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सुदीर्घ नाट्य परम्परा को समाहित करते हुए भी रंगमंच में नित नए प्रयोग करते रहने से नवीनता, रोचकता एवं उनकी ग्राह्यता बनी रहती है। दर्शक भी तभी पुनः हिंदी थियेटर की ओर मुड़ेंगे, जिससे आर्थिक समस्या का भी समाधान हो जाएगा और हिंदी रंगमंच पुनः अपना गौरव प्राप्त करेगा।

रंगमंच समाज का दर्पण है, एक ऐसी विधा है जो सदैव समाज-व्यवस्था, राष्ट्र-हित, विधि-पालन और सबसे बढ़ कर मानवता की प्रतिष्ठापना के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में जन-जन में लोकप्रिय रही है। सभी उम्र, वर्ग और स्तर के व्यक्तियों को एकसाथ प्रेरित, प्रभावित एवं आनंदित करने की ऐसी क्षमता किसी अन्य विधा में नहीं है। नाटक और रंगमंच किसी भी देश, समाज और वर्ग की चेतनता एवं प्रगतिशीलता के परिचायक होते हैं।

हमारे देश में नाट्य एवं रंगमंच की परम्परा प्राचीन काल से ही बहुत ही समृद्ध एवं सुदृढ़ रही है। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र तो प्राचीन काल से आज तक विश्व के नाट्य जगत के लिए दिग्दर्शक का कार्य कर रहा है। प्राचीन काल में प्राकृत एवं संस्कृत भाषा ही प्रचलन में थी, वेद- पुराण, धर्म-ग्रंथ, देवता-देवियां, इन सबके माध्यम से ही नाट्य एवं रंगमंच का प्रस्तुतिकरण होता था। भरत मुनि के अनुसार जब इंद्र आदि देवताओं ने सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव से प्रार्थना की कि दृश्य-श्रव्य युक्त मनोरंजन के किसी ऐसे माध्यम का निर्माण करें जो सभी वर्णों को स्वीकार्य हो तब ब्रह्मदेव ने ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान एवं अथर्ववेद से रस लेकर पांचवें वेद के रूप में नाट्य शास्त्र की रचना की। जिसमें प्रमुख तत्व बने-कथानक, पात्र योजना और उनका चरित्र चित्रण जैसे नायक, नायिका, खलनायक, विदूषक और सहायक पात्र, रस संयोजन अर्थात श्रृंगार रस के दोनों पक्ष- मिलन एवं वियोग, हास्य रस, करुण रस, वीर रस, भयानक रस एवं अद्भुत रस आदि, संवाद, भाषा शैली एवं नाटक का उद्देश्य, जो मुख्यतः जन साधारण को सीख देने या उनके कल्याण से सम्बंधित होता है।

यह भी सत्य है कि युग परिवर्तन के साथ ही परिस्थितियां, परम्पराएं और मान्यताएं भी परिवर्तित होती हैं, अतः रंगमंच में भी अपेक्षित परिवर्तन आवश्यक होता है, और ऐसा ही हुआ भी, युग परिवर्तन के साथ ही भाषा परिवर्तित हुई, कथानक, प्रस्तुतिकरण और माध्यम परिवर्तित हुए। नाट्य कथा वाचन, कठपुतलियों के माध्यम से प्रस्तुतिकरण, राज सभाओं से चौपालों तक, नुक्कड़ नाटकों से बड़े-बड़े सभागारों तक अनेक परिवर्तन हुए। गांव हो या शहर, लालटेन का प्रकाश हो या रंग-बिरंगे विद्युत् का प्रयोग, स्थल-संगीत हो या रिकॉर्डेड संगीत, हिंदी हो या कोई अन्य भाषा, रंगमंच ने सदैव जनमानस को आकर्षित एवं उद्वेलित किया है।

