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वेब सीरीज अच्छाइयों के साथ बुराइयों को भी खूब परोस रही है और नई पीढ़ी इसके व्यावसायिक शिकंजे में फंसती जा रही है। वेब और टीवी सीरियलों पर फिल्मों जैसा कोई सेंसर नहीं है। टीवी तो घरेलू के चक्कर में अपने को संयमित करने की कोशिश करता है, लेकिन वेब का ऐसा नहीं है और इससे एक अपसंस्कृति भी पैदा हो रही है।

कॉमिक्स सीरीज में पढ़ी बचपन की एक कहानी बार-बार, लगभग 40-45 सालों के अंतराल बाद, अचानक कौंधने लगी और बेचैनियों के भंवर में संवेदनाएं डूबतीं -उतराती मालूम होने लगीं… घुटन का धारासार सिलसिला और सुरसा के मुख -सा विशालतर प्रश्न। ये वेब है तो वेब यही क्यों है? ने अंधेरों से घिर दिया…. यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि ठीक उसी समय क्रांतिकारी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली का गीत भी कानों में बजने लगे- शम्मा से कोई कह दे कि तेरे रहते -रहते अंधेरा हो रहा… तभी उसी कॉमिक्स वाली कहानी का शापित राजकुमार हीरो की तरह तलवारें लहराता आकाश में उड़ने लगा… गोया वह उस राक्षस को मार देगा जो हमारी संस्कृति को लीलने बैठा है। आंखें फाड़ -फाड़कर अपने चहुंओर देखने लगा, वह राजकुमार प्रत्यक्ष में कहीं नहीं दिखा पर ‘वेब सीरीज’ का दुष्ट राक्षस ठठा -ठठाकर अपना वीभत्स्तम रूप दिखाता रहा।

आइंस्टाइन ने कहा था, “किताबों की तुलना में सिनेमा लोगों को अधिक तेजी से ज्ञानी बनाएगा, उसकी गति इतनी तीव्र होगी कि किताबें सिनेमा की मुखापेक्षी हो जाएंगी।” उनकी बात लपक कर हिटलर ने सिनेमा को संचार के ताकतवर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। सिनेमा ने नाटकों को लीला, टेलीविजन ने सिनेमा को सीमित कर दिया। वेब सीरीजों ने टेलीविजन को ताख पर बिठाल कर जो तांडव मचाया है उससे हमारे ‘विवेक’ पर बहुत बड़ा प्रश्न उत्पन्न हो गया है – यहां मैं सिर्फ हिन्दुस्तान को संदर्भ में नहीं ले रहा हूं बल्कि संसार के उन सभी देशों को शामिल कर रहा हूं जिनकी सांस्कृतिक विरासत गहरी रही है। कालांतर में ‘बौद्धिक हिटलरों की संचार के सभी माध्यमों को इस्तेमाल करने’ की आकांक्षा दिनोंदिन उग्रतर होती गई और आज हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहां पैर जूते में हैं पर जूतों को यह भरोसा नहीं कि पैरों तले धरती कितनी ठोस है। इस विषय में बातचीत आगे बढ़ाने से पहले यंत्र युग की नई संतान ‘वेब’ क्रांति से परिचित हो जाएं।

