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लैंडर विक्रम की हार्ड लैडिंग की घटना भारत के चंद्र मिशन पर नाकामी की एक हल्की सी छाया अवश्य छोड़ती है, लेकिन अब तक के अंतरिक्ष अभियानों के बल पर भारत ने जो मुकाम हासिल किया है वह हमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई की अवश्य याद दिलाता है।

महत्वाकांक्षाओं को अक्सर आसमान से जोड़ा जाता है। सफलताओं के पथ चांदी के होते हैं और कामयाब लोगों के पराक्रम को सुनहरे अक्षरों में लिखा जाता है। हमारे देश के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियान चंद्रयान-2 को यूं देश के पहले मून मिशन (चंद्रयान-1) से आगे ले जाने की योजना थी और सोचा गया था कि इसका लैंडर ‘विक्रम’ चांद की सतह पर पहुंच कर रोवर- प्रज्ञान से चंद्र सतह की नई जानकारियां भारतीय स्पेस एजेंसी- इसरो को उपलब्ध कराएगा। हालांकि 7 सितंबर, 2019 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के सिम्पीलियस एन और मेनजनीस सी केटर्स (विशाल ग- ों) के बीच विक्रम की मनोवांछित लैंडिंग नहीं हो सकी और अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा के मुताबिक लैंडर विक्रम की लक्षित लैंडिंग स्थल से काफी दूरी पर हार्ड लैडिंग हुई। यह घटना भारत के चंद्र मिशन पर नाकामी की एक हल्की सी छाया अवश्य छोड़ती है, लेकिन अब तक के अंतरिक्ष अभियानों के बल पर भारत ने जो मुकाम हासिल किया है वह हमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई की याद दिलाता है।

यूं डॉ. विक्रम साराभाई की इस मौके पर याद आना अस्वाभाविक भी नहीं है। खास तौर से चंद्र अभियान से उनका जुड़ाव इससे साबित होता है कि वर्ष 1974 में सिडनी स्थित अंतरराष्ट्रीय खगोल संघ ने वर्ष 1974 में चंद्रमा पर ‘सी ऑफ सेरनिटी’ पर स्थित बेसल नाम के मून क्रेटर को साराभाई क्रेटर नाम दिया था। इसी तरह अब इसरो ने भी चंद्रयान-2 के लैंडर का नाम विक्रम रख कर उन्हें याद किया। इधर 12 अगस्त 2019 को जब उनकी 100वीं जयंती आई, तो गूगल ने भी उन्हें एक डूडल बना कर याद किया।

