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सुख और दुख, प्रेम और विरह, उल्लास और त्योहार, तत्वज्ञान और रहस्य- इस तरह सभी मूड के सदाबहार गानों को लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल की जोड़ी ने संगीतबद्ध किया। फिल्मी संगीत का एक युग उनके नाम है। जब तक फिल्में बनती रहेंगी तब तक यह युगल याद आता रहेगा।

आज जब भी बांद्रा (मुंबई) के मेहबूब स्टूडियो में किसी फिल्मी कार्यक्रम के लिए जाता हूं तो मेरी नज़र वहां के रेकॉर्डिंग स्टूडियो पर पड़ती है; क्योंकि वहां संगीतकार लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल किसी फिल्म का गाना या पार्श्व संगीत रेकॉर्ड करते हुए अक्सर दिखाई देते थे। उनका यह पसंदीदा रेकॉर्डिंग स्टूडियो था। प्यारेलाल ऑर्केस्ट्रा का संचालन करते थे और लक्ष्मीकांत प्रभाव सुनते थे। एक ही झलक में साफ नजर आता था कि उन्होंने गीत के लिए कितनी मशक्कत की होंगी। असल में दोनों संगीत जीते थे।

और उनकी इसी खासियत के कारण लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने फिल्म संगीत में अपनी जगह बना ली। लक्ष्मीकांत के देहांत (22 जून 1998) के बाद प्यारेलाल ने अपना काम कम किया। कुछ दिनों बाद तो लगभग बंद ही कर दिया; मगर वे फिल्मी जगत के कई कार्यक्रमों में आते रहे। किसी फिल्मी पार्टी में उनकी मुलाकात होती तो बातों-बातों में पुरानी यादें निकल आतीं; मगर वे बदली हुई फिल्मी संस्कृति को लेकर कोई खास टिप्पणी नहीं करते, सिर्फ हंस कर टाल देते। इससे उनके मन में क्या हलचल है इसका अंदाजा आ जाता।

साठ के दशक में उन्होंने स्टंट फिल्म ’पारसमणि’ (1963) से जब अपने फिल्म संगीत करियर की शुरुआत की तब मुंबई जैसे बड़ेे शहरों में किसी मध्यमवर्ग आदमी के घर में रेडियो आता, तो पडोसियों को शक्कर बांटी जाती थी और समाज के प्रतिष्ठित लोगों के घर में ग्रामोफोन हुआ करता था। शहरों की ईरानी होटलों में ज्यूक बॉक्स में पच्चीस पैसे का सिक्का डालकर गाने सुनना मनोरंजन का एक हिस्सा था। काफी गावों में बिजली पहुंची नहीं थी। शहरों और गावों में किसी पारिवारिक या धार्मिक पर्व के समय लाऊडस्पीकर से गाने सुनने को मिलते थे। सत्तर के दशक में टेलीविजन माध्यम विकसित हो गया, मगर उस पर फिल्म और फिल्म संगीत को ज्यादा मौका नहीं था। अगर किसी को फिल्म संगीत सुनना हो तो ज्यादातर रेडियो- विविध भारती और सिलोन- महत्वपूर्ण माध्यम थे और नई फिल्मों का प्रदर्शन, दुबारा लगी फिल्में और मैटिनी शो ये मौके थे। उस समय ऑर्केस्ट्रा काफी पसंद किया जाता था।

लगभग ऐसी स्थिति में भी फिल्म संगीत लोकप्रिय हुआ। इसका अर्थ यह है फिल्म संगीत में श्रवणीयता होती है और उसमें लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का नाम काफी ऊपर है। उसके बाद टेपरेकॉर्ड याने कैसेट युग आया, जो समाज में काफी गहराई तक फैल गया, फिर वीडियो युग, सैटेलाइट चैनल ऐसा करते-करते अब हम ऑनलाइन, यू ट्यूब जैसे माध्यमों से संगीत सुनने-देखने लगे हैं और इन सभी माध्यम बदलावों के साथ- साथ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत भी चलता रहा है।

