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महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और अन्य सम्मानों से नवाजे गए हस्तीमल ‘हस्ती’ हिंदी गज़ल में कामयाब शायर हैं। वे कहते हैं, गज़ल लिखने के लिए गज़लमय होना पड़ता है तभी उसमें अलग-अलग रंग आते हैं। गज़ल के बिना वे जीवन को सूना मानते हैं। पेश है उनसे हुई अंतरंग बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश-

हाल ही में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी गज़ल के पर्याय बन चुके हस्तीमल ‘हस्ती’ जी को अखिल भारतीय हिन्दी सेवी सम्मान से नवाजा गया। इसके पूर्व इनके ग़ज़ल संग्रह “क्या कहें, किससे कहें” को संत नामदेव सम्मान मिला था। विश्वविद्यालयों में उनकी गज़लों पर शोध हो रहे हैं। अनेक पत्रिकाओं के अंक उन पर केंद्रित होते हैं। पाठ्यक्रम में उनकी रचनाएं पढ़ाई जा रही हैं। स्वयं हस्तीजी ने कई दशकों तक ‘काव्या’ पत्रिका का संपादन किया। वर्षों पहले हस्ती जी गज़ल ककहरा सीख रहे थे, तब जैसे सरल थे, आज स्वयं गज़ल का संस्थान बन कर भी उतने ही सहज हैं। और इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सरल और सहृदय व्यक्ति ही अच्छी और सार्थक शायरी कर सकता है, दिल से दिल की बात कर सकता है।

11 मार्च 1946 को राजस्थान के आमेट में जन्में हस्तीजी महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी और सेंसर बोर्ड के सदस्य भी रह चुके हैं। अनेक सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं। गज़ल संग्रह ‘नए परिन्दे’, ‘प्यार का पहला खत’, ‘कुछ और तरह से भी’, ‘ना बादल ना दरिया जाने’, ‘मुक्त संग्रह’ ‘यादों के गुलाब’ देशभर में बहुप्रकाशित ऐसी शख्सियत से मिलवाते हैं।     इस शख्सियत की उपलब्धियों को नज़र है एक शेर-

कौन कहता है, आसमां में सुराख नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों!’

दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति हस्तीजी की लगन को समर्पित है। राजस्थान से मुंबई आकर जमने का संघर्ष साथ ही एक ऐसी विधा में पारंगत होना, जिसे बाकायदा सीखना पड़ता है और इस कदर सीखना कि उस विधा के वर्तमान के पन्ने, फिर भविष्य के पन्ने अधूरे रहेंगे, एक नाम के बगैर, वो नाम है- हस्तीमल ‘हस्ती।’

जिनके लिए मुनव्वर राणा कहते हैं- “हस्तीमल ‘हस्ती’ मुझे इसलिए पसंद हैं कि जब वे फुर्सत के लम्हों में पत्थर शब्दों को हीरा बना कर महबूब के आंचल पर टांक देते हैं, तो गज़ल नई नवेली दुल्हन सी लगने लगती है। जब वे जिंदगी के तज़रूबात को उंगलियों से रेत पर लिखने की कोशिश करते हैं, तो अदब उनको सलाम करता है। मोहब्बत सी मासूमियत है इस शेर में-

प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है

नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिंदगी पर जब लिखा – तो बह गए

जिंदगी होम कर दी गुलों के लिए

और तरसते रहे खुशबुओं के लिए।

राहत ‘इन्दौरी’ उन्हें सलाम करते हुए लिखते हैं – “हस्ती ने बज़ाहिर तो हिन्दी गज़लें कहीं; लेकिन कई गज़लों ने उर्दू के कीमती खजाने को मालामाल करने में मदद की है।”

गोपालदास ‘नीरज’ ने कहा कि “गज़ल की बहर तो हो पर गज़ल का लहज़ा ना हो, तो वह अच्छी तुकबंदी बन कर रह जाती है। इस कला में पूरी महारथ ‘हस्ती’ जी ने प्राप्त की है। उनकी गज़लें तुरंत होठों पर बैठ जाती हैं। उनमें उस्तादाना रंग है।”

