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विपक्ष में नेता या कार्यक्रम को लेकर कोई आपसी सहमति नहीं है। उनका एकमात्र सूत्र एक व्यक्ति- प्रधानमंत्री मोदी- से छुटकारा पाने का है। विपक्षी दलों का इतना कमजोर पड़ जाना लोकतंत्र के हित में नहीं है।

एक मजबूत लोकतंत्र के लिए जहां एक स्थायी सरकार जरूरी होती है, वहीं एक मजबूत और विश्वसनीय विपक्ष भी जरूरी होता है। लेकिन संसद के दोनों सदनों में सत्तापक्ष की बढ़ती ताकत से विधायी कामकाज में विपक्ष की आवाज लगातार कमजोर होती जा रही है। बहुमत और विधायी प्रबंधन के दम पर सरकार विधेयक पास करा रही है। विधेयकों को विचार के लिए संसदीय समितियों के पास भेजने की परंपरा लगभग खत्म होती जा रही है। इस बीच संसद की स्थायी समितियों के नए स्वरूप ने विपक्षी नेताओं की चिंता और बढ़ा दी है। इस बार कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस खासतौर से सरकार के निशाने पर रहे हैं।

इस बार कांग्रेस से दो अहम समितियों की अध्यक्षता ले ली गई है। पिछली बार संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के वीरप्पा मोइली थे और विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष शशि थरूर थे। इस बार इन दोनों मंत्रालयों की अध्यक्षता भाजपा ने खुद अपने पास रख ली है। वित्त मामलों की समिति की अध्यक्षता पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा को दी गई है और विदेश मामलों की समिति का जिम्मा पी पी चौधरी को। जब से संसदीय समितियां बनती हैं और विभागों के कामकाज की समीक्षा करती हैं तब से ऐसा पहली बार हुआ है कि वित्त और विदेश मामलों की स्थायी समिति का अध्यक्ष कोई विपक्ष का नेता नहीं होगा। अब इन दोनों अहम विभागों के कामकाज को लेकर जाहिर तौर पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए जाएंगे। कांग्रेस को विज्ञान व प्रौद्योगिकी, वन व पर्यावरण और सूचना प्रसारण जैसे मंत्रालयों का जिम्मा दिया गया है। राज्यसभा से जुड़ी गृह मामलों की समिति की अध्यक्षता जरूर कांग्रेस को मिली है पर वहां भी बहुमत सत्तापक्ष का ही होगा।

सबसे बड़ा झटका ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को लगा है जिसे इस बार सिर्फ एक कमेटी की अध्यक्षता मिली है और वह भी पर्यटन और संस्कृति की। इससे पहले रेल मंत्रालय की स्थायी समिति की अध्यक्षता उसके पास थी। इस बार इस अहम समिति की अध्यक्षता का जिम्मा भी भाजपा ने अपने सांसद राधामोहन सिंह को दिया है। इस बार तृणमूल कांग्रेस को राज्यसभा से संबंधित एक भी समिति की अध्यक्षता नहीं मिली है, जबकि वह राज्यसभा में भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। इसमें संदेह नहीं कि इससे विधायी कामकाज में विपक्ष की आवाज कमजोर होगी और सत्ता पक्ष की मनमानी बढ़ने की आशंका रहेगी।

वैसे सत्रहवीं लोकसभा के पहले दिन शपथ ग्रहण करने से पूर्व मीडिया से मुखातिब होते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के मजबूत होने की बात पर बल दे चुके हैं। उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में विपक्ष का सशक्त होना जरूरी है। उनका हर शब्द मूल्यवान है, वे लोकसभा में अपने नंबरों की चिंता छोड़ दें। उम्मीद है कि सभी दल सदन में उत्तम चर्चा करेंगे। इसके अतिरिक्त उन्होंने तर्क के साथ आलोचना को भी सकारात्मक नतीजों का कारण बताया। साथ ही उन्होंने आशा जताई कि इस लोकसभा में पिछली लोकसभा के मुकाबले में ज्यादा काम होगा। लेकिन हर गुजरते दिन आवाजें ऊंची होती जा रही हैं कि भारत में एक मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है। जबकि, ऐसा होता नजर आ नहीं रहा। भारत के स्वतंत्र इतिहास में अधिकतर ऐसा ही रहा है। विपक्षी पार्टियों को विकसित करने के स्थान पर, भारत की राजनीतिक प्रणाली दरअसल उन्हें नुकसान पहुंचाती है। सी. राजगोपालचारी और के एम मुंशी द्वारा 1959 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी का उदाहरण सामने है। दोनों व्यक्ति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गज और पं. जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल के दाहिने हाथ थे। राजगोपालचारी भारत के राष्ट्रपति पद के लिए नेहरू की पहली पसंद थे, और मुंशी संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी के प्रमुख लेफ्टिनेंट। उन्होंने कांग्रेस के बढ़ते राज्य नियंत्रणवाद का विकल्प उपलब्ध करवाने के लिए स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की। राजगोपालचारी ने कहा कि उनकी पार्टी “सरकार के बढ़ते अतिक्रमण के खिलाफ हर नागरिक की सुरक्षा के लिए” बनाई गई है। “यह भारतीय कांग्रेस पार्टी के तथाकथित समाजवाद की चुनौती का उत्तर है।” ऐसे मध्य-दक्षिणमार्गी दल की भारतीय राजनीति में अत्यधिक आवश्यकता थी।

