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अनुच्छेद 370, 35ए हटने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का सबसे ज्यादा जश्न यदि कहीं मनाया गया तो वह लद्दाख था। इस निर्णय के बाद लद्दाख के सांसद जे.एस. नामग्याल का संसद में दिया गया भाषण पूरे देश में यादगार बन गया। 70 वर्षों के बाद लद्दाखियों की आकांक्षाएं पूरी हुईं और केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पहली दीवाली लद्दाख मना रहा है।

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। लोकतंत्र के सर्वाच्च मंदिर भारतीय संसद में भारत और जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों के हित में एक बड़ा कदम सरकार ने उठाया। 70 दशकों से देश में चर्चा का प्रमुख विषय रहा अनुच्छेद 370 और 35ए अंततः भारतीय संसद द्वारा निरस्त किया गया। देश में लम्बे समय से इन प्रावधानों के विरुद्ध एक जनआकांक्षा अंततः पूर्ण हुई। इसके अतिरिक्त एक और निर्णय भारतीय संसद ने लिया जिसकी कल्पना शायद देश में किसी को नहीं थी। सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिए। जिसमें लद्दाख पूर्णतः केंद्र शासित राज्य बना और जम्मू-कश्मीर विधान सभा सहित दूसरा केंद्र शासित राज्य बना।

लगभग पूरे भारत ने इस निर्णय का हृदय से स्वागत किया। लेकिन इस निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव यदि कहीं पड़ा तो वह है स्वयं जम्मू-कश्मीर राज्य और वहां के लोगों पर। पूरे राज्य और वहां के लोगों पर पड़े प्रभाव के बजाए हम यहां केवल लद्दाख की बात करेंगे। 1947 में भारत का बंटवारा हुआ। उसके उपरांत जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने माउंटबेटन और ब्रिटिश शासन के दबाव के बावजूद राज्य का विलय भारत में किया। विलय उपरांत दिल्ली का अनंत समर्थन मिलने के कारण शेख अब्दुल्ला बिना महाराजा और जनता के समर्थन के राज्य के पहले प्रधानमंत्री बन गए। शेख अब्दुल्ला की स्वार्थवादी राजनीति के चलते जम्मू और लद्दाख स्वयं को ठगा महसूस करने लगे। देखते ही देखते शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से अपनी मित्रता के सहारे अत्याधिक शक्तियां हासिल कर राज्य पर अपना एकाधिकार और आधिपत्य स्थापित कर दिया।

जम्मू और लद्दाख से उठा हर राजनीतिक आंदोलन या तो मसल दिया गया या आगे नहीं बढ़ने दिया गया। शेख अब्दुल्ला के इस एकाधिकार के विरुद्ध जम्मू में प्रजा परिषद और लद्दाख में लद्दाख बौद्ध संघ ने आंदोलन लड़े। 1948 में ही लद्दाख बौद्ध संघ ने मांग रखी कि वह कश्मीर के साथ नहीं रहना चाहते अथवा उन्हें कश्मीर से अलग किया जाए और केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए। उसके बाद यह मांग 70 वर्षों तक लद्दाख से उठती रही। लद्दाख का मानना था कि वह बौद्ध बहुल क्षेत्र है, उनकी भाषाएं- भोटी और शीना कश्मीरी से बिलकुल अलग हैं, उनकी संस्कृति, पहचान, मान्यताएं कुछ भी कश्मीर से नहीं मिलतीं, अतः कश्मीर के साथ उनको रखने का कोई औचित्य नहीं है।

1947 में पाकिस्तान के आक्रमण के समय भी लद्दाख के संत कुशोक बकुला ने लद्दाख के युवाओं और बौद्ध भिक्षुओं को मठों से निकाल कर पाकिस्तान के हमले का सामना करने के लिए तैयार किया। उनके द्वारा बनाई गई युवा वाहिनी का नाम उन्होंने नुबरा गार्ड दिया। नुबरा गाई ने न सिर्फ लद्दाख के दुर्गम क्षेत्रों में भारतीय सेना का सहयोग किया, अपितु भारतीय सेना के आने तक अपने सीमित संसाधनों से पाकिस्तानी सेना का मुकाबला भी किया। उस समय भी उनके द्वारा यही मांग रखी गई कि हम भारत का अभिन्न अंग हैं और भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए सदैव तैयार रहेंगे। हमें बस केंद्र शासित राज्य बनाया जाए और कश्मीर के साथ न मिलाया जाए।