वेब यानी तरंग, वेब सीरीज  वे ‘दृश्य -श्रव्य गल्प’ जो  इंटरनेट से प्रसारित  होते हैं जो हाथों में पकड़े मोबाइल से लेकर घरों में लगे टेलीविजन स्क्रीन पर देखे जा सकते हैं। पूरी दुनिया में इंटरनेट क्रांति के कारण वेब- सीरीज का विचार 1995 में पहली बार साकार हुआ था। कैलिफोर्निया के स्कॉट जकेरिन ने ‘दी स्पॉट’  नामक सीरीज बनाई थी। सिंडिकेटेड टेलीविजन ने हंसी मजाक वाली वेब सीरीज ‘स्टेल्ला शॉर्ट्स’ बनाई जो बहुत पसंद की गई और उसी के साथ इसका चलन शुरू हुआ। लेकिन फिल्मों -टेलीविजन को उनके बेहतर निर्माण और विवरण के कारण यह ‘मनोरंजन की थाल में परोसी चटनी’ के बराबर भी जगह नहीं बना पा रही थी। इसका दूसरा कारण इंटरनेट का तब महंगा होना भी था। यह बहुत कुछ बैचलर -पार्टी या होम थियेटर का विषय था। 1998 के बाद इंटरनेट जैसे -जैसे सुलभ और सस्ता होता गया ‘वेब सीरीज’ और ‘सोशल मीडिया’ दोनों विशालतर प्लेटफॉर्म के रूप में उभरे।

अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में वेब सीरीज मनोरंजन के साथ -साथ सूचनाओं के सुलभ विस्तार के लिए बनाए जा रहे हैं। जर्मनी और फ़्रांस में विज्ञान – इतिहास -समाजशास्त्र आदि विषयों की पढ़ाई के लिए वेब सीरीजों का निर्माण किया जा रहा है। रूस, बेल्जियम, फ़्रांस देश -दुनिया की बातें वेब सीरीज के द्वारा अपने लोगों तक पहुंचा रहे हैं। अमेरिका अव्वल इसका उपयोग ठेठ मनोरंजन के लिए अधिक कर रहा है। ‘जब -जहां -जैसे चाहो देखो’ के व्यापारिक उद्घोष से वेब सीरीज बनाए जा रहे हैं।       सिस्टोपिक लैब के टेरिटरी मैनेजर आकाश गुप्ता कहते हैं कि वेब सीरीज ने सिनेमा का परसेप्शन बदल दिया है। आज दर्शकों को वास्तविक लोकेशन -चरित्र -कहानियां, सच्ची प्रतिक्रियाएं, सच्ची घटनाएं वेब सीरीज के द्वारा देखने को मिल रही हैं।

भारत में वेब सीरीज के प्रदर्शन की शुरुआत सेक्रेड गेम्स के द्वारा नेटफ्लिक्स ने 2018 में की जिसको अपराध केंद्रित विषयों के विशेषज्ञ फिल्मकार अनुराग कश्यप ने बनाया। विक्रमादित्य मोटवानी जैसे संवेदनशील निर्देशक ने इसके कुछ अंश शूट किए। इसके बाद कुकुरमुत्ते की तरह वेब सीरीज की बाढ़ आ गई। मनोहर कहानियां, सत्यकथा जैसी पत्रिकाओं के आधार पर बनाते ‘सच का सामना’, ‘क्राइम पेट्रोल’, ‘सावधान इण्डिया’ सरीखे शोज की जगह शॉफ्ट पोर्न कार्यक्रमों ने ले ली। आज भारत में वेब सीरीज का अर्थ हत्या -नशाखोरी -बलात्कार -यौन सम्बन्ध हो गया है। यह कम से कम समय में अधिक से अधिक पैसा बनाने और संस्कृति तथा समाज को दूषित करने का माध्यम बन गया है।

