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अनुच्छेद 370 व 35ए की समाप्ति के बाद भारतीय जम्मू-कश्मीर व लद्दाख तो देश की मुख्य धारा में आ गए; लेकिन पाकिस्तान व चीन के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के हिस्सों याने पीओके व सीओके का क्या होगा? क्या भारत भूमि के इन हिस्सों को हम भूल चुके हैं?

अनुच्छेद 370 व 35ए हट गए। जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा भर भारत की मुख्य धारा में शामिल हो गया। यह लगभग आधा हिस्सा ही है। शेष लगभग उतने ही हिस्से पर पाकिस्तान व चीन ने जबरन कब्जा कर रखा है। उसे पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (Pakistan-Occupied Kashmir) याने पीओके और चीन के कब्जे वाला कश्मीर (China-Occupied Kashmir) याने सीओके कहते हैं। यह इलाका कौनसा है? उसमें समय के साथ हुए उतार-चढ़ाव क्या हैं? वह कब हमारा होगा? ये प्रश्न अब भारत में चर्चा के विषय हैं।

पीओके और सीओके की याद 70 साल बाद फिर जाग गई है। विस्मृति का यह दर्द भारत में भी है और पीओके व सीओके में भी। पीओके के एक बड़े नेता डॉ. सेंजे सेरिंग ने सच कहा था, “We are the forgotten people of forgotton lands of Bharat.”  याने भारत भूमि हमें भूल चुकी है। देश हमारे दर्द को जानता ही नहीं है। वे एक सेमिनार के लिए चेन्नई आए थे। लोगों ने उनसे पूछा कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं? उनका जवाब था, “60 साल बाद तो आपने हमें बुलाया है, वह भी अमेरिकी टूरिस्ट वीजा पर और अब हमसे यह सवाल पूछ रहे हैं?”

उनका दर्द समझा जा सकता है। लगभग 60 साल भारत ने याने कांग्रेस शासकों ने पीओके पर चुप्पी साध रखी थी। केवल अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय पहली बार पीओके का मुद्दा उठा। अगले दस साल फिर मौन रहा। मोदी सरकार आने के बाद फिर यह मुद्दा उभरा। याने हम लोग तो इन इलाकों को भूल ही चुके थे। लोगों से पूछें कि यह पीओके-सीओके क्या है तो बहुत कम लोग इसे बता पाएंगे। पाकिस्तान के साथ भारत के पांच युद्ध हुए यह तो सभी जानते हैं, लेकिन ये सभी युद्ध जम्मू-कश्मीर को लेकर और वहां की भूमि पर ही लड़े गए यह बहुत कम लोगों को स्मरण है। जम्मू-कश्मीर की भारत से लगी सीमा लगभग 2800 किमी है और उसमें से 2400 किमी नियंत्रण रेखा है, याने 1949 में युद्ध-विराम के बाद भारत-पाकिस्तान की सेनाएं जहां रुक गईं वह अस्थायी सीमा।