लद्दाख की जम्मू-कश्मीर राज्य में क्या स्थिति थी इसका अंदाजा हम इसीसे लगा सकते हैं कि लद्दाख राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद राज्य के नाम में ही उसका कहीं जिक्र नहीं था। राज्य के नाम से लद्दाख जिस तरह गायब था, उसी तरह राज्य और केंद्र सरकारों के जहन से भी वह गायब ही रहा। स्वतंत्रता के उपरांत सबसे ज्यादा धन और संसाधन यदि किसी राज्य को मिले होंगे तो वह जम्मू-कश्मीर ही था। इन संसाधनों का अधिकतम हिस्सा केवल कश्मीर संभाग तक ही रह जाता था और जम्मू वाले भी लड़-झगड़ कर कुछ ले लेते थे। लद्दाख को कुछ मिलना तो दूर, वहां तक किसी का ध्यान भी नहीं जाता था। लद्दाखियों का मानना था कि वह अब तक कश्मीरियों की गुलामी सह रहे हैं।

शेख अब्दुल्ला द्वारा चलाया गया लद्दाख और जम्मू को राजनीति से उपेक्षित रखने का दौर 70 वर्षें तक चलता रहा। कश्मीर के दो परिवार और चार नेताओं को छोड़ कर राज्य से कोई व्यक्ति न राजनीति में स्थापित हो पाया, न बड़ा नाम बन पाया। जम्मू फिर पंजाब और भारत के अन्य क्षेत्रों से आसानी से जुड़ा होने और रेल सेवा होने के कारण अपनी आवश्यकताएं पूरी करता रहा। परंतु लद्दाख को कश्मीर और कश्मीरी नेतृत्व ने ऐसे दबा रखा जैसे निजी संपत्ति हो। दिल्ली से दूर होने के कारण दिल्ली का ध्यान भी लद्दाख तक कम ही पहुंचता था। केंद्र से आए संसाधन तो दूर, लद्दाख में स्वयं विकास की बहुत संभावनाएं थीं, जिन्हें नजरअंदाज किया गया। लद्दाख में प्राकृतिक खेती, फलों और सब्जियों की खेती, भेड़ पालन और उससे संबंधित उत्पादन, सौर ऊर्जा उत्पादन, पयर्टन आदि क्षेत्रों में अपार संभावनाएं थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश किसी भी क्षेत्र में अग्रगण्य नहीं हो पाया। पूरे राज्य में केवल लद्दाख ही ऐसा क्षेत्र था जहां एक वर्ष पहले तक कोई विश्वविद्यालय नहीं था। उच्च शिक्षा के लिए लद्दाखी विद्यार्थियों को जम्मू, कश्मीर या भारत के अन्य क्षेत्रों में जाना पड़ता था।

इसके अतिरिक्त राज्य में कुछ माह पूर्व तक दो डिवीजन थी, जम्मू और कश्मीर। दुर्भाग्यवश जिस कश्मीर से लद्दाख 1948 से आजादी मांग रहा था, उसी कश्मीर डिवीजन का हिस्सा वह 70 वर्षों तक रहा। जिससे लद्दाख के लोगों को अपने विकास कार्यों और हर सुविधा के लिए कश्मीर के आगे हाथ फैलाने पड़ते थे और कश्मीरी नेतृत्व आदतन उन्हें उपेक्षित और अपने अधिकारों के अंदर ही दबा के रखता था। लद्दाख में कोई उद्योग नहीें था, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं, अच्छे शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय नहीं था।

5 अगस्त को लिए गए भारत सरकार के ऐतिहासिक निर्णय का भारत और जम्मू-कश्मीर राज्य को तो जो लाभ हुआ सो हुआ, परंतु सबसे अधिक लाभ जिस क्षेत्र को हुआ वह लद्दाख है। लद्दाख की 70 वर्षों की मांग पूरी हुई। अनुच्छेद 370, 35ए हटने और राज्य के पुनर्गठन का सबसे ज्यादा जश्न यदि कहीं मनाया गया तो वह लद्दाख था। इस निर्णय के बाद लद्दाख के सांसद जे.एस. नामग्याल का संसद में दिया गया भाषण पूरे देश में यादगार बन गया। पहली बार लद्दाख पूरी आजादी, जोश और हर्ष से संसद में बोल रहा था। जो भाव और खुशी लद्दाख के सांसद की संसद में थी, वही भाव पूरे लद्दाख का था। इस निर्णय के बाद पूरे लद्दाख में निरंतर कितने दिनों तक जश्न मनाया गया, इसका साक्षी टी.वी. के माध्यम से पूरा देश रहा। बिना संकोच और किसी घुटन के पूरा लद्दाख झूम रहा था। हर आयु, लिंग और मजहब के लोगों ने अंततः वह आजादी महसूस की, जिसकी मांग वह 70 वर्षों से कर रहे थे। लद्दाख अब अपने स्वर्णिम दौर की ओर आगे बढ़ेगा। 70 वर्षों से जो ख्वाब और आकांक्षाएं लद्दाख संजोए बैठा था, अंततः वह उस ओर अग्रसर होगा।

 

 

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