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****ललिता दीक्षित****

            मनुष्य जन्म अनमोल है,        सहजता से नहीं मिलता। जिसे मिलता है वह केवल उन्नत होने के लिए। याने परमेश्वर प्राप्ति के लिए। परमेश्वर प्राप्ति यही एकमेवउद्देश्य है मनुष्य जन्म का और उसकी प्ाूर्ति होती है ‘योग’ से। इसलिए स्वयं भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ‘जीवन में अगर यशस्वी बनना है तो योगी बन।’ योगी बनने का मतलब केवल शारीरिक कसरत या आसन करना नहीं तो प्रमुखतः विशाल मन का अभ्यास करना है। चित्त की एकाग्रता का मुख्य साधन योगाभ्यास ही है। मनुष्य शारीरिक दृष्टि से उत्क्रांत हुआ है, अब मानसिक उत्क्रंाति होनी जरूरी है। हमारा मन कैसे बना है? कहते हैं,‘जैसा खाये अन्न वैसा बने है मन।’ आहार का मन पर बड़ा गहरा असर होता है। आहार के सूक्ष्म अति सूक्ष्म भाग से मन होता है। पाशुपत ब्राह्मणोपनिषद में कहा गया है-

 अभक्षस्य निकृत्मा तु विशुध्द्ं हृदयं भवेत्।

 आहारशुध्दौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः॥

 अर्थात् आहार में अभक्ष्य को त्याग देने से चित्त शुध्द हो जाता है। आहार शुध्द हो तो चित्त की शुध्दि स्वयंमेव हो जाती है। साधना का मुख्य आधार अन्न-शुध्दि को माना गया है। अर्थात् मन भी शरीर का एक भाग है। मन को ग्यारहवीं इंद्रिय भी कहते हैं। इसलिए शरीर की उन्नति-अवनति आहार पर ही निर्भर है। आहार शुध्द न हो तो शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते हैं और उसके परिणाम स्वरूप मन भी अशुध्द हो सकता है। आज वैद्यक शास्त्र भी कहता है कि ९० प्रतिशत शारीरिक व्याधियां मन के कारण याने मनोकायिक स्वरूप की होती हैंै। वैद्यकशास्त्र यह भी सिद्ध कर चुका है कि, हमारे मन में इस प्रकार के विचार, कृति हो याने क्रोध, मत्सर, द्वेष याने संक्षेप में दुर्विचार हो तो हमारे मस्तिष्क की पेशियां ऐसा रसायन निर्माण करती हैं, जिससे शरीर में असंतुलन होगा, रक्तचाप में बदलाव होगा, खून की शर्करा का प्रमाण भी बदल जाएगा, याने अस्वास्थ्य बनेगा। इसके विरूध्द जब मन में प्रेम, आनंद आदि सद्भावना रहेगी तब ऐसा रसायन निर्माण होगा जिससे शरीर स्वस्थरहेगा। और मन के विचार तो अपने आहार जैसे ही होंगे।

 छान्दोग्योपनिषद के अनुसार, आहार शुध्द होने से अंतःकरण की शुध्दि होती है। अंतःकरण शुध्द होने से भावना दृढ़ हो जाती है। भावना दृढ़ होने से हृदय की सर्व ग्रंथियां खुल जाती हैं। अन्न के गुणों का अंतःकरण पर प्रभावपड़ना अनिवार्य है। इसलिए योगाभ्यास करनेवालों को आहार की तरफ ध्यान देना आवश्यक ही है। हठयोग प्रदीपिका में कहा है कि सात्विक आहार से मन प्रसन्न होता है, जो साधना के लिए सहायक ही होता है।

 सुस्निग्ध मधुराहारश्चनुर्थां विवर्जित ः

 भुज्यते शिवसंप्रात्यै मिताहारः स उच्यते। 

 (ह.प्र. -१-५८)

 सात्विक अन्न पचन के लिए सुलभ होने से त्रिदोषों का माने वात-पित्त-कफ का संतुलन होता है। शरीर हल्का बनकर मन को स्थैर्य प्राप्त होता है। साधना में हम एकचित्त बन सकते है।   ‘भुज्यते शिवसंप्रीत्यैः’ का अर्थ है, योगी जब भोजन करता है, तब वह स्वयं के लिए नहीं तो अंतरात्मा के लिए सेवन कर रहा है, ऐसी भावना उसके पीछे होती है। याने इसमें स्वार्थ नहीं होता। साधना में धारणा और ध्यान के लिए आवश्यक शरीर-मन का स्थैर्य, एकाग्रता के लिए सात्विक अन्न महत्वपूर्ण होता है।  