कपड़े का व्यापार, नृत्य और घर से दिखता अंतरिक्ष

कहा जाता है कि किसी एक समग्र व्यक्तित्व का निर्माण उसके जीवन में होने वाली विविध घटनाओं के प्रभाव में होता है। बचपन से युवावस्था के दौरान संपर्क में आने वाले व्यक्तियों, घर के माहौल और शिक्षा-दीक्षा से मिलने वाली दिशा ही किसी व्यक्ति के आगे बढ़ने की दिशा और भविष्य तय करते हैं। इस नजरिए से देखें तो एक अमीर कपड़ा व्यापारी अंबालाल साराभाई के घर ‘द रिट्रीट’ 12 अगस्त, 1919 को जन्मे विक्रम साराभाई को सौभाग्यशाली कहा जाता है कि उन्हें आरंभ से काफी सकारात्मक माहौल मिला। बचपन में उनके घर तमाम क्षेत्रों से जुड़ी अहम हस्तियों का आना-जाना लगा रहता था। इसके अलावा उनकी माता सरला साराभाई द्वारा शुरू किए गए पारिवारिक मॉन्टेसरी स्कूल और फिर गुजरात कॉलेज से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा ने उन्हें विज्ञान में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। गुजरात कॉलेज से निकलने के बाद विक्रम साराभाई 1937 में कैम्ब्रिज (इंग्लैंड) चले गए। कैम्ब्रिज से उन्होंने 1939 में ‘नेशनल साइंस ऑफ ट्रिपोस’ की उपाधि हासिल की। उनके जीवन में एक अहम मोड़ तब आया, जब वे दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में भारत लौटे और बेंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में नौकरी करते हुए महान साइंटिस्ट चंद्रशेखर वेंकटरमण के निर्देशन में कॉस्मिक रेज़ (ब्रह्मांडीय किरणों) पर शोध करने लगे। इस बीच उनका पहला शोध पत्र टाइम डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ कास्मिक रेज़ भारतीय विज्ञान अकादमी की कार्यविवरणिका में प्रकाशित हुआ। इस दौरान कॉस्मिक किरणों पर उनके कार्य की चर्चा होने लगी और उनके शोध पत्र विश्वविख्यात शोध पत्रिकाओं में छपने लगे तो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने उन्हें डीएससी की उपाधि से सम्मानित किया। दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने पर विक्रम साराभाई कॉस्मिक रेज़ (भौतिक विज्ञान) के क्षेत्र में अपना शोधकार्य पूरा करने के लिए कैम्ब्रिज लौट गए। वर्ष 1947 में उष्णकटीबंधीय अक्षांक्ष (ट्रॉपीकल लैटीट्यूड्स) में कॉस्मिक रे पर अपने शोधग्रंथ के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में उन्हें डॉक्ट्ररेट की उपाधि से सम्मानित किया। इसके बाद वे भारत लौट आए और यहां आकर उन्होंने कॉस्मिक रे भौतिक विज्ञान पर अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा। भारत में उन्होंने अंतर-भूमंडलीय अंतरिक्ष, सौर-भूमध्यरेखीय संबंध और भू-चुम्बकत्व पर अध्ययन किया।

उनके घर, कपड़े और नृत्य के उल्लेख के बिना उनके जीवन और उपलब्धियों की यात्रा अधूरी कही जाएगी। चूंकि पिता मशहूर कपड़ा व्यापारी थे, लिहाजा डॉ. विक्रम साराभाई जब शिक्षा पूरी कर स्वदेश लौटे तो उन्होंने एक महत्वपूर्ण काम कपड़े के क्षेत्र में ही किया। उनकी रुचि और उनका शोध भौतिक विज्ञान में था, लेकिन उन्होंने कैम्ब्रिज से लौटते ही पहला काम अहमदाबाद वस्त्र उद्योग की अनुसंधान एसोसिएशन (एटीआईआरए) के गठन के रूप में किया। कपड़ा टेक्नोलॉजी का उनका कोई अनुभव या शिक्षा नहीं थी, लेकिन उनके द्वारा गठित एटीआईआर ने भारत में वस्त्र उद्योग के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कदम इसलिए क्रांतिकारी साबित हुआ, क्योंकि उस वक्त तक देश की ज्यादातर कपड़ा मिलों में कपड़े की गुणवत्ता नियंत्रण की कोई तकनीक नहीं थी। डॉ. विक्रम साराभाई का घर भी इसी तरह एक बेहद महत्वपूर्ण संगठन की आधारभूमि बना। असल में देश आजाद होने के बाद 1947 में जो फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी (पीआरएल) स्थापित की गई थी, उसकी शुरुआत खुद उन्हीं के घर से हुई थी। उस समय उनकी उम्र महज 28 साल थी। अहमदाबाद के शाहीबाग स्थित उनके घर के पास के एक कमरे को पीआरएल के दफ्तर में बदला गया जहां भारत के स्पेस प्रोग्राम पर काम शुरू हुआ। इसके बाद 1952 में उनके संरक्षक डॉ. सी वी रमण ने पीआरएल के नए कैंपस की बुनियाद रखी। उनकी कोशिशों का ही नतीजा रहा कि हमारे देश के पास आज इसरो (ISRO) जैसी विश्व स्तरीय संस्था है।