सत्तर और अस्सी के दशक में ’एल. पी.’ का सामान्य अर्थ लाँग प्ले रेकॉर्ड के अलावा लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी किया जाता था। यह उनका सबसे बड़ा श्रेय और उनकी सफलता का एक मापदंड भी है। इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि उस दौर में ज्यादातर फिल्मों के जो लांग प्ले रेकॉर्ड प्रदर्शित होते थे, उनमें बहुतायत में एल. पी. ही बतौर संगीतकार मौजूद रहते थे। जैसे ही राजश्री प्रॉडक्शन्स की फिल्म ’दोस्ती’ (1964) के संगीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ, फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उस वक्त राज कपूर निर्देशित आर. के. फिल्म की ’संगम’ के लिए शंकर जयकिशन को ही यह पुरस्कार मिलेगा ऐसा माना जा रहा था मगर ऐसा हुआ नहीं और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का युग शुरू हुआ।

लक्ष्मीकांत कुडालकर और प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा ने मिल कर संगीत के जिस अति लोकप्रिय युग की शुरुआत  की, वह हिन्दी फिल्मों के लिए आज आदर्श है। इसमें कोई संदेह नहीं कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ही शायद अकेली ऐसी शीर्षस्थ संगीतकार जोड़ी है, जिसने लोकप्रियता के मामले में बाकी जोड़ियों को पीछे छोड़ दिया। उनके पहले हुस्नलाल-भगतराम, शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी ऐसी संगीतकार जो़डियां थीं जो सफल भी रहीं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल कुछ समय कल्याणजी- आनंदजी के असिस्टेंट भी रहे। जैसे ही उन्होंने अपना करियर शुरू किया उनके समक्ष दो लक्ष्य थे- नई पीढ़ी की पसंद का संगीत देना और व्यावसायिक सफलता के लिए बडी बैनर की फिल्म लेना। उनकी यह रणनीति काफी सफल रही। सिर्फ मसाला फिल्मों के निर्माता और निर्देशक नासिर हुसैन की किसी फिल्म को उन्होंने संगीत नहीं दिया, इस पर मैंने एक बार लक्ष्मीकांत से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि उनके साथ काम करने का मौका मिलते-मिलते रह गया। यह ऐसा इकलौता बडा बैनर था जो उनसे छूट गया। अन्यथा उन्होंने वी. शांताराम, राज कपूर, बी. आर. चोप्रा, रामानंद सागर, चेतन आनंद,  विजय आनंद, राज खोसला,  देव आनंद, मनोज कुमार, शक्ति सामंता, मोहन कुमार, जे. ओम प्रकाश, यश चोप्रा, मनमोहन देसाई,  प्रमोद चक्रवर्ती, एल. वी. प्रसाद, दुलाल गुहा, चिन्नाप्पा देवर और एन. चंद्रा,  सुभाष घई तक बड़े-बड़े निर्देशकों की फिल्मों को संगीत दिया। यह उनकी सफलता है।

उस वक्त मेलडी एक्सप्रेशन्स महत्वपूर्ण माने जाते थे। जब कभी कोई बड़ा अभिनेता रेकॉर्डिंग स्टूडियो में हाजिर होता तो वह उसी वक्त अनुमान लगा लेता था कि यह गाना उसे परदे पर कैसे पेश करना है। इस मामले में राजेश खन्ना का नाम काफी ऊपर आता है, जो  किशोर कुमार के अच्छे दोस्त थे और नए गाने के प्रति जागरूक रहते थे। लक्ष्मीकांत इस बारे में कुछ किस्से सुनाते थे। एक बार किशोरदा का गाने का मूड नहीं था, तब प्रॉडक्शन्स वाले उन्हें मेहबूब स्टूडियो में ले आए। उन्हें देख कर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल भी खुश हुए और किशोरदा ने भी जम कर गाया।