रंगमंच के प्रमुखतः छः तत्व माने गए हैं यथा- कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, संवाद, भाषा-शैली, देश-काल एवं उद्देश्य। इनके अतिरिक्त एक और प्रमुख तत्व है अभिनय। अभिनय ही नाटक को सार्थक एवं सफल बनाता है। आधुनिक काल में अनेक तत्व और जुड़ गए हैं जैसे संगीत, नृत्य, प्रकाश संयोजन। कथानक में भी कुछ तत्वों का समावेश होने लगा है जैसे कुतूहल, अर्थात दर्शक में कुतूहल जाग जाए कि आगे क्या होने वाला है, घात-प्रतिघात, अर्थात खलनायक ने कोई चाल चली, नायक ने उसे काटते हुए दूसरी चाल चली, जिससे रोमांच और जिज्ञासा बनी रहे, द्वंद्व, अर्थात नायक एवं खलनायक में टकराव, नाटकीय मोड़, अर्थात घटनाचक्र में एकाएक ऐसा परिवर्तन जो दशा और दिशा को रोमांचक मोड़ देकर दर्शक को बांधे रखे, श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस आदि नव रसों का समावेश, इन सब लक्षणों का होना एक सफल नाटक के लिए आवश्यक है।

हिंदी रंगमंच का आधुनिक स्वरूप अनेक परिवर्तनों के इतिहास को समेटे हुए है। कठपुतली, नौटंकी, रामलीला, रासलीला आदि ग्रामीणों से लेकर शहरियों तक में बहुत लोकप्रिय रहे हैं। प्राचीन काल के लगभग सभी नाटकों का आधुनिक हिंदी में भाषांतरण करके आज भी मंचन किया जाता है, आज अनेक साधनों जैसे प्रकाश संयोजन, आधुनिक संगीत एवं नेपत्थ्य में यवनिका पर चलचित्र प्रदर्शन आदि के द्वारा उन नाटकों का बड़ा ही प्रभावी प्रस्तुतिकरण किया जाता है। भास रचित प्राकृत भाषा के नाटक अविमारकम्, स्वप्न-वासवदत्ता, सौगंध यौगंधरायणः हों या कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम्, मेघदूतम्- ये आज हिंदी में भी बहुत पसंद किए जाते हैं। आधुनिक हिंदी नाटकों का लेखन वाराणसी में जन्मे भारतेंदु हरिश्चंद्र से आरंभ होना माना जा सकता है। सन 1880 में ब्रिटिश काल में उन्होंने अंधेर नगरी, नील दर्पण जैसे अनेक नाटक लिखे। बाद में जयशंकर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ अश्क, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, भगवती चरण वर्मा, धर्मवीर भारती और फिर उनके पश्चात् अनेक लोगों ने नाट्य लेखन किया। उन दिनों आज की भांति बड़े सभागार एवं अच्छे प्रायोजक बहुत कम होते थे इसलिए उन नाटकों का मंचन बहुत कम हो पाता था, लेकिन पाठकों से उन नाटकों ने बहुत प्रशंसा बटोरी। राजा महाराजाओं के काल में तो राजाओं के संरक्षण में नाटकों का मंचन हुआ करता था, किन्तु उनके पश्चात संरक्षण के अभाव में नाटक मंचन के स्थान पर पठन तक ही सीमित रह गया था। हालांकि काशी महाराज ने नाटकों का मंचन जारी रखा, तो दूसरी ओर ग्रामीणों में नौटंकी का प्रचलन भी बना रहा, जिसके कारण बुढ़वा मंगल, सत्य हरिश्चंद्र, सावित्री-सत्यवान, घासीराम कोतवाल, चरणदास चोर आदि जैसे अनेक नाटकों का मंचन होता रहा।

