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आयुर्वेद में आहार का विशेष रूप से विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें चिकित्सा से भी अधिक स्वास्थ्य रक्षण को महत्व दिया गया है। यदि हमारा आहार देश-काल-परिस्थिति के अनुकूल रहा तो हमारे व्याधियों और बीमारियों से बचने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं।

अन्नाद भूतानि जायन्ते, जातानि अन्नेन वर्धन्ते

(तैत्तिरीय उपनिषद्)

अर्थात-  अन्न से प्राणी उत्त्पन होते हैं, अन्न से ही वृद्धि करते हैं।

भारतीय संस्कृति में लगभग सभी धार्मिक, पौराणिक, उपनिषद, साहित्य, आयुर्वेद तथा योग ग्रंथों में आहार का महत्व तथा योग्य वर्णन किया गया है। आयुर्वेद की सभी संहिताओं में विशेष रूप से आहार का विस्तृत वर्णन किया गया है। भारतीय शास्त्र सदैव विज्ञान पर आधारित रहे हैं। आयुर्वेद भी एक विज्ञान शास्त्र है, जिसमें चिकित्सा से भी अधिक स्वास्थ्य रक्षण को महत्व दिया गया है।

अन्नं हि भैषजं-अर्थात अन्न हि औषधि है। योग्य प्रकार से सेवन किया गया अन्न औषधि का ही कार्य करता है। चरक संहिता के सूत्र स्थान में अन्न (आहार) का एक विस्तृत अध्याय वर्णित है। “आहारो नाम यदन्न मार्ग द्वारा शरीरस्यान्तरार्हियते।”  अर्थात अन्न मार्ग से जो कुछ शरीर के भीतर ले जाया जाता है उसे आहार कहते हैं।

सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित है तथा मनुष्य शरीर भी पांचभौतिक है। सृष्टि की प्रत्येक कृति को यदि शरीर हेतु योग्य रूप से उपयोग में लाया जाए तो वह सहज रूप से लाभप्रद हो सकती है, इसी नियम को वरीयता देकर आयुर्वेद में त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) को किस प्रकार समभाव (Balance) में रखकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जाये इसका उत्तम वर्णन है।

संहिताओं में आहार का वर्णन निम्न प्रकार किया गया है:-

देश:- भौगोलिक आधार पर भूमि तीन प्रकार की वर्णित है

  1. जांगल 2. आनूप 3. समतल।

साधारण एक नियम है कि जिस प्रांत में जो उपजता है वही स्वास्थ्य के लिए भी हितकर होता है। उदाहरणार्थ – पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों को वहां उगने वाले धान्य, फल, शाक आदि का आहार में समावेश करना चाहिए, वहां के निवासियों के लिए इनका सेवन लाभप्रद होता है। उसी प्रकार आनूप (समुद्र या जल युक्त स्थान), समतल (मरुभूमि) आदि के लिए भी यही नियम है। कोकण प्रांत में चावल, रागी, ज्वार, बाजरी, सामक (वरी) आदि अधिक मात्रा में उत्त्पन्न होते हैं अतः इनका सेवन लाभप्रद होता है, उत्तर भारत में गेहूं की खेती अधिक होती है अतः वहां के लोगों को गेहूं का सेवन उपयुक्त होता है।

काल:– सामान्यतया दिन में दो बार भोजन करने का विधान है। प्राचीन समय से ही सूर्यास्त से पूर्व भोजन करने को कहा गया है। उसका वैज्ञानिक आधार यही है कि सूर्य की उपस्थिति शरीर की पाचक अग्नि (Digestive Power) को सक्रिय रखती है। आज की समस्या यही है, इस भाग दौड़ की परिस्थिति में भोजन काल का विशेष ध्यान नहीं रखा जाता है। मध्यान्ह में 1-2 बजे तथा रात्रि में 9-12 के बीच भोजन ग्रहण करने के कारण पाचन सम्बंधी विकारों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। कई बार देर से भोजन करने की अपेक्षा, भोजन न करना ही योग्य होता है।

जीर्ण भोजिनमं व्याधिर्नोपसर्पति – योग्य पचा हुआ भोजन व्याधि को उत्त्पन्न नहीं करता है।

वय:- बाल्य काल शरीर वृद्धि का सर्वोत्तम काल माना जाता है अतः इस काल में दो बार से अधिक भोजन सेवन करने पर भी उत्तम पाचन शक्ति तथा शारीरिक सक्रियता अधिक होने के कारण अन्न सहज रूप से पच जाता है। वृद्धावस्था में अग्नि मंद होनें के कारण आहार सुपाच्य, लघु, मधुर होना उत्तम होता है।

प्रकृति:– प्रमुख रूप से तीन प्रकार की होती है-

  1. वातिक- इस प्रकृति के व्यक्ति की भूख अनियमित होती है।
  2. पैत्तिक- इस प्रकृति के व्यक्ति की भूख तीव्र होती है और पाचन शक्ति भी उत्तम होती है।
  3. कफज- इस प्रकृति के व्यक्ति को मात्रा में अधिक भोजन की इच्छा होती है।