पीओके और सीओके की पृष्ठभूमि पर गौर करने के पूर्व यह जान लें कि इस भूभाग पर कब्जा करने के लिए विश्व की महाशक्तियां इतनी बेताब क्यों हैं? इसका कारण है, पीओके के गिलगित-बाल्टिस्तान का सामरिक महत्व। हिंदकुश पर्वत के इस इलाके से पांच देशों की सीमाएं मिलती हैं- अफगानिस्तान, तजाकिस्तान (जो कभी सोवियत संघ का हिस्सा था), पाकिस्तान, तिब्बत (चीन) और भारत। उत्तर की ओर जाने वाले सारे सड़क मार्ग गिलगित से ही जाते हैं। भारत पर विदेशियों के जितने भी आक्रमण हुए वे सब इसी रास्ते से हुए हैं। शक, हूण, कुशाण, मुगल सभी इसी रास्ते से भारत आए। वहां से मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। प्राचीन काल में व्यापार का यही मार्ग था। इसी कारण किसी समय ब्रिटेन, अमेरिका, रूस वहां अपने फौजी अड़े बनाने को उत्सुक थे। 1965 में तो पाकिस्तान गिलगित को रूस को देने के लिए तैयार हो गया था। इसके पूर्व 1963 में उसने शकसान इलाके की लगभग 1900 किमी भूमि चीन को दे डाली है। 1962 के युद्ध में चीन ने लद्दाख के अक्साई चिन नामक 37 हजार किमी के इलाके पर जबरन कब्जा कर लिया। इस तरह कुल कोई 56,000 किमी की भूमि चीन के कब्जे में है। यही सीओके है। चीन को पाकिस्तान से मिली भूमि और चीन के कब्जे वाली भूमि अक्साई चिन के बीच सियाचिन ग्लेशियर है। सियाचिन पर अभी भारत का कब्जा है। सियाचिन तो भारत में हमेशा चर्चा का विषय रहा है, लेकिन पीओके व सीओके नहीं।

जम्मू-कश्मीर की पृष्ठभूमि रक्तरंजित है। हिंदुस्तान का ब्रिटिशों ने भारत-पाकिस्तान के रूप में दो देशों में विभाजन कर दिया। इस समय ब्रिटिशों ने हिंदुस्तान की मांडलिक रियासतों को भी मुक्त कर दिया। वे भारत या पाकिस्तान में विलय होने अथवा स्वतंत्र रहने के लिए मुक्त थीं। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर में देरी करने और आंतरिक बगावत के कारण पाकिस्तान को मौका मिल गया। उसने कबाइलियों के नाम पर जम्मू-कश्मीर में अपनी फौज भेज दी और बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया।

22 अक्टूबर 1947 को कबाइलियों ने हमला शुरू किया। 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय पर महाराजा हरि सिंह ने हस्ताक्षर किए। अब जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न व वैधानिक अंग बन गया। भारतीय फौज ने मुकाबला शुरू किया। यह युद्ध 5 जनवरी 1949 तक याने कोई 1 वर्ष 2 माह तक चला और अंत में राष्ट्रसंघ के हस्तक्षेप से युद्ध विराम हो गया। नेहरू ही इस मसले को राष्ट्रसंघ में ले गए। युद्ध विराम की शर्तें थीं- पाकिस्तान और भारत अपनी फौजें 21 अक्टूबर की पूर्व स्थिति तक हटा लें। राष्ट्रसंघ की निगरानी में जनमत संग्रह हो। लेकिन पाकिस्तान फौज हटाने को तैयार नहीं हुआ। इसलिए जनमत संग्रह बेमानी हो गया।

कश्मीर समस्या की जड़ में अंग्रेजों की कूटनीति भी है। विभाजन के साथ रियासतें मुक्त हुईं। जम्मू-कश्मीर रियासत में पांच प्रांत थे- जम्मू, कश्मीर घाटी, लद्दाख, गिलगित वज़ारत और गिलगित एजेंसी। 1935 में महाराजा से 60 साल के लिए पट्टे पर लिया गया गिलगित एजेंसी का क्षेत्र ब्रिटिशों ने उन्हें वापस कर दिया। उस समय  गिलगित वज़ारत में भी अंग्रेज अधिकारी तैनात था। दोनों क्षेत्रों की सुरक्षा का जिम्मा गिलगित स्काउट का था। बंटवारे के समय सुरक्षा व्यवस्था अंग्रेजों के हाथ में ही थी। ब्रिटिश प्रशासक मेजर विलियम ब्राउन तब गिलगित व गिलगित वज़ारत का प्रभारी था। उसे महाराजा के  निर्देशों के अनुसार काम करना था, लेकिन वह सुभेदार मेजर बब्बर खान नामक एक प्रभावशाली मुस्लिम सरदार के बहकावे में आ गया। ब्राउन महाराजा के बजाय कराची स्थित अपने ब्रिटिश अधिकारी से निर्देश लेता था। उधर, महाराजा के गिलगित- बाल्टिस्तान के एक स्थानीय कमांडर कर्नल मिर्ज़ा हसन खान ने बगावत कर दी। गिलगित में बागियों ने महाराजा के राज्यपाल और जो थोड़ी सी फौज थी उसका कत्लेआम कर दिया। उन्होंने ब्राउन के जरिए कराची संदेश भेज दिया कि उन्होंने इलाके को जीत लिया है और उसका पाकिस्तान में विलय कर दिया है। यह सब इकतरफा था। इसीको पाकिस्तान कराची संधि कहता है, जबकि लिखित में ऐसा कोई करार हुआ ही नहीं है। यह तो ब्राउन, बब्बर खान व पाकिस्तान की साजिश थी। इसके तोहफे के रूप में बाद में पाकिस्तान ने बब्बर खान को मंत्री पद भी बहाल किया था।

