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पी. कार्नेजी ने स्पष्ट रूप से कहा अयोध्या हिंदुओं के लिए वैसी ही है जैसे मक्का मुसलमानों के लिए और जेरूसलम यहूदियों के लिए है। एसआई की रिपोर्ट 1889 में दर्ज की गई थी और उक्त रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद रामचंद्र के पुराने मंदिर जन्मस्थान पर ही खड़ी है।

अयोध्या में रामजन्म स्थान के विवाद का एक लंबा इतिहास रहा है। इस विवाद को भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई और उनके चार सहयोगियों न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस.नजीर की पांच सदस्यीय बेंच ने एक लंबी सुनवाई के पश्चात सर्वसम्मती से अपना फैसला दिया। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय बहुत ही ऐतिहासिक निर्णय है, जिसने सत्तर वर्षों से लंबित एक विवाद को हल किया। भारत के हिंदुओं का विश्वास था कि भगवान राम का जन्म उसी केंद्रीय ढांचे के नीचे हुआ था, जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था। हिंदुओं के अनुसार 1528 में, मुगल सम्राट के सेनापति मीर बाकी ने राम जन्म स्थान के मंदिर को ध्वस्त किया और उस मंदिर के मलबे पर ही मस्जिद का निर्माण किया। शरीयत कानूनों के विपरीत बलपूर्वक लोगों पर दबाव डालकर मस्जिद का निर्माण करवाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह प्रतीत होता है कि मुख्य चार मुकदमे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के समक्ष 1950 से 1989 के बीच उसी 1500 वर्ग गज भूमि के सम्बंध में दायर किए गए थे। सिविल जज फैजाबाद के समक्ष गोपाल सिंह विशारद द्वारा 17 जनवरी 1950 को पहला मुकदमा दायर किया गया था और उसमें प्रार्थना की गई थी कि हिंदू विवादित ढांचे के केंद्रीय गुंबद के नीचे पूजा करने के हकदार निर्मोहों। ही अखाड़ा/राम नंदी बैरागी ने 29 दिसंबर 1949 तक उसी केंद्रीय गुंबद के नीचे राम और सीता की मूर्ति की पूजा की। हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगे भड़क उठे थे, इसीलिए विवादित संपत्ति को तत्कालीन जिलाधीश द्वारा बंद कर दिया गया। (145 सीआरपीसी) गौरतलब बाात यह है कि रामजन्म स्थान जिस गांव में है, ब्रिटिश  के सभी दस्तावेजों में उस गांव का नाम खोत-रामचंद्र है।

वर्ष 1961 में, सुन्नी वक्फ बोर्ड ने एक दावा दाखिल और विवादित भूमि का धारक बताया और इसी तरह 1989 में ‘भगवान श्रीराम विराजमान’ नाम से एक मुकदमा दायर किया गया, जिसमें कहा गया कि तथाकथित विवादित भूमि ‘भगवान श्री राम विराजमान’ की है और न्यायालय इसे मालिक घोषित करे।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उन चारों मुकदमों तथा उनके साथ अन्य लंबित मुकदमों को सुना। सभी पक्षों ने अपनी दलीलें, अपनी बातें मौखिक और दस्तावेजों के रूप में प्रस्तुत की। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को रामलला विराजमान या राम जन्म स्थान के आसपास के क्षेत्र को खोदने और यह पता लगाने के लिए कहा कि क्या वहां मंदिर का कोई अस्तित्व है? उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार ए.एस.आई. ने खुदाई का काम किया और उच्च न्यायालय इलाहाबाद के समक्ष इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में यह कहा कि बाबरी ढ़ांचे के नीचे एक मंदिर के अस्तित्व के ठोस सबूत है। तथाकथित बाबरी मस्जिद की संरचना मंदिर की संरचना के ऊपर बनाई गई थी।

संबंधित पक्षों को सुनने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिनांक 30सितम्बर 2010 को यह आदेश दिया कि निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के मुकदमे को कानून की समय सीमा के बाद दाखिल किया गया है अत: उक्त मुकदमों को निरस्त कर दिया गया। और अदालत ने साथ ही साथ तथाकथित विवादित भूमि को तीन पक्षों में विभाजित किया। इसका एक तिहाई हिस्सा केंद्रीय गुंबद के नीचे रामलला विराजमान को, एक तिहाई हिस्सा बाहरी हिस्से में निर्मोही अखाड़ा को और शेष एक तिहाई को सुन्नी वक्फ बोर्ड में विभाजित कर दिया।