एल. पी. की तुलना में हम शंकर-जयकिशन,  कल्याणजी- आनंदजी, राहुल देव बर्मन के सदाबहार युगल-अवदान को याद कर सकते हैं। फिल्मी संगीत की दुनिया में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ इन सबका अलग ही स्थान है। मगर, हम राहुल देव बर्मन का इसमें अलग ही स्थान है; क्योंकि उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत को पाश्चात्य संगीत संस्कृति से जोड़ दिया। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने लोक संगीत का मार्ग पकडा। हमारे देश में हर राज्य की संगीत संस्कृति अलग है जैसे महाराष्ट्र में लावणी, गुजरात मे गरबा, पंजाब में भांगडा आदि। इन सबका सही इस्तेमाल लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में है ही।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल अपनी कुछ आरंभिक फिल्मों में शंकर-जयकिशन की धुनों से प्रभावित थे। उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कार्य करने से पहले कुछ दिनों तक कल्याणजी-आनंदजी के सहायक के बतौर काम किया था। कल्याणजी-आनंदजी की पुरानी फिल्मों के टाइटल में यह बात दिखाई देगी।

बाबूभाई मिस्त्री की फंतासी फिल्म पारसमणि (1963) के साथ यह जोड़ी लोकप्रिय संगीत का तूफान लेकर आई और अपनी अलग पहचान बना ली। उनके ’हंसता हुआ नूरानी चेहरा’, ‘मेरे दिल में हल्की सी वो खलिश है’, ‘चोरी चोरी तुमसे मिली तो लोग क्या कहेंगे’, ‘वो जब याद आए बहुत याद आए’ जैसे गीतों ने बेहद लोकप्रियता हासिल की। लक्ष्मीकांत मैन्डोलिन बेहतरीन बजाते थे, और यह बात हमेशा कहते भी थे। प्यारेलाल ने जुबिन मेहता से प्रेरित होकर वियना जाकर वॉयलिन वादक का करियर चुनने का मन बना चुके थे। हेमंत कुमार के संगीत-निर्देशन में बनी नागिन के गीत ’जादूगर सैंया छोड़ो मोरी बैंया’ एवं सचिन देव बर्मन की लाजवंती के ’कोई आया धड़कन कहती है’ में लक्ष्मीकांत ने मैन्डोलिन बजाया था। पुरानी फिल्मों के संगीत के शौकीन इस बात पर हमेशा गर्व से करते हैं।

इसी तरह मदन मोहन की फिल्म ’हकीकत’ के ’मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था’ गीत में वॉयलिन प्यारेलाल ने बजाई थी। ऐसे छोटे-बड़े अनुभव उनके करियर में काम आए। फिल्म संगीत क्या होता है, कैसे होता है इसकी शिक्षा उन्हें इनसे मिलीं। आज भी संगीत के जानकार मानते हैं कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल में ऑर्केस्ट्रेशन का बेहतर कौशल था, जो अन्यत्र बहुत कम मिलता था। प्यारेलाल के पिता रामप्रसाद बेहतरीन वॉयलिन वादक थे। कल्याणजी, राजेश रोशन और हृदयनाथ मंगेशकर भी उनसे वॉयलिन एवं पाश्चात्य संगीत के नोटेशन सीखने आया करते थे।

