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छायावाद और प्रगतिवाद के कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल को प्रकृति के प्रति रागपरक रहस्य चेतना और गहन लगाव के कारण भारत का कीट्स भी कहा गया है। उनका जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के मालकोटी ग्राम में हुआ था। उनका यह शताब्दी वर्ष है। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके संपूर्ण साहित्य को नए सिरे से प्रकाशित करके उसका नया पाठ तैयार किया जाए।

चन्द्रकुंवर बर्त्वाल छायावाद और प्रगतिवाद के उल्लेखनीय कवि हैं। इनका जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के मालकोटी ग्राम में 20 अगस्त 1919 को हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुर भूपाल सिंह और माता का नाम जानकी देवी था। इनके व्यक्तित्व और छायावाद के शिखर कवि जयशंकर प्रसाद के व्यक्तित्व में अजीब समानता मिलती है। पहली समानता तो यह है कि दोनों ही खाते-पीते घर में पैदा हुए और दोनों ही अल्पायु में चल बसे। दोनों की ही मौत तपेदिक से हुई। दोनों ही इतिहास, संस्कृति और भारतीय पुरा ग्रंथों के गहन अध्येता थे। इन दोनों ने भारतीय राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक आधार देकर उसे व्यापक बनाया। दोनों ही हिमालय के विराट और अनंत रमणीय सौंदर्य पर एकांत मुग्ध थे तथा अपनी कविताओं में उसे मूर्तिविधायिनी कल्पना द्वारा साकार करते हैं। इन दोनों रचनाकारों ने साहित्य की लगभग हर महत्वपूर्ण विधा में अपनी लेखनी चलाई। उसे गुण और परिमाण दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध किया। दोनों ही रचनाकार प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति का गुणगान करते हुए आधुनिक सभ्यता की समीक्षा करते हैं। साथ ही, युगजीवन की चुनौतियों का चित्रण करते हुए प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।

दूसरी ओर यह भी चिंतनीय है कि उत्तराखंड की धरती ने छायावादी दौर में ही दो महत्वपूर्ण कृतिकार हिंदी जगत को दिए। एक कुमाऊं में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत तथा दूसरे गढ़वाल में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल एक साथ हिंदी साहित्य की समृद्धि में योगदान करते हैं। दोनों ही रचनाकार प्रकृति के अनूठे और बेजोड़ चित्र प्रस्तुत करते हैं। आज जब हम चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की जन्मशती मना रहे हैं तब यह जरूरी हो जाता है कि हम इस शताब्दी पुरुष रचनाकार के संपूर्ण साहित्य का नए सिरे से पुनर्पाठ तैयार करें। उसका सम्यक् मूल्यांकन करें। चन्द्रकुंवर जी के जीवन काल में उनकी कविताएं कर्मभूमि, विशाल भारत, क्षत्रियवीर, सरस्वती, आजकल, प्रतीक, नया प्रतीक, वसुंधरा, रूपांबरा, वाग्देवी तथा हिमाचल जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। इनके स्वर्गवास के बाद श्री शंभुप्रसाद बहुगुणा द्वारा इनकी रचनाएं प्रकाश में आईं। इन रचनाओं में यौवन के आंसू, कंकड़-पत्थर, सुन्दर-असुन्दर, प्रणयनी, पयस्विनी, जीतू, विराट ज्योति , नागिनी (कहानी संग्रह), नाट्यनंदिनी (प्रहसन), और माधवी का समावेश है। इनकी अधिकांश कविताएं पर्वतीय निर्झर की तरह सहज, गेय और विद्युत्धारा की तरह प्रवहमान हैं। बर्त्वालजी के काव्य का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य अपने आस-पास की स्थानीय प्रकृति तथा परिवेश की भरी-पूरी उपस्थिति है। वे अपने गांव, हिमालय के सीमाहीन फैलाव और पर्वतीय परिवेश को जिस अंतरंगता के साथ चित्रित करते हैं वह सहृदय पाठक के लिए रमणीय वस्तु है। वह अपने गांव पंवलिया के बारे में लिखते हैं कि-

कोलाहल से दूर शांत नीरव शैलों पर

मेरा गृह है जहां बच्चियों सी हंस-हंस कर

नाच-नाच बहती हैं

छोटी-छोटी नदियां जिन्हें देखकर।

प्रकृति के प्रति रागपरक रहस्य चेतना और गहन लगाव के कारण बर्त्वाल जी को भारत का कीट्स भी कहा गया है। यह भी दुर्लभ संयोग है कि वे भी कीट्स की तरह बहुत कम आयु में परलोक सिधार जाते हैं।