विश्व सांस्कृतिक संगठन और उसके कार्य व्यवहारों का अध्ययन कर पाकिस्तानी मूल की कनाडाई फिल्मकार मुनाजिया जहांगीर ने 2014 में दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा था कि एशियाई बाज़ारों पर कब्जे के लिए अमेरिकी और यूरोपीय देशों द्वारा वहां की व्यवस्था और मूल संस्कृति के विपरीत विषयों को बढ़ावा देने के लिए सिनेमा -टेलीविजन -वेब सीरीज बनाने को वित्त पोषण किया जाता है। चीन और अरब देश इसके मुख्य स्रोत हैं। राजस्व विभाग के एक बड़े अधिकारी ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर इसकी परोक्ष पुष्टि करते हुए बताया कि देश के सिनेमा हाल खाली हैं मगर चीन जैसे देशों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों की रिलीज दिखा कर अरबों रूपये अर्जित किए जा रहे हैं। भारतीय फिल्म -टेलीविजन और वेब सीरीज निर्माता कंपनियों की कोशिश यह हो रही है कि उसके ऑफिस चीन में खुल जाएं। बालाजी ने अपना दफ्तर वहां बना लिया है जबकि अन्य उसकी प्रक्रिया में हैं। अपुष्ट खबर है कि चीन, अमेरिका और सऊदी अरब की कई कंपनियां भारत में अपराध केंद्रित विषयों वाले शॉफ्ट पोर्न वेब सीरीज के निर्माण पर 16000 करोड़ रूपये का निवेश कर रही हैं।

भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर हमला

बेंगलुरु के फ़िल्मकार वासवराज कहते हैं कि तकनीक के विस्तार से ‘कला का विस्तार’ की जगह उसके माध्यमों का विकास नहीं हो रहा है। तकनीक का लाभ कला की प्रासंगिकता को समाप्त करने में किया जा रहा है जो अस्वीकार्य है। ‘सेक्रेड गेम’ में हिन्दू साधुओं को व्यभिचारी और अपराधी बताया जा रहा है; जबकि यह बात साबित हो चुकी है कि राजनीतिक लाभ के लिए जिन हिन्दू धर्मगुरुओं ने सत्ता के सामने  या उनके हाथ की कठपुतली बनाने से मना किया -उनको सत्ता का दुरूपयोग कर जयललिता सरीखी नेताओं ने जेल में डाला। अनेक मुसलमान और ईसाई पादरी तथा इन धर्मों के शिक्षक यौन शोषण जैसी सैंकड़ों -हज़ारों दुष्कार्यों में रंगे हाथों पकड़े गए हैं पर उनको विषय नहीं बनाया जा रहा है। अपनी काहिली छिपाने और अपने भ्रष्टाचार को निर्बाध चलाते रहने के लिए पी चिदंबरम जैसों ने ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे नैरेटिव रचे तथा अनेक हिन्दू धर्म गुरुओं को कतार से जेल में भरा। दूसरी बात यह भी है कि अब तक जितने भी हिन्दू धर्मगुरु पकड़े गए हैं उनमें कोई साधु नहीं बल्कि गार्हस्थ और धर्म के व्यापारी पकड़े गए हैं। फिर उनमें अधिकांश आरोपी  हैं उनका अपराध सिद्ध नहीं हुआ है मगर वे वेब कथाओं का पात्र बनाकर पेश किए जा रहे हैं।

मोटिवेटर और स्क्रिप्ट लेखक श्री अनादि सूफी ‘सेक्रेड गेम’ ‘लैला’ और ‘मिर्जापुर’ जैसी वेब सीरीजों से खासे खफा हैं। वे कहते हैं कि इस तरह के वेब सीरीज बीभत्सता को आकर्षक बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं। इनको देखकर कोई सामान्य रह ही नहीं सकता।  महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत साहित्यकार श्री संजय अमान के अनुसार वेब सीरीज भारतीय सभ्यता -संस्कृति पर हमला है और यह पीढ़ियों को मानसिक रूप से प्रदूषित करने की अंतरराष्ट्रीय सजिश का हिस्सा है।