हस्तीजी आपको यह महारथ क्या ऐसे ही हासिल हो गई? या आप “मौजूं-तबऊ” याने जन्म से ही काव्यात्मक हैं, इसलिए महारत हासिल कर सके।

जन्म से था, या नहीं, कह नहीं सकता। अपने बारे में कहूं तो मैं व्यवसायिक परिवार से हूं, आज से सालों पहले भी मेरे घर में अखबार आता था, जिसमें ‘रविवार का पन्ना’ साहित्य से लबालब रहता था। पिताजी (सोहनलाल जी) को भी पढ़ने का शौक था। वे शहर से भी साहित्य की किताबें लाते थे, मैं और मेरे दोस्त गांव के पुस्तकालय से भी पुस्तकें लाते, आपस में आदान-प्रदान करते और खूब पढ़ते। चंद्रकांता संतति भी तभी पढ़ी। तब लिखता नहीं था। बच्चों के लिए भी सामग्री आती थी। अंतरमन में साहित्य के रंग खिलने लगे।

पर 1962 में चीन और भारत युद्ध हुआ। मन में आक्रोश उपजता और मैं मन में उठी भावनाओं को काग़ज़ पर उतार लेता। तभी एक तांगे वाले पर एक कहानी भी लिखी। कारूणिक दृश्य था। तांगे वाले का घोड़ा मर गया था। हमारे हिंदी शिक्षक बच्चों को लिखने के लिए बहुत प्रेरित करते थे। उन्होंने सबसे कुछ लिख कर लाने को कहा। सबने बड़े-बड़े लेखकों की रचनाएं दीं। मैंने यह कहानी दी तो पूरे स्कूल में बात बड़ी फैली कि इसने खुद कहानी लिखी और बड़ी अच्छी लिखी। यह जानकर सब हैरान रह गए।

तब आपकी उम्र क्या थी?

उम्र थी, तकरीबन 16 साल। शिक्षक बहुत प्रभावित हुए। इस प्रकार गांव में ही लेखन का अंकुर रोपा जा चुका था, जो मुंबई आकर बड़ा पेड़ बन गया।

मुंबई में कौन मिले शुरू में? किनकी संगत में किशोर हस्ती, शायर हस्ती बन गये।

मुंबई में बहुत लोग मिले। शुरू से ही रूचि के साथी मिलते गए और मेरी कलम गद्य से पद्य की और मुड़ गई। शुरू में छोटे-छोटे मुक्तक लिखने लगा। सच कहूं, मुझे साहित्य के लिए यहां बहुत ही अनुकूल माहौल मिला। मुंबई से ही धर्मयुग, रविवार, सारिका, सब  बडी पत्रिकाएं निकलती थीं। हालांकि इनमें में छपता नहीं था। चंदनमाल चांद मिले, जो लिखा था उन्हें दिखाया तो उन्होंने पुस्तक निकलवा दी। मैं किसी को ज्यादा दिखाता नहीं था। संकोच करता था। हां, पर बिरादरी में  थोड़ी बहुत चर्चा शुरू हो गई थी। हस्ती जी की किताब आई है।

यह कौन से सन की बात है।

तकरीबन 1969 की।

उस वक्त की मुंबई में क्या ज्यादा चल रहा था?

यहां छन्दरहित कविता का बड़ा चलन था। फिर मैं कुछ नवभारत टाइम्स वगैरह में छपने भी लगा। अच्छा लगने लगा। उसी समय गुजराती गज़ल की किताब ‘घटा’ हाथ लगी, फिर लगा लिखना तो ग़ज़ल लिखना, “बाकी सब बेकार की बातें।”