इस तरह ब्रिटिशों की धोखाधड़ी से गिलगित वज़ारत और गिलगित एजेंसी, जो गिलगित-बाल्टिस्तान के नाम से अधिक जाना जाता है, पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। उसी समय कश्मीर घाटी के कुछ इलाके पर भी पाकिस्तानी काबिज हो गए। 1970 तक यह पूरा इलाका पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (Pakistan-Occupied Kashmir) याने पीओके के रूप में एक इकाई बना रहा है। 1971 के युद्ध में पराजय के बाद पाकिस्तान ने पीओके को दो हिस्सों में बांट दिया-उत्तरी क्षेत्र को गिलगित-बाल्टिस्तान और पश्चिमी क्षेत्र का ‘आजाद कश्मीर’ नाम दिया। इसके पूर्व ही गिलगित-बाल्टिस्तान का शकसान इलाका 1963 में पाकिस्तान ने चीन को दे दिया था। चीन ने 1962 में हुए युद्ध में अक्साई चिन इलाके पर कब्जा कर लिया था। इस तरह जम्मू-कश्मीर रियासत के पाकिस्तान और चीन ने पांच टुकड़े करवा दिए। दो बड़े टुकड़े गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में हैं। दो छोटे टुकड़े शकसान और अक्साई चिन चीन के कब्जे में है। पांचवां टुकड़ा भारत के पास है।

इतिहास की पृष्ठभूमि संक्षेप में इसलिए रखी कि कश्मीर समस्या की गुत्थी समझी जा सके। अब पीओके और सीओके की संवैधानिक स्थिति को जानते हैं। पहले सीओके याने चीन के कब्जे वाले क्षेत्र के बारे में। चीन और भारत के बीच सीमाएं कभी ठीक से स्थापित नहीं हुईं। दुर्गम इलाका होने से वैसी कोई जरूरत भी महसूस नहीं की गई। ब्रिटिशों ने सीमा तय करने के लिए मैकमोहन की नियुक्ति की। चीन के सम्राट ने भी अपने विशेषज्ञ दिए। लेकिन बाद में चीनी मुकर गए। अकेले मैकमोहन ने ही यह काम पूरा किया और सीमा निश्चित की। इसे ही मैकमोहन रेखा कहते हैं। चीन ने इस सीमा को कभी स्वीकार नहीं किया। इसी कारण अक्साई चिन इलाके को वह अपना होने का दावा करता है। लेकिन यह इलाका चीन का होने के कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। यह हमेशा जम्मू-कश्मीर रियासत का ही हिस्सा रहा है। शकसान इलाका तो पाकिस्तान ने उसे दे दिया। जो प्रदेश पाकिस्तान का कभी था ही नहीं, उसे पाकिस्तान और किसी को कैसे दे सकता है? इसलिए चीन के कब्जेवाले हिस्से की कोई वैधानिक या संवैधानिक मान्यता हो ही नहीं सकती और है भी नहीं। फिर भी दोनों इलाकों को चीन ने अपने प्रांत शिंजियांग में मिला दिया है। शिंजियांग उईगर मुस्लिम बहुल इलाका है और चीन का उन पर लगातार दमन चक्र चलता रहा है।