प्रख्यात कव्वाल स्वर्गीय अज़ीज़ नाज़ा की पत्नी और उर्दू की प्रसिद्ध  लेखिका श्रीमती मुमताज अजीज नाज़ा वेब सीरीज के बाल मन पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर बहुत चिंतित हैं ,उनका कहना है कि इंटरनेट पर ज़्यादा कंटेंट जहरीले हैं जिससे बच्चों में गुनाह की प्रवृति बढ़ती जा रही है। मोबाइल की सुलभता और न्यूक्लिीयर फैमिली में बच्चों को मिलता विपुल एकांत उनको जहरीली दुनिया में ले जा रहा है। इस पर सरकार को रोक लगना चाहिए।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की ज्यूरी के दो बार सदस्य रहे सुधांशु श्रीवास्तव का मानना है कि तकनीकी क्रांति और दृश्य -श्रव्य माध्यम पर उसके प्रभावों से समाज अछूता और अलग नहीं रह सकता। इंटरनेट वह प्लेटफॉर्म हो जो किसी देश की सीमाओं में कैद नहीं है। हमें चुनाव के विकल्प भी इसने काफी दिए हैं। हमें स्वशासन ही बेहतर विकल्प लगता है।

उभरते हुए फिल्मकार अर्नेस्ट सिंगरहां शिमरा कहते हैं कि  भारतीय समाज पर वेब सीरीज की चलन ने दो तरह से प्रभाव डाला है। पहली बार भारतीय दर्शकों को जहां विविध तरह के विषय देखने को मिल रहे हैं और वे अवास्तविक मसाला फिल्मों से इस जीवन की सच्चाइयों को परदे पर अधिक विश्वसनीय अभिनय के साथ देख रहे हैं वहीँ फिल्म निर्माण में स्टूडियो -निर्माता -वितरक की लॉबी का वर्चस्व टूट रहा है। अब निर्माण और वितरण में अधिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिकता दिख रही है।

वेब सीरीजों द्वारा क्या सांस्कृतिक हमला किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर इसकी दर्शकता में छिपा है। इंटरनेशनल जर्नल फॉर रिसर्च अंडर लिट्रल एक्सेस के अनुसार भारत में लगभग 90 करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़े हैं जिनमें 80 करोड़ लोग मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। 50 करोड़ भारतीय 24 घंटे ऑनलाइन रहते हैं और लगभग 30 करोड़ लोग स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। स्मार्ट फोन द्वारा इंटरनेट का उपयोग करने वालों में 5 % की उम्र 11 वर्ष से कम है। 6-10 घंटे रोजाना इंटरनेट का उपयोग करने वालों में पुरुषों की संख्या 60% और महिलाओं की प्रतिशतता 40% है। उनमें 45% लोग 18- 22 वर्ष, 35% लोग 23-26 वर्ष, 20% लोग 27-30 वर्ष के हैं। इंटरनेट उपभोक्ताओं में 70% विद्यार्थी हैं और 30% कामकाजी।

ब्लॉगर राजीव कुमार कहते हैं कि वेब सीरीज पर अधिकांश लोग कॉमेडी देखते हैं लेकिन सामाजिक सर्वेक्षक रमन राघव कहते हैं ‘वेब सीरीज पर सस्पेंस थ्रीलर की मांग ज़्यादा है।’  ‘संस्पेंस थ्रीलर की यही ‘कथित’ मांग कुसंस्कृति के प्रवेश का दरवाजा खोल देती है -यह कहना है उत्तरी कैरोलिना यूनिवर्सिटी की डायरेक्टर कार्ला हॉलैंड का। हालांकि ऑस्कर अवार्ड 2010 और 2017 की ज्यूरी के सदस्य रहे सुधांशु श्रीवास्तव का मानना है कि  भारत के संदर्भ में वेब सीरीज की समीक्षा का समय अभी दूर है। हम इसका नीर -क्षीर निर्णय इंटरनेट के उपभोक्ताओं का केंद्र सरकार द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण के आधार पर कर सकते हैं। वेब सीरीज देखने के लिए अपना काम नहीं करने या बहाने बना कर वेब सीरीज देखने वालों में युवाओं की संख्या 90% है जिसमें 55% ढीठ हो चुके हैं। वे कितना भी दवाब हो वेब देखने के लिए अपना काम टाल देते हैं। इनके व्यवहार का अध्ययन कर देखा गया कि 70% गाली -गलोैज़, हिंसा और शारीरिक संबंधों को देखने के लिए वेब सीरीज देखते हैं। 20% की रूचि वेब सीरीजों में दिखाई जाने वाली शानदार जिंदगी होती है।