1856-57 में भी विवादित भूमि पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच भयंकर दंगे हुए थे। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राम जन्म स्थान, राम मंदिर पर मस्जिद के निर्माण के बाद से ही हिंदू और मुसलमानों के बीच लगातार विवाद होते रहे हैं और कई साधुओं, संतों और भक्तों ने कब्जे को वापस पाने के लिए मीर बाकी और बाबर की बर्बर कार्रवाई से अपने जीवन का बलिदान भी किया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राम जन्म स्थान पर अपने अधिकारों के लिए हिंदुओं ने लगातार संघर्ष किया। जबसे मंदिर के ऊपर मस्जिद का निर्माण किया गया, बार-बार इस मस्जिद निर्माण को चुनौती भी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि मुसलमान रामजन्म स्थान पर अपना अक्षुण्ण कब्जा साबित करने में विफल रहे हैं।

यह भी महत्वपूर्ण था कि जब इनर कोर्टयार्ड और आउटर कोर्टयार्ड के कब्जे को लेकर दो समुदायों के बीच लगातार दंगे हो रहे थे, तब अंग्रेज भारत पर शासन कर रहे थे और उन्होंने इनर कोर्टयार्ड और आउटर कोर्टयार्ड को अलग करने के लिए तथा लगातार हो रहे दंगों को रोकने के लिए ईंट की दीवार का निर्माण किया। यह कहा जा सकता है कि भले ही राम मंदिर के ऊपर मस्जिद का निर्माण कर दिया गया था परंतु हिंदू सेंट्रल डोम के नीचे भगवान राम की पूजा करने के लिए सदैव लड़ते रहे।

मुस्लिम समुदाय को भूमि उनके अधिकार के रूप में नहीं दी गई, क्योंकि वह अपने दावे को साबित करने में विफल रहे थे। परंतु यह भूमि आवंटन का आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 में उल्लेखित अपने अधिकारों के तहत तथा भारतीय संस्कृति और विरासत, देश की एकता और शांति बनाए रखने के लिए  किया गया है।

ब्रिटिश शासकों ने उस विवादित भूमि को 1 नवम्बर 1858 को अपने कब्जे में ले लिया और ब्रिटिश शासन के दौरान सभी दस्तावेजों में उस विवादित भूमि को ‘मस्जिद जन्मस्थान’ के रूप में उल्लेखित  किया गया। तत्कालीन अवध के थानेदार श्री शीतल दुबे ने दिनांक 1 दिसम्बर 1858 (सूट नंबर-1 का नमूना 21) की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उक्त संरचना को ‘मस्जिद जन्मस्थान’ कहा गया है। इसके अलावा 6 दिसम्बर 1858 को एक आदेश पारित किया गया, उसमें भी इस संरचना को ‘मस्जिद जन्मस्थान’ के रूप में (नमूना ए 69, दावा नं. 1)उल्लेखित किया गया है। उसी प्रकार अवध के मुख्य आयुक्त के सचिव के पत्र दिनांक 25 अगस्त 1863 जो दावा नं 1 में नमूना ए 14 पर है, में भी  ‘जन्मस्थान मस्जिद’ के रूप में उल्लेखित है।

पी. कार्नेजी (सेटलमेंट के कार्यपालक आयुक्त अयोध्या) द्वारा फैजाबाद की तहसील के ऐतिहासिक रेखा चित्रों से यह सिद्ध हुआ है कि ब्रिटिश शासन के कई राजपत्र स्पष्ट रूप से बताते हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण रामजन्म स्थान पर किया गया था। पी. कार्नेजी ने स्पष्ट रूप से कहा अयोध्या हिंदुओं के लिए वैसी ही है जैसे मक्का मुसलमानों के लिए और जेरूसलम यहूदियों के लिए है। बाबर ने 1528 ई. में राम जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया और यह भी कहा गया कि ब्रिटिश शासन द्वारा रेलिंग का निर्माण हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगों से बचने के लिए किया गया था।

एसआई की रिपोर्ट 1889 में दर्ज की गई थी और उक्त रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद रामचंद्र के पुराने मंदिर जन्मस्थान पर ही खड़ी है।

30 नवम्बर 1858 को बाबरी मस्जिद अवध के सैयद मोहम्मद खाती मोदी ने एक शिकायत दर्ज की और कहा कि विहंग सिंह ने जन्म स्थान मस्जिद में दंगा करवाया और यह भी कहा कि मेहराब और मोम्बर के पास विहंग सिंह ने राम चबूतरा का निर्माण किया है तथा मस्जिद के अंदर पूजा और हवन जारी है। पूरी मस्जिद में ‘राम राम’ लिखा हुआ है। उस आवेदन से सैयद मोहम्मद ने अधिकारियों से प्रार्थना की कि हिंदुओं को मस्जिद से बाहर किया जाए।