अब पीओके की संवैधानिक स्थिति पर आते हैं। वहां दो तरह की व्यवस्था है। कथित आजाद कश्मीर का स्वतंत्र संविधान है, जबकि गिलगित-बाल्टिस्तान का ऐसा कोई संविधान नहीं है। पाकिस्तान का संविधान भी दोनों को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता। इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर और भारत के संविधान पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं। पीओके को पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 248 के तहत प्रशासित किया जाता है। इस तरह वहां संविधान ही संविधान और झण्डे ही झण्डे हैं। तीन-तीन प्रधानमंत्री हैं- पाकिस्तान का प्रधानमंत्री, आजाद कश्मीर का प्रधानमंत्री और गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रधानमंत्री। तीन-तीन राष्ट्रपति हैं- पाकिस्तान का राष्ट्रपति, आजाद कश्मीर का राष्ट्रपति, गिलगित-बाल्टिस्तान का राष्ट्रपति। तीन-तीन विधायिकाएं, तीन-तीन सर्वोच्च न्यायालय, तीन-तीन उच्च न्यायालय और तीन-तीन झण्डे हैं।

हिमालय की 10 बड़ी चोटियों में से 8 गिलगित-बाल्टिस्तान में हैं। तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान के पानी के सारे वैकल्पिक स्रोत उनके कब्जे में हैं। यूरेनियम व सोने की कोई 50 से 100 खानें हैं। पीओके के खनिज विभाग की रिपोर्ट खुद इस तथ्य को बयान करती है। यदि यह इलाका हमारे पास होता तो ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के लिए पाकिस्तान के आगे हमें नहीं गिड़गिड़ाना पड़ता। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान विरोधी हैं

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 व 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर को जिस तरह विशेष दर्जा प्राप्त था, वैसी कोई सुविधा पाकिस्तान के संविधान के अंतर्गत आजाद कश्मीर या गिलगित-बाल्टिस्तान को उपलब्ध नहीं है। पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 248 के तहत पाकिस्तान का राष्ट्रपति ही
सर्वोच्च अधिकारी हैं और उसके आदेश से वहां कोई भी बदलाव किया जा सकता है। प्रदेश की विधायिकाओं की भी अनुमति की जरूरत नहीं है। इसीका लाभ उठाते हुए 2009 व 2018 में बदलाव किए गए। इसके तहत 1984 का ‘राज्य विषय नियम’ (State Subject Rule 1984) संशोधित किया गया। इससे रियासत का विशेष रियायतों का पुराना आदेश रद्द हो गया। स्थानीय लोगों के कुछ विशेष अधिकार छीन लिए गए। अब कोई भी पाकिस्तानी पीओके में जाकर बस सकता है, सम्पत्ति खरीद सकता है, व्यवसाय कर सकता है। यह शिया बहुल इलाका था। शिया पाकिस्तान के विरोधी हैं। उनसे निपटने के लिए यह बदलाव किया गया। अब सुन्नी वहां जाकर बस गए हैं और शिया अल्पसंख्यक हो गए हैं। पीओके में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शनों का मुख्य कारण यही है। इन प्रदेशों को पाकिस्तान के प्रांत बनाने की दिशा में इसे एक कदम माना जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए भी कुछ इसी तरह के लग सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान के अनुच्छेद 248 और भारत के 370 व 35ए में बुनियादी अंतर है। पीओके पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, जबकि जम्मू-कश्मीर भारत का वैधानिक हिस्सा है। इसलिए पीओके की रियासती व्यवस्था को बदलने का पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है, जबकि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होने से किसी भी बदलाव का उसे अधिकार है। पाकिस्तान के अनुच्छेद 248 का मकसद पीओके में अपनी पैठ जमाना और उसे पाकिस्तानी प्रदेश बनाने का है, जबकि अनुच्छेद 370 व 35ए का मकसद भारतीय प्रदेश जम्मू-कश्मीर को विशेष रियायत देने का था और उसे खत्म कर अब पूरा प्रदेश मुख्य धारा में लाया गया है।

गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाका 72,496 वर्ग किमी है। इसमें 10 जिले हैं- घोंचे, स्कर्दू, शिंगर, खरमंग, गिज़र, गिलगित, हुंज़ा, नगर, अस्तोरे और दियामर। पहले पाकिस्तान ने इसे केंद्रशासित उत्तरी इलाका (Federally Administered Northern Areas संक्षेप ‘| FANA) नाम दिया था, लेकिन बाद में फिर इसे गिलगित-बाल्टिस्तान का पुराना नाम बहाल कर दिया। यह मूलतया लद्दाख का हिस्सा था। 2009 तक सारा काम सीमांत अपराध नियम (Frontier Crime Regulation याने FCR) और संघीय सरकार के आदेशों के तहत चलता रहा। 2009 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान सशक्तिकरण एवं स्व-शासन आदेश जारी कर उसे प्रांत का दर्जा दे दिया। इसके तहत गिलगित-बाल्टिस्तान विधान सभा और गिलगित-बाल्टिस्तान परिषद गठित की गई। 2018 में फिर इसे संशोधित कर गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश जारी किया गया। इससे 2009 के आदेश से जो कुछ सीमित सुविधा मिली थी वह भी छीन ली गईं। यह इमरान खान के जमाने की बात है। (लगता है इमरान खान की सत्ता कुछ ही दिनों की मेहमान है। सेना प्रमुख बाजवा के हाथ में ही असली सत्ता है। इसे इमरान के खिलाफ फौज की ‘सॉफ्ट कूप’ याने सहज क्रांति नाम दिया जा रहा है।) सारे राजनीतिक व न्यायिक अधिकार पाकिस्तान के कश्मीर मामलों के मंत्रालय (Ministry of Kashmir Affairs and Northern Areas संक्षेप ‘| KANA) के पास हैं। आजाद कश्मीर जैसा इस प्रदेश का कोई स्वतंत्र संविधान नहीं है। वह पाकिस्तान का उपनिनिवेश बन कर रह गया है। बुनियादी अधिकार तो है ही नहीं। यह इलाका शिया मुस्लिमों का है। आजाद कश्मीर सुन्नी बहुल हैं। पाकिस्तान भर में सुन्नी बहुमत में हैं। शिया और सुन्नियों में कभी नहीं बनती। वे क्योंकर गिलगित-बाल्टिस्तान के शियाओं को अधिकार देंगे?

हिमालय की 10 बड़ी चोटियों में से 8 गिलगित-बाल्टिस्तान में हैं। तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान के पानी के सारे वैकल्पिक स्रोत उनके कब्जे में हैं। यूरेनियम व सोने की कोई 50 से 100 खानें हैं। पीओके के खनिज विभाग की रिपोर्ट खुद इस तथ्य को बयान करती है। यदि यह इलाका हमारे पास होता तो ईरान-भारत गैस पाइपलाइन के लिए पाकिस्तान के आगे हमें नहीं गिड़गिड़ाना पड़ता। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान विरोधी हैं इसे पहले ही बयान कर चुका हूं।