 हमें विचार करना चाहिए कि क्या हम खाने के लिए जी रहे हैं? या जीने के लिए खा रहे हैं? अगर हम खाने के लिए जी रहे हैं तो कुछ कहना ही नहीं, सोचना ही नहीं। लेकिन अगर हम जीने के लिए खा रहे हैं तो हमारा जीवन संपूर्णतया निरोगी, आनंदी और उन्नति की तरफ ले जाने वाला होने के लिए सुयोग्य आहार का सेवन ही जरूरी है। सदा के लिए आहार सुपाच्य, सात्विक, स्निग्ध, पौष्टिक तथा मर्यादित हो। योगाभ्यासियों को सभी उत्तेजक पदार्थों को त्यागना चाहिए। सबसे पहले केवल जिह्वा के स्वाद की परवाह नहीं करनी चाहिए। सत्वगुणी आहार ही मनुष्य-मात्र को सात्विक वृत्ति का बनाता है। इसलिए राजसिक और तमोगुणी आहार त्यागना ही श्रेयस्कर होता है।

 वनस्पति आहार सबसे हितकर आहार है। आहार में सबसे कनिष्ठ मांसाहार माना गया है। मांस यह मृत शरीर होने से नैसर्गिक उष्णता उसमें नहीं होती है। मांस के अतिरिक्त आहारों में यह उष्णता नैसर्गिक होती है। मांसाहार में फिर वही उष्णता निर्माण करने के लिए मद्य जैसे मादक पदार्थों का सहारा लिया जाता है। जिसके कारण शरीर में विजातीय तत्व बढ़ कर प्रकृति के लिए नुकसानदेह होता है। शरीरान्तर्गत नाडियों का लचीलापन, कार्यक्षमता कम होकर जटिल बीमारी भी हो सकती है। मांसाहार से शरीरांतर्गत परमाणुओं की उष्णता कम होती है और रक्त-संचालन में बाधा आती है। इसी कारण जोडों की (संधि प्रदेश) कार्यक्षमता नष्ट होकर संधि विकार होते हैं। इसलिए संतुलित, सुपाच्य, हल्का, सात्विक, पोषक वनस्पति आहार ही हितकर है। 

 भगवद्गीता में सात्विक, राजसिक और तामसिक तीनों प्रकार के आहार का वर्णन किया है। और योग का अभ्यास करने वालों के लिए रस्याः, स्निग्धाः, स्थिराः, हृद्या, सात्विक आहारः प्रियाः ऐसा बताया है।

 आयुःसत्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः।

 रस्या स्निग्धाः स्थिरा हृद्याः आहाराः सात्विकप्रियाः ॥

 भ.गीता १७-८॥

 जिससे जीवन रस मिले ऐसा अन्न सेवन करना चाहिए। रस्याः याने शरीर के लिए पोषक रस जिसमें है ऐसा आहार। स्निग्ध, प्रथिनयुक्त आहार जिससे शरीर, बुध्दि पुष्ट होकर मन सहित शरीर सुदृढ़ और स्थिर बने। बुध्दि को मांद्य लाने वाला आहार सर्वथैव वर्ज्य हो। ऐसे आहार से बल की वृध्दि होकर शरीर व्याधिमुक्त होता है, दीर्घायुष्य प्राप्त होता है। जीवन के द्वंद्व सहने की ताकद मिलती है। लेकिन इसके साथ साथ और भी चीजों का ख्याल रखना जरूरी होता है। जैसे हम क्या, कैसे, कितना खा रहे हैं? क्या खाना है इसके बारे में सोच रहे हैं। आहार शास्त्र के अनुसार संतुलित आहार होना चाहिए। इसमें भी हमारी प्रकृति, कौन से प्रकार का काम हम कर रहे हैं?़ कौन से प्रदेश के हम निवासी हैं?  इन सभी चीजों की तरफ ध्यान देना जरूरी है। अगर हम यह नहीं करेंगे तो उसके दुष्परिणाम हमें ही भुगतने पड़ते हैं, विविध व्याधियों के रूप में। स्निग्ध पदार्थ चाहिए लेकिन हमारे इस उष्ण तापमान में उतनी आवश्यकता नहीं है,जितनी ठंड प्रदेश में होती है। इसलिए हम अंधानुकरण नहीं करेंगे। फास्ट फूड, रिफाइंड फूड, कोल्ड ड्रिंक्स ये सब झट से निरोगता को बिगाड़ने वाले हैं। इसका विचार होना आज अत्यावश्यक है। कैसे खाना है? सद्भावना से, प्यार से खाना है और केवल पेट भरने के लिए नहीं तो हम एक यज्ञकर्म कर रहे हैं ऐसा समझकर अच्छे विचारों के साथ अन्न सेवन करना है। इतना ही नहीं खाना पकाते समय हमारे मन की वृत्तियों का असर 

