाती रही है। बहरहाल ओआईसी में आए बदलाव पर  पाकिस्तानी बदहवासी भी साफ देखने में आई। बालाकोट पर भारतीय कार्रवाई के बाद पाकिस्तानी संसद में मांग उठी कि पाकिस्तान ओआईसी (ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) के पूर्ण अधिवेशन का बहिष्कार करें क्योंकि भारत को इसके पूर्ण अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए न्योता दिया गया है।

इस बार पाकिस्तानी दबाव में आकर यूएई ने निमंत्रण वापस नहीं लिया और अपमानित पाकिस्तान ने सम्मेलन का बहिष्कार किया। यह भी ज़ाहिर है कि भारत को निमंत्रण देने के पीछे सऊदी अरब की सहमति भी होगी। यूएई के विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन ज़ायेद अल नाह्यान ने भारत को न्योता दिया था। यूएई की सरकारी न्यूज एजेंसी अमीरात न्यूज ने तब कहा था कि भारत की वैश्विक राजनीति में अहमियत और सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को देखते हुए उसे आमंत्रित किया गया है।

इस सम्मेलन से ही इस्लामिक देशों के बीच भारत की बदली हुई स्थिति का पता लगा। 57 मुस्लिम देश इसके सदस्य हैं। इसके सदस्यों के अलावा कुछ देशों और संगठनों को इसके पर्यवेक्षक का दर्जा भी दिया जाता है। बांग्लादेश की ओर से भारत को इसका पर्यवेक्षक बनाने की मांग की जा चुकी है लेकिन अब तक इस पर आगे कोई प्रगति नहीं हुई है। इसके पीछे बुनियादी कारण पाकिस्तान है।

इस सम्मेलन में सुषमा स्वराज का आतंक के खिलाफ मुखर होना और पाकिस्तान का इसमें शामिल नहीं होना भारत की विदेश नीति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण था। ओआईसी पाकिस्तान के लिए एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म रहा है जहां वह अपनी मनमानी करता रहा है। उसने इस मंच का जम कर दुरुपयोग किया है। कश्मीर, बाबरी मस्जिद और मुसलमानों के कथित मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों के साथ पाकिस्तान की भाषा भी भारत के लिए बर्दाश्त से बाहर होती चली गई। भारत पहले तो अपनी आपत्ति जताता था, किन्तु 2001 के बाद से भारत ने प्रतिक्रिया देना ही बंद कर दिया। उसी साल से पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय मंच पर पर्दाफाश होना भी शुरू हुआ।

मोदी का सम्मान

भारतीय राजनय में हाल में ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ का काफी जिक्र होता है, यानी सुदूर पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ हमारे रिश्ते सुधरे हैं। देश की ‘लुक वेस्ट पॉलिसी’ पर कम ध्यान गया है, जबकि देश ने इस्लामी देशों के साथ रिश्तों में काफी सुधार किया है। बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग इन देशों में काम करते हैं। विदेश में वे ही हमारे सच्चे प्रतिनिधि हैं। सन 2004 के बाद से केंद्र सरकार ने इन भारतवंशियों के महत्व को देखते हुए विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया है। एक अनुमान है कि खाड़ी देशों में सन 2018 में 85 लाख भारतीय काम कर रहे थे।

सन 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने इन देशों के साथ रिश्तें बेहतर बनाने के प्रयास किए हैं। इसमें संतुलन भी बना कर रखा गया है। हमारे रिश्ते जहां इजरायल के साथ अच्छे हैं, तो फलस्तीनियों के साथ भी अच्छे हैं। सऊदी अरब और ईरान दोनों के बीच संतुलन कायम है। अभी हाल में अगस्त के महीने में नरेंद्र मोदी को बहरीन में बहरीन के बादशाह के साथ मुलाकात के दौरान ‘किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रिनैसां’सम्मान से अलंकृत किया गया।

मोदी ने यह सम्मान मिलने के बाद कहा, यह पूरे भारत के लिए सम्मान की बात है। वस्तुतः यह उस बदलाव का प्रतीक है, जो मुस्लिम देशों के साथ भारत के रिश्तों में आ रहा है। इतना ही नहीं, यूएई की यात्रा के दौरान उन्हें ’ऑर्डर ऑफ ज़ायेद’ भी प्रदान किया गया था। इसके ठीक पहले यूएई के शहज़ादे शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाह्यान ने उन्हें अपने देश के इस सम्मान से अलंकृत किया था। हाल में इस्लामिक देशों से उन्हें प्राप्त सम्मानों की सूची बनाएं तो बात और स्पष्ट होती है। ये सम्मान हैं:-

1.बहरीन-किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रिनैसां, 2. यूएई-’ऑर्डर ऑफ ज़ायेद, 3.फलस्तीन का ‘ग्रैंड कॉलर’ सम्मान, 4. अमीर अमानुल्ला खां सम्मान-अफगानिस्तान, 5. किंग अब्दुल अजीज सैश सम्मान-सऊदी अरब, 6.निशान इज्जुद्दीन-मालदीव।

 

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