एक समय था जब नाटक एवं ऑपेरा आदि को मनोरंजन का श्रेष्ठतम साधन माना जाता था, किन्तु समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तित हुआ, और उस परिवर्तन में मनोरंजन के नाम पर अवतरण हुआ चलचित्र का, चलचित्र में मनोरंजन की अनेक संभावनाएं होने के कारण रंगमंच को बहुत क्षति पहुंची। लेकिन रंगमंच से प्रेम करने वाले पीछे नहीं हटे, कृष्ण चंदर, बलराज साहनी, शांति बर्धन, पृथ्वीराज कपूर आदि जैसे अनेक रंगमंच प्रेमी चलचित्र के साथ साथ रंगमंच को भी बढ़ावा देते रहे। पृथ्वीराज कपूर ने सन् 1944 में पृथ्वी थियेटर की स्थापना करके रंगमंच प्रेमियों को एक बड़ा उपहार प्रदान किया।

आधुनिक हिंदी थियेटर की उन्नति में सबसे बड़ा योगदान रहा नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का, जिसकी स्थापना दिल्ली में सन् 1959 में हुई, इब्राहीम अलकाजी जी का इसके स्थापन में बहुत बड़ा हाथ रहा। सन् 1964 में इसकी ड्रामा रिपरट्री की भी स्थापना हुई और तब हिंदी नाटकों को एक बहुत बड़ा मंच प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् लखनऊ, भोपाल समेत अनेक शहरों में हिंदी रंगमंच के लिए ड्रामा स्कूल एवं रिपरट्री आदि की स्थापना हुई। हालांकि हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती आदि अन्य भाषाओं के नाटकों के मंचन की भी समृद्ध परम्परा अलग-अलग प्रदेशों में चली आ रही थी, लेकिन उन्हीं दिनों दूरदर्शन के शुरू होने से हिंदी रंगमंच पर पुनः संकट के बादल मंडराने लगे, बाद में कुछ प्राइवेट चैनल आ जाने से और कठिनाई उत्पन्न हो गई।  कहते हैं ना कि समय की चाल के साथ जो तारतम्य बिठा लें वही आगे तक जा सकता है, अतः हिंदी थियेटर में भी अनेक प्रकार के प्रयोग होने लगे। तुगलक, अंधा युग, अभिज्ञान शाकुंतलम्, आषाढ़ का एक दिन जैसे नाटकों का भव्य मंचन हुआ, जिससे हिंदी थियेटर की भी लोकप्रियता बढ़ी। मराठी रंगमंच की तमाशा शैली पर आधारित नाटक गधे की बारात का मंचन दिल्ली में हुआ। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में वृहद् स्तर पर नाटक करोड़ी मार्को का मंचन हुआ। उसके पश्चात् इब्राहीम अलका जी की सुपुत्री अमाल अल्लाना ने भी नाटक किंग लियर के हिंदी रूपांतर का मंचन वृहद् स्तर पर दिल्ली के प्रगति मैदान में किया। उसके पश्चात हिंदी रंगमंच में बड़े नाटकों की परम्परा चल निकली।

हिंदी रंगमंच को समर्पित अनेक लेखक, निर्देशक और कलाकार अनेक समस्याओं से जूझते हुए आज भी रचनात्मक क्रियाकलापों में संलिप्त हैं। उनका समर्पण इस हद तक है कि जब उन्हें थियेटर उपलब्ध नहीं होते तो नुक्कड़ नाटक करने से भी वे पीछे नहीं हटते, लेकिन आज के डिजिटल युग में उनके समक्ष नित्य नई नई चुनौतियां उभर रही हैं, चलचित्र, दूरदर्शन के पश्चात् अब इंटरनेट पर उपलब्ध वेब सीरीज ने भी संकट उत्पन्न कर दिया है। आज हर व्यक्ति के पास मोबाइल है। उनके मनोरंजन का साधन उनके हाथ में ही है। सीरियल, फिल्म, न्यूज और भी अनेक कार्यक्रम बटन दबाते ही उपलब्ध हो जाते हैं, जिसकी वजह से रंगमंच, विशेष रूप से हिंदी रंगमंच बहुत प्रभावित हुआ है, उन्हें दर्शक नहीं मिल रहे हैं। अन्य भाषाओँ के लिए ऐसी समस्या अभी भी बहुत अधिक नहीं है, जैसे गुजराती, मराठी, बंगाली, कन्नड़ आदि रंगमंच। उनका दर्शक वर्ग आज भी अपने महीने के बजट में ऐसा तारतम्य बिठा के रखता है कि हर माह में एक या दो बार अपने परिजनों एवं मित्रों के साथ थियेटर में जाकर नाटक का रसास्वादन कर सके। हालांकि हिंदी रंगमंच में परम्परागत कथानकों के साथ ही नए और आधुनिक विषयों पर भी नाटक आदि रच कर उनका मंचन किया जा रहा है। व्यावसायिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए बड़े- बड़े प्रायोजकों को साथ लेकर बड़े नाटकों का मंचन किया गया है, लेकिन ऐसे मंचन की संख्या बहुत कम है।