आधुनिक जीवन शैली का अवलम्बन तथा पाश्चात्य प्रणित आहार विहार के परिणाम स्वरूप वर्तमान में मनुष्य जाति विशेष रोगों से ग्रसित होती जा रही है, जिसमें मुख्यतः पाचन सम्बंधी विकार, मधुमेह, वृक्करोग, यकृत विकार, उच्च रक्त चाप, विबन्ध तथा संधिगत रोगों में अत्यधिक वृद्धि हुई। उसका मुख्य कारण अयोग्य आहार विहार ही है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसंधानों (Research) में समय समय पर बदलाव आता रहता है, जबकि प्राचीन काल में वर्णित स्वास्थ्य के नियम और चिकित्सा आज भी कालबाह्य नहीं हुए हैं। यही कारण है कि पाश्चात्य संस्कृति को मानने वाले भी अब आयुर्वेद, योग तथा भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता पर संदेह न करते हुए उस ओर आकृष्ट हो रहे हैं।

आहार

विषय की व्यापकता इतनी विस्तृत है कि हमें मूल सूत्र या बिन्दुओं के आधार पर इसे समझना होगा। आयुर्वेद में वर्णित आहार सम्बंधी निर्देशों को आधार मान कर यह विषय प्रस्तुत है।

वपुराख्याति भोजनं- अर्थात आपके शरीर को देखकर आपके भोजन की कल्पना की जा सकती है। इसीसे मिलती-जुलती अंग्रेजी कहावत है – You are, what you eat.

आहार के गुण 

सुश्रुत चिकित्सा अध्याय में आहार के सामान्य गुणों का वर्णन इस प्रकार है-

आहारः प्रोणनः सद्यो बलकृद देहधारकः

आयुस्तेजः समुत्साहस्मृत्योजोऽग्निविवर्धनः

अर्थात आहार पुष्ट करने वाला, त्वरित बलकारक, देह को धारण करने वाला, आयु, तेज, उत्साह, स्मृति, ओज तथा अग्नि को बढ़ने वाला होता है।

आहार के प्रकार

गुणों के आधार पर आहार तीन प्रकार का होता है-

  1. सात्विक – शरीर शुद्धि तथा मन शांत करने वाला आहार जैसे ताज़ा भोजन, फल, दूध, धान्य, हरी सब्जियां और मेवे।
  2. राजसिक – शरीर और मन को उत्तेजित करने वाला, अतिसेवन से चंचलता, क्रोध, क्लेश, अनिद्रा उत्त्पन्न करने वाला आहार जैसे अत्यंत स्वादिष्ट, मसालेदार, कॉफ़ी, चाय और तले हुए पदार्थ।
  3. तामसिक – मन को मंद करने वाला (गुरु) शरीर में आलस उत्त्पन्न करने वाला आहार जैसे रात का बचा हुआ भोजन, मांसाहार, अधिक तला हुआ, शर्करायुक्त भोजन और मद्यपान, जंक ़फूड इसका सर्वोत्तम उदहारण है।

संघटन के आधार पर आहार छः प्रकार का होता है-

  1. चूष्य 2. पेय 3. लेह्य 4. भोज्य 5. भक्ष्य 6. चर्व्य

रसों के आधार पर छः प्रकार का होता है-

  1. मधुरं 2. अम्ल 3.लवण 4. कटु 5. तिक्त 6. कषाय

सर्व रस युक्त भोजन को हम संतुलित आहार (Balanced Diet) कह सकते हैं।

चरक का यह सूत्र-

एक रसाभ्यासो दौर्बल्यकराणाम (श्रेष्ठः)

सर्व रसाभ्यासो बलकराणाम (श्रेष्ठः)

यही परिभाषित करता है की नित्य भोजन में सभी रसों का समावेश होना उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

मात्रा :– 1. मित भोजनम हि स्वास्थ्यम

  1. मात्राशी स्यात, आहार मात्रा पुनरग्नि बल पेक्षिणी

अर्थात योग्य प्रमाण में भोजन स्वास्थ्यकर होता है।

योग्य प्रमाण में आहार होना चाहिए और आहार की मात्रा अग्नि तथा बल पर निर्भर करती है। भोजन की मात्रा योग्य है या नहीं इसका भी शास्त्रों में वर्णन है।

ग्रंथों में भोजन के प्रमाण की बहुत अच्छी कल्पना की है, त्रिविधं कुक्षौ अर्थात आहार के लिए पेट के तीन भाग करने को बताया है :- 1 ठोस आहार के लिए, 2 द्रव पदार्थो के लिए, 3 वात पित्त कफ के सुचारु संचार के लिए खाली रखने का निर्देश दिया है। जिससे सभी खाये गए पदार्थ उत्तम रूप से पच सकें।

मिताहार से जुड़े हुए लंघन, उपवास तथा पथ्य आदि विषयों को भी समझना आवश्यक है.