उनके जीवन में नृत्य का समावेश कुछ इस तरह हुआ कि 1942 में जिस विदुषी महिला मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ, वे अपने समय की प्रख्यात नृत्यांगना थीं। देश की आजादी से पहले संपन्न हुए इस विवाह की खास बात यह थी कि विक्रम के घर के सदस्य शादी के समारोहों में शामिल नहीं हो पाए क्योंकि उस दौरान वे सभी गांधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल थे। यहां तक कि उनकी बहन मृदुला साराभाई भी विवाह में शामिल नहीं हो सकीं। बहरहाल, कलाओं को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने पत्नी मृणालिनी के साथ मिल कर मंचन कलाओं की संस्था ‘दर्पण’ का गठन किया। उल्लेखनीय है कि उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भरतनाट्यम् और कुचीपुड़ी की मशहूर नृत्यांगना बनीं।

शुरू हुआ अंतरिक्ष का सफर

यूं कॉस्मिक किरणों पर किए गए शोध ने डॉ. विक्रम साराभाई को साइंस की दुनिया में काफी ख्याति दिला दी थी, लेकिन उनकी ज्यादा रुचि इसमें थी कि भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में कोई बड़ा मुकाम हासिल करे। वे चाहते थे कि भारत अपने उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। रूस ने जब 4 अक्टूबर, 1957 पर दुनिया के पहले मानव निर्मित कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया, तो डॉ. विक्रम साराभाई ने भारत सरकार को इसके लिए राजी कर लिया कि हमारा देश इसी तरह का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करेगा और उसमें आशातीत सफलताएं हासिल करेगा। तब भारत सरकार ने 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति या इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च (इनकॉस्पर)) का गठन कर दिया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका अध्यक्ष डॉ. विक्रम साराभाई को बनाया। यही इनकॉस्पर बाद में इसरो बना था। इसी वर्ष यानी 1962 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा और डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में केरल के तिरुवनंतपुरम के नजदीक थुम्बा में भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन (टर्लस) की स्थापना कर दी गई। यह रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र मुख्य रूप से भूमध्य रेखा के लिए अपनी निकटता के कारण अरब सागर के तट पर थुम्बा में स्थापित किया गया था। थुम्बा से रॉकेट की आरंभिक और प्रायोगिक उड़ान 21 नवंबर, 1963 को संपन्न कराई गई थी। लेकिन नवंबर, 1967 में थुम्बा से पहला भारत निर्मित रॉकेट – रोहिणी छोड़ा गया, जिसके परीक्षण के साथ ही अब भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नन्हा सा ही सही लेकिन अपना पहला कदम बढ़ा दिया था। डॉ. साराभाई ने भारतीय उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए जो परियोजनाएं शुरू कराईं, उनका ही सुफल था कि वर्ष 1975 में भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट रूस की मदद से अपनी कक्षा में पहुंचाया जा सका।

इस बीच, वर्ष 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अस्तित्व में आया और इसने तत्कालीन इन्कोस्पार का अधिग्रहण कर लिया, जिसके अध्यक्ष विक्रम साराभाई थे। खास बात यह है कि इसरो के अध्यक्ष के रूप में डॉ. विक्रम साराभाई ने सिर्फ एक रुपये का प्रतीकात्मक वेतन (टोकन सैलरी) लेना स्वीकार किया था। इसके बाद जून, 1972 में जब अंतरिक्ष विभाग की स्थापना हुई तो इसके चंद महीने बाद सितंबर 1972 में इसरो को अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत ले आया गया। इसमें संदेह नहीं कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना विक्रम साराभाई की महान उपलब्धियों में एक थी। ध्यान रहे कि इसरो और पीआरएल के अलावा उन्होंने कई संस्थानों की स्थापना की थी। डॉ. होमी जहांगीर भाभा के निधन के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद पर भी विक्रम साराभाई नियुक्त किए गए। हालांकि डॉ. भाभा के निधन की घटना काफी रहस्यमय मानी जाती है। दरअसल जनवरी, 1966 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की बैठक में भाग लेने विएना रवाना हुए थे और स्विटजरलैंड के ऊपर उनका हवाई जहाज क्रैश हो गया। इस हादसे में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक खो दिया था। इस दुर्घटना पर आज भी संदेह जताया जाता है। यह कहा जाता है कि कई विकसित देश भारत को परमाणु शक्ति संपन्न होते नहीं देखना चाहते थे और इस काम में बाधा पहुंचाने के लिए एक साजिश के तहत भाभा का हवाई जहाज क्रैश करवाया गया। ऐसे समय में सरकार और पूरे देश की विक्रम साराभाई से उम्मीदें और बढ़ गईं थीं। कम लोग जानते हैं पर एक सच यह भी है कि उन्होंने अहमदाबाद में स्थित अन्य उद्योगपतियों के साथ मिल कर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