हिंदी थियेटर के लिए आर्थिक समस्या एक बहुत बड़ा रोड़ा है। कहते हैं ना, कि धन से ही सारे पुरुषार्थ संभव होते हैं, और धन तब एकत्रित होगा जब दर्शक मिलेंगे। एक और बड़ी समस्या है रंगमंच के लिए समर्पित कलाकारों की उपलब्धता। आज यह धारणा भी बनती जा रही है कि रंगमंच में अपनी कला को निखार लो जिससे फिल्मों और सीरियल में काम मिलना सहज हो जाएगा। ऐसे लोग बाद में रंगमंच की ओर नहीं मुड़ते। क्योंकि उन्हें फिल्मों में काम करके अधिक पैसा मिलता है, रंगमंच के लिए तो पहले हफ़्तों रिहर्सल करो, फिर जब मंचन हो तब पैसा मिल पाता है वह भी बहुत कम। यही नहीं, अनेक लोग ऐसे भी उभर आए हैं जिनका नाट्य कला से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, ना ही उन्हें रंगमंच के बारे में कोई ज्ञान है, लेकिन नाट्य समूह गठित करके युवक-युवतियों को भरमा कर उनसे धन उगाही करते हैं, दो-चार टूटे-फूटे से नाटक करके उनमें काम दिला कर उनकी इतिश्री हो जाती है। उन्हें धन की प्राप्ति तो हो जाती है लेकिन उनसे जुड़ने वाले युवक-युवतियां यह भी नहीं समझ पाते कि उन्हें किस प्रकार ठगा गया है।

आज आवश्यकता है रंगमंच में संलिप्त वास्तविक समूह और कलाकारों के संगठित होकर कार्य करने की, जिससे इस विधा का अनुचित फायदा उठाने का प्रयास करने वालों को रोका जा सके। जिस प्रकार प्राचीन काल में राजा-महाराजा रंगमंच को संरक्षण प्रदान करते थे, उसी प्रकार आधुनिक समय में सरकार को भी चाहिए कि वो रंगमंच को संरक्षण प्रदान करे। हालांकि सरकार की ओर से आज भी अनेक लोगों को रंगमंच के उत्थान के नाम पर हर वर्ष अनुदान दिया जाता है, लेकिन उनमें से अधिकांश सिर्फ खानापूर्ति के लिए नाटकों का मंचन करते हैं, ताकि उन्हें अनुदान मिलता रहे, रचनात्मकता और कुछ विशेष कर दिखाने का हौसला अब उनमें नहीं दिखाई देता। आज के परिवर्तनशील माहौल में रंगमंचीय गतिविधियों में भी परिवर्तन होना आवश्यक है किन्तु परिवर्तन के साथ परम्परागत तत्वों का समावेश भी बहुत आवश्यक है। आशय यह कि सुदीर्घ नाट्य परम्परा को समाहित करते हुए भी रंगमंच में नित नए प्रयोग करते रहने से नवीनता, रोचकता एवं उनकी ग्राह्यता बनी रहती है, जो कि किसी भी विधा की सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। तभी दर्शक पुनः हिंदी थियेटर की ओर मुड़ेंगे, जिससे आर्थिक समस्या का भी समाधान हो जाएगा और हिंदी रंगमंच पुनः अपना गौरव प्राप्त करेगा। इतिश्री…

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