स्वतंत्र पार्टी ने बेहतर चुनावी प्रदर्शन किया। अपने पहले आम चुनाव में ही यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, और कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी व जनसंघ से आगे रही। वर्ष 1967 तक इसके पास राष्ट्रीय तौर पर 9.6 प्रतिशत वोट और संसद में 44 सीटें थीं। परंतु 1974 तक यह पार्टी गायब हो चुकी थी। कई अन्य विपक्षी कोशिशों का हश्र भी ऐसा ही हुआ। जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया द्वारा बनाई गई सोशलिस्ट पार्टी केवल 20 वर्ष टिक पाई। आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर पार्टी दो साल के भीतर सोशलिस्ट पार्टी में विलीन हो गई। बी आर अंबेडकर द्वारा बनाई गई रिपब्लिकन पार्टी 1956 में उनके निधन के तुरंत बाद कई टुकड़ों में बिखर गई। भाजपा को भी एक मजबूत पार्टी बनने और सत्ता में आने में 60 वर्ष लग गए। इसके पूर्ववर्ती जनसंघ को 1977 के असफल जनता पार्टी गठबंधन का केवल एक हिस्सा बनने में ही तीन दशक लगे। यहां तक कि अपने नए अवतार में भी भाजपा वर्ष 1984 में संसद में मात्र दो सीटों तक सिमट कर रह गई थी। तब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी 415 सीटों के प्रचंड बहुमत से सत्तासीन हुए थे लेकिन संख्या बल में कमजोर होकर भी विपक्ष खामोश नहीं था, नेता भी दमदार थे। अटल-आडवाणी की अनुपस्थिति के बावजूद मधु दंडवते, सोमनाथ चटर्जी, इंद्रजीत गुप्त, जयपाल रेड्डी और उन्नीकृष्णन जैसे नेताओं ने बोफोर्स तोप घोटाले को उजागर किया, जो राजीव गांधी की सरकार को ले डूबा। दुर्भाग्य से आज विपक्ष के पास न तो ऐसे दमदार नेता दिख रहे, न ही उनमें एकजुटता है। कांग्रेस प्रभावी विपक्ष के रूप में अब तक नाकाम रही है। दूसरी ओर, वाम दलों का अस्तित्व भी धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर है। उनके केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे गढ़ धराशायी हो रहे। पिछले चुनावी नतीजों ने जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर परचम लहराने वाले सपा, बसपा, राजद, तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी, अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दलों को भी सबक सिखा दिया है।

दिवंगत पूर्व वित्तमंत्री और लोकप्रिय भाजपा नेता अरूण जेटली ने ‘डरे हुए भारतीय विपक्ष का परिदृश्य’ नामक ब्लॉग में सही ही लिखा था कि विपक्षी खेमा टूटा हुआ है। उन्होंने इस बात की ओर संकेत किया था कि विपक्ष में नेता या कार्यक्रम को लेकर कोई आपसी सहमति नहीं है। उनमें एकमात्र समानता एक व्यक्ति (प्रधानमंत्री मोदी) से छुटकारा पाने की है।

ऐसी विसंगतियों के बीच जरूरी है कि विपक्ष मजबूती से उठ खड़ा हो। विपक्षी दलों का इतना कमजोर पड़ जाना लोकतंत्र के हित में नहीं है। विपक्ष सरकार के कामकाज पर नजर रखने के अपने कर्तव्य का निर्वहन ईमानदारी से करे और सत्तारूढ़ पक्ष भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करे जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मानना है।

 

 

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