31 दिसम्बर 1828 को अवध के थानेदार शीतल दुबे द्वारा एक और रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें उन्होंने मस्जिद को मस्जिद जन्मस्थान कहा। दिनांक 12 दिसम्बर 1861 को मोहम्मद असगर द्वारा दायर किए गए एक अन्य आवेदन में कहा गया कि विवादित स्थल से हिंदुओं के चबूतरा और झोपड़ी को हटा देना चाहिए। यह आवेदन सूट नंबर 44 और 54 में किया गया। इसके अलावा 12 मार्च 1861 को मोहम्मद असगर अमीर राजाबल्ली और मोदी द्वारा तथा बाबरी मस्जिद के अफजल खाती और मुजीन द्वारा राम जन्म स्थान संबंधित प्राधिकरण के समक्ष एक आवेदन दायर किया गया। सभी समकालीन रिकॉर्ड से पता चलता है अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद को ही राम जन्म स्थान के रूप में हमेशा से संदर्भित किया गया था।

एएसआई रिपोर्ट के अलावा कुछ अन्य दस्तावेजी साक्ष्य तथा गवाह उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए जो कि शैक्षिक और मौखिक साक्ष्य है। इनमें से कुछ गवाह 1) महंत परमहंस रामचंद्रदास 2) हरिहर प्रसाद तिवारी 3) रामनाथ मिश्रा 4) हौसला प्रसाद त्रिपाठी 5) राम सूरत त्रिपाठी 6) कौशल किशोर मिश्रा 7) जगतगुरु स्वर्गीय रामानंदाचार्य 8) महंत भास्कर दास 9) नारद शरण 10) मोहम्मद हाशिम 11) हाजी मोहम्मद अहमद 12) मोहम्मद यासीन 13) मोहम्मद कासिम की गवाही से यह स्पष्ट है कि बाबरी मस्जिद का तथाकथित विवादित ढांचा भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम के जन्म स्थान के अलावा और कुछ नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित करना गलत था, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त आदेश को निरस्त कर दिया। क्योंकि केस लड़ने वाले तीनों पक्षों में से किसी ने विभाजन के लिए अनुरोध नहीं किया था। इसीलिए उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने बनाए रखने के योग्य नहीं समझा।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपने कब्जे के दावे को स्थापित करने में विफल रहा, इसलिए उनका मुकदमा खारिज किया जाता है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने सहिष्णुता तथा सद्भाव बनाए रखने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी अतिरिक्त सामान्य न्यायिकता का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार/राज्य सरकार को आदेश दिया कि अयोध्या में मुसलमानों को मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन दिया जाए।

मुस्लिम समुदाय को भूमि उनके अधिकार के रूप में नहीं दी गई, क्योंकि वह अपने दावे को साबित करने में विफल रहे थे। परंतु यह भूमि आवंटन का आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 में उल्लेखित अपने अधिकारों के तहत तथा भारतीय संस्कृति और विरासत, देश की एकता और शांति बनाए रखने के लिए  किया गया है। हालांकि कुछ लोग इस मामले पर विवाद खड़ा करने की कोशिश अभी भी कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मोही अखाड़े के दावे को भी खारिज कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय एक भव्य और दिव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। जो भारतीयों की एकता, अखंडता और शांति का प्रतीक होगा। यह हमें विभिन्न समुदायों के बीच हमारी समृद्ध संस्कृति और भाईचारे की याद दिलाएगा।

राम मंदिर निर्माण करोड़ों हिंदुओं की मांग थी और यह आने वाले भविष्य में पूरी भी होने जा रही है। राम मंदिर का निर्माण भारतीय लोगों के सुनहरे मीठे सपनों को पूरा करने के जैसा है।

पौराणिक कथाओं में भी कहा गया है कि भगवान राम एक आदर्श राजा, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और आदर्श पति थे। यह भगवान राम थे, जिन्होंने राम राज्य की स्थापना की। जहां हर कोई खुश था और शांति से रह रहा था। उन्होंने निषादराज और शबरी को सम्मान, प्यार और स्नेह दिया और आदिवासियों की सेवा के लिए नेक काम किया। आइए हम इस अवसर पर उठें और भगवान राम के पद चिन्हों पर चलने का प्रयास करें और भारत को भगवान राम का राष्ट्र बनाएं।

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