ये तो आपकी गज़ल का ही शेर है।

(मुस्कुराते हुए) हां है तो। खैर, बिना सीखे पहले 50-60 गज़ल लिख भी लीं। जब किसी को सुनाता तब सब वाह-वाह कर देते। संयोग से मदन पाल मिले। उन्हें सुनाई, पहले तो उन्होंने भी सराहा, पर फिर कहा, बहर जिसे कहते हैं, ये उसमें है ही नहीं। फिर तो गुब्बारे में से हवा जैसे निकलती है, वैसे मेरे लेखन की सारी हवा निकल गई। मेरा कच्चा कवि मन निराश हो गया। उनसे पूछा बताओ बहर में कैसे लिखना है-

पहले उन्होंने सोचा, ये व्यापारी कहां ग़ज़ल जैसी मुश्किल विधा कैसे सीख सकेगा? शौकिया लिख रहा है। फिर बहुत पीछे पड़ने पर उन्होंने जो जानकारी दी, वह तो मेरे जैसे के लिए मैदान छोड़ कर भागने वाली थी। उर्दू आती नहीं थी, कॉलेज का मुंह नहीं देखा था।

पर मैदान छोड़ कर भागते तो, ग़ज़ल की दुनिया को कहां आप सा शायर मिलता। फिर क्या हुआ?

मैं नियति को मानता हूं। नियति को मुझे ग़ज़लगो बनाना था, लोग मिलते गए। कभी छोड़ना चाहा तो फिर कोई उत्साहित करने वाला मिल गया। अंतर्मन तो हमेशा गज़ल लिखना चाहता ही था।

आपको ग़ज़ल सिखाने वाले और भी मिले क्या?

हां, मिले। कभी दूसरा, फिर तीसरा, सबसे बड़े मिले ताजदार ‘ताज़’ साहब। सिर्फ बहर सीखने से काम नहीं होता, और भी बारीकियां हैं। और कुछ तो लिख लेंगे आप, पर गज़ल लिखने के लिए ग़ज़लमय होना पड़ता है। तब जाकर आप़ गज़ल कह पाते हैं। आज जब सृजन के क्षणों में होते हैं तब अलग ही दुनिया में विचरते हैं।

आपके अंदर की भावनाएं या अनुभव लेखन को कितना प्रभावित करते हैं?

किसी भी लेखक को निरंतर दूसरे लेखकों को भी पढ़ना चाहिए, तभी दूसरों का लेखन समझ में आता हैं। घटनाएं जो देखते हैं वे भी अपने अंर्तमन में बैठ जाती हैं? ग़ज़ल कहते वक्त बहर का ज्ञान है और आप एकाग्र हैं, ग़ज़ल कहने के मूड में हैं तो ऐसे ऐसे शेर आपकी कलम से निकलते हैं कि आप खुद हैरान हो उठते हैं।

यहां वह प्रश्न पुन: करती हूं, हस्तीजी तो आप मानते हैं आप बचपन से कवि मन है?

बिल्कुल! फिर माहौल भी मिलता गया, और मैं लिखता गया।

आपने किसी किताब का सहारा लिया, गज़ल सीखने के लिए?

किताब से नहीं सीख सकते आप गज़ल लिखना और कहना।

2/2, 2/2, 2/2, 2/2 का जो मीटर हैं – ये क्या है?

हिंदी वालों ने ग़ज़ल के छंद का सरल फार्मूला निकाला है, मैं भी किसी को यही बताता हूं। बस उससे थोड़ी सहायता मिलती है, समझ लीजिए यह तो बस एक स्केल है।

आपके पसंदीदा शायर कौन हैं?

एक नाम नहीं ले सकते। कभी किसी का कुछ पसंद आया, किसी का कुछ। 100% सबका सब कुछ अच्छा नहीं होता। पर हां शुरू-शुरू में सूर्यभानु का दबदबा था। वे धर्मयुग जैसी पत्रिका में छपते थे। बाद में निदा फाज़ली हिंदी मंचों पर आने लगे। उनका कबीराना  अंदाज भाया।

अच्छा ये बताइए गज़ल या साहित्य में आने के बाद व्यवसाय में फर्क पड़ा?