भी खाने पर होता है, न कि केवल खाते समय की भावनाओेें का। इसलिए बड़े प्रेम से, आनंद से अगर हम खाना बनाएंगे तो वह संस्कारित और सुपाच्य बनता है। और यदि ईश्वर स्मरणपूर्वक बनाएंगे तो अन्न सुसंस्कारित होने से उसका सुपरिणाम मन और बुध्दि पर होता है। इसलिए बाहर का खाना ठीक नहीं है। हमेशा खाना खाते समय पेट के (कल्पना से) दो भाग अन्न, एक भाग पानी और एक भाग हवा के लिए रखेंगे। इस प्रमाण में खाने से मल विसर्जन को कोई कठिनाई न होकर सहज सुलभ होता है। खाना खाते समय पानी पिना ठीक नहीं है, बल्कि खाने के पहले एक या दो घूंट पानी पीना और खाना खाने के आधा-एक  घंटे बाद जब प्यास लगे तभी पानी पीना उपयुक्त है। रात को तीखी, तली हुई, मसालेदार, खट्टी चीजें, दूध के पदार्थ इनका सेवन वर्ज्य समझना है। खाना अच्छी तरह से चबाचबाकर खाना है। कहावत है ‘कम खाना खूब चबाना, यही है तंदुरूस्ती का खजाना।’ अभी कम याने कितना? तो भगवद्गीता में उसके लिए य्ाुक्त ऐसा शब्द बताया है। य्ाुक्त याने प्रमाण में, आवश्यकतानुसार। केवल आहार नहीं तो हमारा विहार, आचार-विचार, सोना-जागना सभी चीजें य्ाुक्त होना जरूरी हैं। तभी योग दुःखहारी बनता है।

 युक्तहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगा भवति दुःखहा ॥

 भ.गीता ६-१७ ॥

 योगाभ्यास के साथ सदाचाऱ, शुध्दाचरण, आहार विहारादि तत्व, यही योगाभ्यास की खुराक है। जैसे साधना, परोपकार, सभ्यता, सत्यवचन, दयाशीलता, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, पवित्रता, उच्च विचार आदि गुणों का नाम ही सदाचार है। इसके बाद एक महत्वप्ाूर्ण बात हमें समझनी है। आहार इस शब्द का अर्थ केवल अन्नसेवन तक सीमित नहीं है। तो इसका बहुत व्यापक अर्थ है। हमारे जो पांच ज्ञानेंद्रिय हैं उनका विषय ही उनका आहार है। कानों से सुनना, आंखों से देखना, जिह्वा से बोलना, खाना, नाक से सूंघना, त्वचा से स्पर्श यह हर एक विषय उस उस इंद्रिय का आहार है। आज के भोग प्रधान समाज में हम देखते हैं कि इसका अतिरिक्त सेवन हो रहा है। इसके कारण हम अनुभवकर रहे हैं कि कुछ तुरंत तो कुछ स्थायी रूप में दुष्परिणाम हम भुगत रहे है। फिर भी आवश्यकतानुसार यह सब संतुलित रूप में सेवन करने की सजगता निर्माण नहीं होती। अति सर्वत्र वर्जयेत, इस उक्ति की तरफ ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है। निराहारी यह शब्द दो समय हम इस्तेमाल करते हैं, उपवास करने वाला और कुछ विकारवश जबरदस्ती से लंघन करनवाला, दोनों निराहारी। लेकिन योगाभ्यास करनेवाला निराहारी नहीं हो सकता, उसे मिताहारी, य्ाुक्ताहारी बनना है और अभ्यास के लिए पोषक, संयमित, संतुलित आहार सेवन करनंा है। तभी समाधान, तृप्ति, सात्विकता उसके जीवन में पैदा होगी, निरोगता प्राप्त होगी, आय्ाुर्मर्यादा बढ़ेगी, शरीर-मन कार्यक्षम, प्रसन्न बनेगा और संप्ाूर्ण जीवन आनंदमय बनेगा।

 

                                                 

 

 

 

 

 

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