भारतीय युवाओं को हिंसा, सेक्स, गाली-गलौज़ वाले सीरीज ज्यादा पसंद आते हैं और उसको वे अपने व्यवहार में भी तेजी से शामिल कर लेते हैं। Netflix,Amezon prime,You tube, Alt Balaji, Eros, Cheers, Hot star इत्यादि के वेब सीरीजों के युवाओं, किशोरों और बच्चों पर प्रभाव का अध्ययन करने के बाद डॉक्टर विनोद एस करावी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लगातार वेब सीरीज देखने के कारण इनमें इन्सोमीनिया, डिप्रेशन और मोटापा लगातार बढ़ रहा है। ये कामचोर होने के साथ -साथ बड़ी तेजी से सहजतापूर्वक गाली -गलौज़, नशाखोरी और अनैतिक यौन व्यवहारों को अपने आचरण का अंग बनाते जा रहे हैं। वेब सीरीज के कारण शराबखोरी करने वाले किशोरों और युवाओं में 40% बढ़ोत्तरी महिलाओं और 50% वृद्धि पुरुषों की हुई है। उनकी सहनशीलता भी तेजी से गिर रही है। झगड़ालू प्रवृति 73% तक बढ़ी  है।

अच्छी वेब सीरीज भी हैं

अधिकांश वेब सीरीज और उसके प्रस्तोता चैनल सेक्स – हिंसा -व्यभिचार की कथाएं कहते हैं किन्तु वहां भी कुछ अच्छे कंटेंट हैं। ऑल्ट बालाजी, उल्लू आदि के लगभग सभी वेब सीरीज वयस्क -कंटेंट यानि हिंसा -सेक्स आदि परोसते हैं तो अंतरराष्ट्रीय वेब पोर्टल्स जैसे  प्राइम अमेजन, नेटफ्लिक्स, सिक्स सिग्मा और इरोस ऐसे वेब सीरीज वितरक हैं जो शैक्षणिक, पर्यटन, साहित्य आधारित वेब कंटेंट भी बड़ी संख्या में बना रहे हैं। ‘ये मेरी फैमिली’, ‘बेयरली स्पीकिंग विथ अर्नब’, ‘स्टार्टिंग अप’, ‘लव शॉट्स’ ‘गर्ल इन द सिटी’ आदि अच्छी वेब सीरीज हैं।

इन पर अभी तक किसी सेंसर बोर्ड का नियम लागू नहीं होता। वैसे सेंसर के नियम तो टेलीविजन पर भी नहीं लागू होते किन्तु चूंकि टेलीविजन को घरेलू मनोरंजन का माध्यम माना गया है यह गंदगी फैलता तो है पर दिखाता कम और बताता ज्यादा है। वेब बताता और दिखाता दोनों ही ज्यादा है। फिल्म सेंसर की पहुंच वाला माध्यम है और उसका प्रसार टेलीविजन तथा वेब की तुलना में अत्यंत नियंत्रित है तो उससे बच्चों -किशोरों को बचाया जा सकता है, मगर वेब सीरीज से कठोर नियमों के अभाव में, बिलकुल नहीं।  उन्नीसवीं सदी के प्रमुख दर्शनशास्त्री जॉर्ज विलहिंम फ्रेडरिक ने कहा था जब आदमी जरूरतों को भूल, अपनी लालच को पूरा करने के लिए काम करने लगेगा तो वह विनाश की तीव्र ढलान पर होगा। सेंसर के अभाव में ‘वेब सिरीज़’ का संसार हमारे विनाश की तीव्र ढलान ही तो है।

 

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