लंघन:- लंघनात लघु भोजनम अर्थात गुणों में लघु (हल्का) तथा सुपाच्य आहार के सेवन को लंघन कहा जाता है जैसे मूंग, चावल, मसूर आदि धान्य लघु माने जाते है।

हमारी संस्कृति में उपवास का बहुत अधिक महत्व है, इसके कारण दोषों का पचन सरलता से संभव होता है और अग्नि भी प्रदिप्त होती है। प्रायः चातुर्मास (आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और अश्विन) में अग्नि मंद होती है। वातावरण में सूर्य की किरणें प्रखर न होने के कारण पाचन सम्बंधी विकारों का प्रादुर्भाव होता है। यही कारण रहा होगा कि चिकित्सा शास्त्रों के अतिरिक्त धार्मिक ग्रंथों में भी व्रत उपवास में भुने हुए अन्न, लघु, सुपाच्य आहार लेना योग्य माना गया है।

ऋतु:– ऋतु चर्या – भारत वर्ष में मुख्यतः तीन ऋतुएं हैं (गर्मी, सर्दी एवं वर्षा) परंतु हमारे ऋषि मुनियों ने तीन और ऋतुओं का भी विचार किया है। वर्षभर में छः ऋतुओं के साथ-साथ ऋतु संधि का भी विचार किया है।

  1. चैत्र-वैशाख – वसंत ऋतु
  2. ज्येष्ठ-आषाढ़ – ग्रीष्म ऋतु
  3. श्रावण-भाद्रपद – वर्षा ऋत

4.आश्विन-कार्तिक – शरद ऋतु

  1. मार्गशीर्ष-पौष – हेमंत ऋतु
  2. माघ-फाल्गुन – शिशिर ऋतु

प्रत्येक ऋतु के अनुसार पथ्यापथ्य-

  1. वसंत ऋतु– इस ऋतु में सूर्य की तीक्ष्णता बढ़ने से कफ पिघलने लगता है जिस कारण शरीर की अग्नि ख़ास तौर पर जठराग्नि मंद पड़ जाती है।

पथ्यापथ्य: जौ, शहद, आम का रस लेना इस ऋतु में हितकर है। किण्वित आसव, अरिष्ट अथवा काढ़ा या फिर गन्ने का रस लेना इस ऋतु में लाभकारी है।

कठिनाई से पचने वाले ठोस, ठंडे, मीठे, अम्लीय, वसायुक्त, पदार्थ नहीं लेने चाहिए।

  1. ग्रीष्म ऋतु– इस ऋतु में सूर्य की किरणें तीक्ष्ण होती जाती है जिससे कफ में कमी आ जाती है तथा वात बढ़ने लगता है।

पथ्यापथ्य: मीठे, हल्के और तरल पदार्थ लेना हितकर है। ठंडे पानी का सेवन गर्मी के समय हितकारी है। ठंडाई और पानक का सेवन करना चाहिए। मद्यपान इस ऋतु में निषिद्ध है क्योंकि इससे शरीर में दुर्बलता और दाह की उत्त्पत्ति होती है।

  1. वर्षा ऋतु– यह ऋतु पाचन शक्ति को क्षीण बनाती है। त्रिदोषों की विकृति के कारण पाचन क्रिया के विकार अधिक बढ़ जाते हैं। इसलिए चिकित्सा के दृष्टि से जठराग्नि को प्रदीप्त करना तथा दोषों का शमन करना महत्वपूर्ण होता है।

पथ्यापथ्य: जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले सुपाच्य आहार का सेवन जैसे दालें, सब्जियों का सूप, जीरा, अजवाइन, सौंठ, काली मिर्च, पुराना अन्न, पतला दही इस ऋतु में लेना हितकर है।

  1. शरद ऋतु– इस ऋतु में पित्त का संचय होने लगता है अतः भोजन में तिक्त, मधुर, कषाय पदार्थों का सेवन करना हितकर है।

पथ्यापथ्य: सुपाच्य भोजन जैसे चावल, हरा चना, आमला, शहद, शर्करा का सेवन हितकर है। भारी, गरिष्ट भोजन का सेवन, दही, तेल और मद्यपान सेवन इस ऋतु में वर्जित है।

  1. हेमंत और शिशिर ऋतु- दोनों ऋतुओं में वातावरण प्रायः समान होता है। हेमंत ऋतु में औषधियों एवं आहार में स्निग्धता, मधुर रस और पौष्टिक द्रव्यों का प्रयोग उपयुक्त है। इस ऋतु में शरीर में दोषों का संचय अल्प मात्रा में होता है। परंतु शिशिर ऋतु में वातावरण रूक्ष और शीतल होता है जिससे शरीर में कफ का संचय होने लगता है। अतः शिशिर-ऋतु में भी उपर्युक्त आहार-विहार करते हुए ठण्ड से बचना चाहिए। शीतल, हल्के और रूक्ष पदार्थों का सेवन एवं उपवास नहीं करना चाहिए।

इन दोनों ऋतुओं में उत्तम खान पान, व्यायाम के कारण इतनी शक्ति का संचय किया जा सकता है कि रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ने से अन्य ऋतुओं में भी निरोगी रहा जा सकता है।

स्वास्थ्य के उपर्युक्त नियमों का पालन करने पर व्याधियों एवं विकारों की संभावनाएं कम हो सकती हैं।

 

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