गिलगित-बाल्टिस्तान में जो खेल खेला गया उसके पीछे चीन है। चीन उसका शकसान इलाका चाहता था और जब तक वह इलाका पाकिस्तान अपना प्रांत घोषित नहीं करता तब तक चीन इस क्षेत्र को उससे नहीं ले सकता था। इसलिए चीन ने 2009 में पाकिस्तान से आदेश जारी करवाकर उसे प्रांत बनवा दिया और फिर पाकिस्तान से मांग लिया। चीन इस क्षेत्र में काराकोरम सड़क बना चुका है, जो पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ेगी। इसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक मार्गिका (CPEC) कहा जाता है। इस परियोजना का बलूचिस्तान में भी भारी विरोध हो रहा है। चीन वहां एक विशाल बिजली परियोजना भी लगा रहा है। सिंधु नदी का प्रचुर जल और काराकोरम पर्वत शृंखलाएं चीन के लिए लाभप्रद हैं। लोग इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। लेकिन उन्हें सेना के बल पर कुचल दिया जाता है। चीन के भी कोई 24 हजार सैनिक वहां तैनात हैं। इन परियोजनाओं के कारण चीन का पाकिस्तान पर भारी कर्ज चढ़ गया है। यह कर्ज उस पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज से भी कई गुना अधिक है। जाहिर है कि वह चीन के कर्ज-जाल में पूरी तरह फंस चुका है। इसलिए उसका दीवाला पिटने ही वाला है।

आजाद कश्मीर कहा जाने वाला इलाका 13,297 वर्ग किमी है। इसमें आठ जिले हैं- मीरपुर, भीमबर, कोटली, मुजफ्फराबाद, बाघ, नीलम, रावलकोट और सुढ़ानोती। मुजफ्फराबाद राजधानी है। यह मूलतया जम्मू प्रांत का हिस्सा था। इसमें 97% आबादी सुन्नी मुस्लिमों की है। शेष कश्मीरी पंडित याने हिंदू हैं। कुछेक ईसाई और अन्य भी हैं। उनमें से भी अधिकांश अब यत्र-तत्र जाकर बस गए हैं। वहां हिंदू आबादी अब नहीं के बराबर है। हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों की सम्पत्ति मुस्लिमों ने हड़प ली है। सुन्नी मुस्लिम कट्टरपंथी हैं। वे पंजाबी मुस्लिम हैं। कश्मीरी मुस्लिम नीलम घाटी व लीपा घाटी में ही रह गए हैं। विषय के विस्तार के भय से केवल इतना ही कह सकते हैं कि पाकिस्तान जिन कश्मीरियों के नाम की माला जपता है, वे कश्मीरी उसके ‘आजाद कश्मीर’ में हैं ही कितने? बाकी कौमों ने ही वहां धावा बोल दिया है। सुन्नी हमेशा हिंदुओं के विरोधी रहे हैं। राइट्स वॉच नामक एक अमेरिकी मानवाधिकार संगठन के एशिया निदेशक ब्राड एडम्स का कहना है कि, “प्रदेश के नाम में भले ही हो आजाद शब्द हो, लेकिन वास्तव में वह आजाद है नहीं। पाकिस्तान का उस पर बेहद कड़ा नियंत्रण है। वहां के लोग मूलभूत अधिकारों से भी वंचित हैं।”

भारत के इन अभिन्न अंगों पर यह सरसरी नज़र है। इस संक्षिप्त लेख में कुछ ही खास मुद्दों का जिक्र हो सकता था। यह पूरा विषय, उसका इतिहास, भूगोल, संस्कृति, सामरिकता, महाशक्तियों के खेल, चीन-भारत-पाकिस्तान की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा तैयारियां, बलूचों व सिंधियों के पाकिस्तान से आजादी के आंदोलन आदि बहुत बड़े व विस्तृत मुद्दे हैं। इस पर भारत में तथ्यपरक अध्ययन होना चाहिए और वह लोगों तक पहुंचना चाहिए; ताकि हमारी ही यह भूमि फिर से विस्मृति में न चली जाए।

यह पीओके और सीओके के बारे में प्राथमिक जानकारी है। इस तरह पीओके व सीओके क्या है इसका उत्तर तो मिल गया, लेकिन अपना ही यह इलाका हमें कब प्राप्त होगा इसका उत्तर मेरे पास नहीं है, वह तो समय ही दे सकता है। लेकिन देरसबेर वह भारत से जुड़ना ही है इतना तो मैं अवश्य कह सकता हूूं। अगला लक्ष्य तो यही है न्?

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