इसके अलावा चन्द्रकुंवर ने अपनी कविताओं में परित्यक्त सचाइयों पर दृष्टिपात करके उन्हें मनुष्य के समान गरिमा प्रदान की। इस दृष्टि से ’भोटिया कुत्ता, एक कुत्ता, कंकड़-पत्थर, सूने शिखर, जीतू , चूहा- बिल्ली  जैसी कविताएं विशेष रूप से उल्लेखनीय बन पड़ी हैं। यह भारतवर्ष की गतिशील लोकोन्मुख परंपरा को पुरस्कृत करने का अनूठा प्रयास है। लोकजीवन के प्रति यह आत्यंतिक लगाव बर्त्वालजी की निजी उपलब्धि है। चंद्रकुंवर जी केवल पर्वतीय एवं लोकजीवन के चित्रण तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखते अपितु स्वयं को जीवन और जगत के वृहत्तर संदर्भों से जोड़ कर अपने कवि-कर्म का विधिवत निर्वाह भी करते हैं। इनकी कविताएं देश-प्रेम संबंधी विचारों को व्याप्ति प्रदान करने के साथ-साथ उसे सांस्कृतिक व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। स्वाधीनता संग्राम के उन कठिन संघर्ष के दिनों में आपने यह विश्वास व्यक्त किया था कि वह दिन दूर नहीं जब हमारा देश आज़ाद होगा।इन्होंने लिखा था कि-

हृदयों में जागेगा प्रेम और

नयनों में चमक उठेगा सत्य

मिटेंगे झूठे सपने।

आप सामाजिक विसंगतियों के प्रभावी चित्रण के लिए जाने जाते हैं। चूंकि उस समय देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां चिंतनीय थीं अतः उसकी दुर्दशा के प्रति वे क्षोभ भी व्यक्त करते हैं। आप एक सामंजस्यशील कवि की तरह यथार्थ एवं आदर्श, कल्पना एवं वास्तविकता के बीच संतुलन बिठाते हैं। इनके व्यक्तिगत जीवन में पद-पद पर विपदाएं आईं, मुसीबतों ने कभी इनका साथ नहीं छोड़ा; बावजूद इसके इनकी अदम्य जिजीविषा तथा सांस्कृतिक बोध इनके आशावाद को बनाए रखता है। ये ’निद्रित शैल जगेंगे’ शीर्षक कविता में लिखते हैं कि –

अब  छाया में गुंजन होगा, वन में फूल खिलेंगे ,

दिशा-दिशा से अब सौरभ के धूमिल मेघ उठेंगे

अब रसाल की मंजरियों पर पिक के गीत झरेंगे

अब नवीन किसलय मारुत में मर्मर मधुर करगे।

कविवर बर्त्वाल महाकवि कालिदास को अपना प्रेरणास्रोत माना है। वे जीवन के हर संवेदनशील मौके पर उनका स्मरण करते हैं। इस संदर्भ में आप लिखते हैं कि-

ओ कालिदास !

यदि तुम मेरे साथ न होते

तो जाने क्या होता

तुमने आंखें दीं मुझको

मैं देखता था प्रकृति को

हृदय से प्रेम करता था उसे

पर मेरा सुख मेरे भीतर

कुम्हला जाता था ।

चंद्रकुंवर जी अपने समय के अंतरराष्ट्रीय मामलों पर सचेत थे। इनके द्वारा लिखी गई ’हिरोशिमा का शाप’ शीर्षक कविता इस दृष्टि से बहुत बार उद्धु्रत की जाती रही है।

एक सफल कवि के अलावा नाटककार, कहानीकार तथा डायरी लेखक के रूप में भी चंद्रकुंवर ने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इनका गद्यलेखन भी काव्यात्मक भाषा से अनुप्राणित है। इनकी अधिकांश कहानियां कथा -तत्त्व से ओत-प्रोत एवं पठनीय हैं।  इनकी डायरी भी अपनी साहित्यिक मूल्यवत्ता में बेजोड़ है। उसमें इन्होंने स्थान – स्थान पर कालिदास का स्मरण किया है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि इस शताब्दी वर्ष में चंद्रकुंवर बर्त्वाल का संपूर्ण साहित्य को नए सिरे से प्रकाशित करके उसका नया पाठ तैयार करने की जरूरत है। ऐसा करके ही हम शताब्दी पुरुष चंद्रकुंवर बर्त्वाल को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। किसी रचनाकार की जन्मशती मनाने का यही सही तरीका है।

 

 

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