उन्होंने भरतपुर महाराजा किशन सिंह के यहां बैण्ड में ट्रम्पेट भी बजाई है और पांचवें दशक की कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया है। वे व्यावसायिक रूप से उतने सफल संगीतकार नहीं हो सके, मगर अपने विलक्षण संगीत ज्ञान के चलते ज्यादातर संगीतकारों- सी. रामचंद्र, नौशाद एवं के. दत्ता के यहां उनकी फिल्मी धुनों में बरसों तक ट्रम्पेट बजाया है। प्यारेलाल में अपने पिता के ऐसे गुण आ जाना स्वाभाविक ही हैं।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की संगीतमय फिल्में इस तरह हैं: दोस्ती, हरिश्चंद्र तारामती, मिस्टर एक्स इन बॉम्बे, सती सावित्री, फर्ज, अनजाना, आए दिन बहार के, प्यार किए जा, आया सावन झूम के, प्यासी शाम, मन की आंखें, अनीता, मिलन, पत्थर के सनम, शागिर्द, नाइट इन लंदन, बहारों की मंजिल, दो रास्ते, इज्जत, मेरे हमदम मेरे दोस्त, राजा और रंक, धरती कहे पुकार के, इंतकाम, जीने की राह, साजन, माधवी, आन मिलो सजना, खिलौना, जीवन-मृत्यु, हमजोली, मेरा गांव मेरा देश, हाथी मेरे साथी, महबूब की मेंहदी, दुश्मन, प्रेम कहानी, आप आए बहार आई, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली, शोर, बॉबी, दाग़, चरस, हिम्मत, हमजोली, एक बेचारा, कच्चे धागे, राजा जानी, धरमवीर, सत्यं शिवं सुंदरम्, अमर अकबर एंथनी, प्रेम रोग, क्रांति, जानेमन, अनुरोध, बिदाई, जुदाई, नागिन, आक्रमण, प्रेम बंधन, बंदिश, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सरगम, आशा, कर्ज, एक दूजे के लिए, नसीब, हीरो, अर्पण, उत्सव, सुर संगम, ग़ुलामी, मेरी जंग, नगीना, कर्मा, नाम, मिस्टर इंडिया, तेजाब, दयावान, राम लखन, बंटवारा, खलनायक, रजपूत, राम बलराम,  सौदागर, जितने भी नाम लिए जाए कम हैं। आपका मन एकदम सत्तर और अस्सी के दशक में पहुंच गया होगा और साथ-साथ इन फिल्म के गाने नजर आ रहे होंगे।

मनमोहन देसाई की फिल्म ’कुली’ (1983) का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का था, मगर पार्श्व संगीत अन्नू मलिक का था इसलिए कि अमिताभ बच्चन के साथ बेंगलुरू में इसी फिल्म के सेट पर हुई दुर्घटना के कारण इस फिल्म का शूटिंग शेड्यूल काफी बदल गया और अब लक्ष्मीकांत प्यारेलाल अन्य फिल्मों में काफी व्यस्त थे। मनमोहन देसाई रुकना नहीं चाहते थे। इसलिए मनमोहन देसाई और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के बीच में कुछ झगड़ा होने की खबरें फैल गईं। इस फिल्म के बाद मनमोहन देसाई की आगे की किसी भी फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत नहीं है।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लोकप्रिय गानों के बारे में जितना कहे उतना कम है। याद करें ये गानें- मेरा जो कदम है वो तेरी राह में है ( दोस्ती), मैं जाके यमला पगला दीवाना (प्रतिज्ञा), इतना तो याद है मुझे (मेहबूब की मेहंदी), ओ सपनों के राजा (बनफूल), मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा मिल गया होता (आप आए बहार आई), वो जब याद आए बहुत याद आए (पारसमणि), तुम गगन के चन्द्रमा हो, (सती सावित्री), वो हैं जरा खफा-खफा (शागिर्द), सावन का महीना पवन करे सोर (मिलन), बदरा छाए कि झूले पड़ गए हाए (आया सावन झूम के), ढल गया दिन हो गई शाम (हमजोली), जे हम तुम चोरी से बंधे इक डोरी से (धरती कहे पुकार के), झिलमिल सितारों का आंगन होगा (जीवन-मृत्यु), अच्छा तो हम चलते हैं (आन मिलो सजना), हम और तुम तुम और हम (दाग), ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं (इज्जत), भंवर ने खिलाया फूल (प्रेम रोग), तुमसे मिल कर न जाने क्यों (प्यार झुकता नहीं), महबूब मेरे, महबूब मेरे तू है तो दुनिया कितनी हंसी है (पत्थर के सनम), ’क्या कहता है ये सावन’ (मेरा गांव मेरा देश), मेरे दिल में आज क्या है ( दाग), आप के अनुरोध पे (अनुरोध),  पतझड़ सावन बसंत बहार (सिंदूर), ऊंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना (रामअवतार), राही मनवा दुख की चिंता क्यूं सताती है ( दोस्ती), पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, (एक नजर), झुक गए सारे नजारे (दो रास्ते), दिल की बातें दिल ही जाने, (रूप तेरा मस्ताना), इक प्यार का नग़मा है (शोर), मैं न भूलूंगा, मैं न भूलूंगी (रोटी, कपड़ा और मकान), हम तुम एक कमरे में बंद हों (बॉबी), कल की हंसी मुलाकात के लिए’ (चरस), अब चाहे मां रूठे या बाबा (दाग़), देखा फूलों को कांटो को सोते हुए (मजबूर), आएगी जरूर चिट्ठी मेरे नाम की (दुल्हन), गोरे रंग पे इतना गुमा न कर (रोटी), यशोमती मैया से बोले नंदलाला (सत्यं शिवं सुन्दरम्), ढफली वाले ढफली बजा (सरगम), मुहब्बत है क्या चीज (प्रेम रोग), हम बने तुम बने एक दूजे के लिए (एक दूजे के लिए), भोर भए पनघट पे (सत्यं शिवं सुन्दरम्), मैं तेरे प्यार में पागल (प्रेम बंधन), प्यार करने वाले कभी डरते नहीं (हीरो), तेरा नाम लिया तुझे याद किया (राम लखन), दिल करता है ईलू-ईलू (सौदागर) और देर से आना जल्दी जाना (खलनायक) जैसे तमाम सुरीले और हमेशा लोकप्रिय गीत शामिल हैं। ये वे गीत हैं, जो सहज ही याद आते हैं। लेकिन इनके अलावा भी बहुतेरे ऐसे गीत हैं, जिनकी गुणवत्ता पर कोई भी संगीत-प्रेमी उंगली नहीं रख सकता।