जीवन में आए कलाम

डॉ. साराभाई ने विज्ञान में एपीजे अब्दुल कलाम जैसी हस्ती को आगे बढ़ाने का भी काम किया है। डॉ. कलाम के शुरुआती करियर में डॉ. विक्रम साराभाई का ही योगदान था, जिन्होंने उन्हें मिसाइल मैन बनने की प्रेरणा दी थी। एक जगह डॉ. कलाम ने स्वीकार किया था कि डॉ. विक्रम साराभाई ने उनका इंटरव्यू ही नहीं लिया था, बल्कि उनमें दिलचस्पी लेकर उन्हें आगे बढ़ने में मदद भी की थी। डॉ. कलाम के एक वक्तव्य के मुताबिक, ‘डॉ. विक्रम साराभाई ने मुझे इसलिए नहीं चुना था क्योंकि मैं काफी योग्य था बल्कि मैं काफी मेहनती था। उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए पूरी आजादी दी। उन्होंने न सिर्फ उस समय मुझे चुना जब मैं योग्यता के मामले में काफी नीचे था, बल्कि आगे बढ़ने और सफल होने में भी पूरी मदद की। अगर मैं नाकाम होता तो वे मेरे साथ खड़े होते।’

डॉक्टर विक्रम साराभाई परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष रहे। वर्ष 1966 में विमान दुर्घटना में डॉक्टर होमी जे. भाभा की मौत के बाद उन्होंने परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष का पद संभाला था और यह सुनिश्चित किया था कि परमाणु कार्यक्रमों का इस्तेमाल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो। टीवी प्रसारण में भी डॉ. साराभाई के योगदान को इसलिए याद रखा जाता है कि उन्होंने ही अहमदाबाद में एक प्रायोगिक उपग्रह के ज़रिए संचार माध्यम बनवाने में भूमिका निभाई थी जो आगे चलकर भारतीय गांवों के लिए एक शैक्षिक टेलीविज़न परियोजना की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई और इस तरह देश में सैटेलाइट टीवी के युग की शुरुआत हुई।

30 दिसंबर 1971 को केरल के थुम्बा स्थित रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने और एक रूसी रॉकेट का प्रक्षेपण देखने पहुंचे डॉ. विक्रम साराभाई महज 52 वर्ष की आयु में ही इस दुनिया अलविदा कहकर चले गए। सरकारी होटल में ठहरे डॉ. साराभाई अपनी मृत्यु के वक्त नींद थे, मानो किसी नए सफर का सपना देख रहे थे।

डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित जाने माने कुछ संस्थान हैं-

* भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद

* भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), अहमदाबाद

* कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद

* कला प्रदर्शन के लिए दर्पण अकादमी, अहमदाबाद (पत्नी के साथ)

* विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

* अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद (साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/ केन्द्रों के विलय के बाद यह संस्था अस्तित्व में आई)

* फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कलपक्कम

* परिवर्ती ऊर्जा साइक्लोट्रॉन परियोजना, कलकत्ता

* भारतीय इलेक्ट्रॉनकी निगम लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद

* भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल), जादुगुडा, बिहार

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों के महत्व पर डॉ. साराभाई का एक मशहूर बयान यह हैः

कुछ लोग प्रगतिशील देशों में अंतरिक्ष क्रियाकलाप की प्रासंगिकता के बारे में प्रश्नचिह्न लगाते हैं। हमें अपने लक्ष्य पर कोई संशय नहीं है। हम चन्द्र और उपग्रहों के अन्वेषण के क्षेत्र में विकसित देशों से होड़ का सपना नहीं देखते। किंतु राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अर्थपूर्ण भूमिका निभाने के लिए मानव समाज की कठिनाइयों के हल में अति-उन्नत तकनीक के प्रयोग में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते।

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