एक बात समझिए – सृजन स्वाभाव में होता है। और जिसने भीड़ में खुद को अलग करने की कला सीख ली उसे कोई बाधा नहीं आती। मैंने वही कला सीख ली। तो दुकान के वक्त दुकान, बाकी समय लेखन। आपस में कभी टकराव होने नहीं दिया। स्वभाव में कभी था ही नहीं कि बहुत पैसा कमाऊं। पिछले कुछ वर्षों से मैं व्यापार देख ही नहीं रहा। बच्चे ही देख रहे हैं।

जब आप मुंबई आए, तो रहने की जगह या आम तकलीफों को झेलना पड़ा?

बिल्कुल! सबकी तरह मुझे भी सामना करना पड़ा। संघर्ष तो रहता ही है। इस पर एक मेरा ही शेर कहता हूं –

रोटियां तो वक्त पे दे देगी मेरी बंबई।

खूब भटकाएगी लेकिन खोलियों के वास्ते।

ये उन्हीं संघर्ष के दिनों का शेर है। बहुत से दोस्तों को बड़ा पसंद आता था।

अब हम थोड़ा परिवर्तन करते हुए ग़ज़ल की भाषा पर आते हैं- कहते हैं, हिंदी गज़ल दुष्यंत कुमार से आई। क्या ग़ज़ल भी भाषाई खानों में बांटी जा सकती है?

देखिए, मराठी ग़जल, गुजराती गज़ल, ऐसे ही उर्दू गज़ल, हिंदी गज़ल। हर भाषा की एक खुशबू होती है, वह लेखन में आती ही है। तो गज़ल में भी आएगी ही। इस खुशबू से पता चलता है किस भाषा वाले ने यह गजल लिखी है। वैसे आजकल उर्दू वाले भी हिंदी से शब्द ले रहे हैं। उनकी गजलों में भी गंगा जमुनी भाषा मिलने लगी है।

एक प्रश्न और सुगबुगा रहा है? हिंदी उर्दू वालों में कितनी दूरी, कितनी निकटता है?

पहले उर्दू वाले सोचते थे, हिंदी वालों को गज़ल लिखनी नहीं आती। पिछले वर्षों में धारणा बदली है उनकी। जितनी नई बातें हिंदी गज़ल में आ रही हैं उसे वे सराहते हैं। उर्दू में पहले रिवायती ग़ज़ल ज्यादा थीं। अब नई गज़ल आ रही है।

प्यार पर आपकी खूबसूरत ग़ज़ल सुनकर, जेहन में ख्याल आता है कि आपने प्यार किया है?

हर कोई प्यार करता है। सब इस अहसास से गुजरते हैं। कभी-कभी कोई बात मन में घुमड़ती है, उसे शब्दबद्ध कर लेते हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई इंसान कभी इस अहसास से नहीं गुजरा। जो ऐसा कहता है, वह झूठ बोलता है। बात परिणिती की नहीं, अहसास की है।

दीवाली पर ‘हिंदी विवेक’ के पाठकों से आप क्या कहना चाहेंगे?

दीवाली प्रकाश का त्यौहार है। हम इंसानियत का प्रकाश फैलाते रहें, रचनाकारों का ये ज्यादा दायित्व होता है। कुछ ऐसा सृजन करें जिसे पढ़ कर लोगों की सोई हुई चेतना जागे। और कुछ ऐसा करें कि समाज में, राष्ट्र में उजाला फैलें। भाईचारा प्रेम बढ़े।

हस्ती जी की खूबसूरत बातों के बाद दीवाली पर उनके कुछ खूबसूरत शेर बतौर नज़राना पेश है-

हम लड़ रहे हैं, रात से लेकिन

उजालों पर होगा तुम्हारा नाम ये मालूम है मुझे।

कांच के टुकड़ों को महताब बताने वाले

हमको आते नहीं आदाब ज़माने वाले।

दर्द की कोई दवा ले के सफर पे निकले

जाने कहां मिल जाएं जख़्म लगाने वाले।

हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी

जिसे निशाने पे रखें, बता के रखते हैं।

चिराग दिल का मुक़ाबिल हवा के रखते हैं

हर एक हाल में तेवर बला के रखते हैं।

 

 

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