फिल्म संगीत की एक खास बात है कि बहुत सारा ऑर्केस्ट्रा इस्तेमाल करते हैं और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की यह खासियत रही कि पियानो, एकॉर्डियन, मैन्डोलिन, ऑर्गन, सैक्सोफोन, ट्रम्पेट, हारमोनियम, कांगो-बांगो, वॉयलिन, गिटार के साथ-साथ सितार, सारंगी, सरोद, तबला, ढोलक, नाल, ढफली, खंजड़ी एवं घटम आदि का सफलतापूर्वक करते रहे। कुछ ऐसी धुनें, जो इस संगीतकार जोड़ी की ऑर्केस्ट्रेशन पर सिद्धहस्तता दर्शाती हैं, यहां रेखांकित कर रहा हूं। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के गानों में कोई ऐसी खास बात है कि रेडियो सिलोन की बिनाका गीतमाला में वे पायदान पर पायदान चढ़ते गए जैसे सा रे ग म … गा रे मेरे संग मेरे सजना (अभिनेत्री), संग बसंती अंग बसंती, रंग बसंती आ गया (राजा और रंक), उइ मां उइ मां ये क्या हो गया (पारसमणि), तोहार नाम लइके छोड़ा है जमाना (आया तूफान), ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो (संत ज्ञानेश्वर), नींद निगाहों की खो जाती है (लुटेरा), ओ रुक जा …उड़के पवन के संग चलूंगी (शागिर्द), मेरे महबूब कयामत होगी’ (मिस्टर एक्स इन बॉम्बे), उड़ के पवन के संग चलूंगी (शागिर्द), नजर न लग जाए किसी की राहों में (नाइट इन लंदन), अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में (मेरे हमदम मेरे दोस्त), मस्त बहारों का मैं आशिक’ (फर्ज), मेरे बचपन तू जा (कच्चे धागे), देखो देखो देखो बायस्कोप देखो (दुश्मन), गाडी बुला रही है (दोस्त), सूनी रे नगरिया सूनी रे सेजरिया (उपहार), बात है एक बूंद सी (जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली), यह पब्लिक है पब्लिक (रोटी), सात अजूबे इस दुनिया में (धरमवीर), हंगामा हो गया (अनहोनी), महंगाई मार गई (रोटी, कपड़ा और मकान), सच्चाई झुक नहीं सकती (दुश्मन), मेरे शायर की ग़ज़ल ड्रीम गर्ल (ड्रीम गर्ल), चन्दा को ढूंढ़ने सभी तारे निकल पड़े (जीने की राह), रंग रंग के फूल खिले मोहे भाये रंग ना (आन मिलो सजना), छुप गए सारे नजारे ओए क्या बात हो गई (दो रास्ते), जानी हो जानी (राजा जानी), दुश्मन दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है (दुश्मन), आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा (लोफर), पर्वत के उस पार (सरगम), परदा है परदा (अमर अकबर एंथोनी), मैं तेरे इश्क में मर ना जाऊं कहीं (लोफर), झूठ बोले कौआ काटे (बॉबी), रुक जाना नहीं तू कहीं हार के (इम्तिहान), प्रेम कहानी में एक लड़का होता है (प्रेम कहानी), चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार (क्रांति), हम तुम दोनों जब मिल जाएंगे (एक दूजे के लिए), ओम शांति ओम (कर्ज), भंवरे ने खिलाया फूल-फूल (प्रेम रोग), मेरे मन बाजा मृदंग (उत्सव), चल दरिया में डूब जाए (प्रेम कहानी), कहते हैं मुझको हवा-हवाई (मिस्टर इंडिया) और एक दो तीन चार पांच (तेजाब) आदि। अनगिनत व्यावसायिक हिंदी फिल्मों के अत्यंत मनोग्राही संगीत से अलग उनको कुछ नया रचने वाले, जिज्ञासु, लोकप्रिय और प्रयोगशील  संगीतकार के रूप में भी याद किया जाता है। ऐसी फिल्मों में काफी अलग-अलग सिच्यूएशन पर गाने होते हैं। एक तरफ प्रेम गीत तो दूसरी तरफ दर्दभरा गीत। कहीं शादी का गीत तो कहीं विरह का गीत। कहीं जीवन का तत्वज्ञान तो कहीं सर्वधर्म समभाव के गीत। कभी अलग-अलग त्यौहार पर गीत तो कहीं रहस्यमय गीत। सभी मूड के गाने मनोरंजन फिल्म का आधार होता है और उसमें लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल का अच्छा योगदान रहा।

कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनमें लक्ष्मी-प्यारे ने अपनी प्रचलित छवि को तोड़ कर बिल्कुल नई जमीं का संगीत रचा है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की सफलता और सही पहचान पारसमणि, दोस्ती, दो रास्ते, मेरा गाव मेरा देश, प्रेम कहानी, क्रांति, सत्यं शिवं सुंदरम्,  सुर-संगम, नाचे मयूरी, नगीना, भैरवी, प्रेम ग्रंथ और उत्सव के कारण भी मानी जाती है, जो अभिनव संगीत के आदर्श उदाहरण हैं। यह असली संगीत है। उनकी अपनी पहचान है। उनकी अपनी रचनात्मकता है। सच तो यह है कि चाहे वह फिल्म जगत हो या और कोई, नक़ल ज्याादा समय टिक नहीं पाती और मूल काम का आनंद ही रचनात्मकता की क्षमता बढ़ाती है, जो लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की खासियत रही है।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बेमिसाल जोड़ी को ’वो जब याद आए बहुत याद आए’ यह हमेशा कहा जाएगा इसलिए कि उनका हिंदी फिल्म संगीत और हिन्दुस्तानी संगीत में भारी और यादगार योगदान है। आज जब भी मैं मेहबूब स्टूडिओ जाता हूं मुझे लगता है कि लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल किसी गाने का टेक ले रहे हैं और उसी में खो गए हैं, लक्ष्मीकांत के गुजर जाने के बाद प्यारेलाल ने नई फिल्में स्वीकार करना आस्ते-आस्ते बंद कर दिया मगर तब तक उन्होंने इतना और ऐसा काम किया था कि वह उनका अस्तित्व और महत्व साबित कर रहा है। जब तक दुनिया में फिल्में बनती रहेंगी संगीतकार लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल की जोड़ी का संगीत सदा याद आता रहेगा।

 

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